वर-कन्या कुण्डली मेलापक

॥ श्रीः ।।

वर-कन्या कुण्डली मेलापक

प्राचीन काल में भारतवर्ष के लोग ब्रह्मचर्याश्रम के व्रत पालन के साथ विद्याध्ययन सम्पन्न करने के बाद ही विवाह करते थे परन्तु आज कल तो प्रायः कुल बातों ही में उल्टी नदी बह चली है।

हिन्दूशास्त्रानुसार विवाह एक धार्मिक कर्त्तव्य है। अन्य मत वालों ने जो इसे एक साधारण सम्बन्ध समझ रखा है, ठीक नहीं, क्योंकि एक दूसरे घर की कन्या एक अपरिचति वर के साथ सम्बन्धित होकर आजन्म सुख-दुःख की सङ्गिनी बनती है। आजकल के नवयुवकों की जो यह धारणा है कि जो कन्या पसन्द हो जाय वही ठीक है, बड़ी भूल की बात है। जबतक वर-वधू का मानसिक तत्त्व, शारीरिक तत्त्व, बुद्धिभेद, धार्मिकभेद इत्यादि का परस्पर मेल न हो तबतक केवल मन-बन्ध का सम्बन्ध अति दुःखदायी और उपद्रवी हो जाया करता है। जहाँ तक साध्य हो सके प्रति मनुष्य को उचित है कि विवाह के पूर्व ऋषि-प्रणीत ज्योतिषशास्त्र के अनूकूल पूर्ण विचार के बाद अपने पुत्र और कन्या का विवाह करना चाहिए।

ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास इन चारों आश्रमों में गृहास्थाश्रम अन्य आश्रमों का मूलाधार और उनमें सर्वश्रेष्ठ है। ऐसा वैदिकसाहित्य के अध्ययन से साफ स्पष्ट प्रतीत होता है तथा प्रायः सभी विद्वान् भी ऐसा ही विचार करते हैं, लेकिन कहा गया है कि भली प्रकार से अपनी विद्या को समाप्त कर अर्थात् युवावस्था में ही विवाह कर गृहस्थाश्रम में प्रवेश करना चाहिए।

विवाह की आयु-प्राचीन परम्परानुसार २० वर्ष से पूर्व पुरुष का व १६ वर्ष से पूर्व कन्या का विवाह करना चाहिए। बल्कि आचार्यों ने ८ वर्ष में ही कन्या के विवाह की आज्ञा दी है।

यहाँ इस बात पर गौर करें कि उपरोक्त स्थिति में विवाहोपरान्त गौना (द्विरागमन) सर्वदा कन्या के स्तन विकसित होने व रजस्वला होने पर ही किया जाता था जो उस समय की मांग के अनुसार उचित ही था। आजकल यथोचित समय पर अर्थात् १८ वर्ष से ऊपर की कन्या का व २५ के अन्दर लड़के का विवाह करना चाहिए। वैसे पति व पत्नी की आयु में अधिकतम १० वर्षों का अन्तर को भी समाजशास्त्रियों और कामशास्त्रियों ने स्वीकार किया है।


वर-कन्या कुण्डली मेलापक

समय शुद्धि-लड़के का विवाह जन्म या गर्भ से विषम वर्ष में तथा लड़की का सम वर्ष में होना चाहिए। यदि सम वर्ष में भी लड़के का विवाह करने की आवश्यकता हो तो गर्भ के ९ मास जोड़कर सम वर्ष के तीन महीने बीत जाने पर ही विवाह करें। तब गर्भ से विषम वर्ष आ जाता है। यही व्यवस्था कन्या के लिए भी विषम वर्ष करनी चाहिए।

पुरतो वर्षशुद्धिश्च गर्भमासान्विताः शुभाः। जन्म, मास, जन्म तिथि, जन्म नक्षत्र, जन्म वार तथा जन्म लग्न में विवाह नहीं होता है तथा ज्येष्ठ सन्तान का ज्येष्ठ मास में विवाह नहीं करना चाहिए। कुछ लोग केवल ज्येष्ठत्रय में अशुभ मानते हैं अर्थात् प्रथम गर्भोत्पत्र लड़का, प्रथम गर्भोत्पन्न लड़की का विवाह ज्येष्ठ मा समें नहीं करते, अर्थात् तीन जेठ नहीं मिलाते, दो रहने पर हानि नहीं मानते। लेकिन सामान्यतः ज्येष्ठ पुत्र हो या पुत्री उसका विवाह ज्येष्ठ मास में नहीं करना चाहिए-

आद्यगर्भदुहितुः सुतस्य वा, ज्येष्ठमासि न च जातुमंगलम्।

वर-वधू वरण

विवाह के अयोग्य वर- शास्त्र की आज्ञा है कि वृद्ध, गुणहीन, मूर्ख, दरिद्री, रोगी, बदनाम, घृणित, अति क्रोधी, अपभाषक, विकलांग, नपुंसक, आदि वर से कन्या का विवाह न करें। मुख्यतः कुल, स्वास्थ्य व रोजगार इन तीनों बातों को वर के विषय में अच्छी प्रकार से देख लेना चाहिए।

धर्मशास्त्र में वर और वधू के वरण करने के प्रसङ्ग में काफी विचार हुआ है। विष्णुस्मृति (अध्याय ६९) में अधिक या कम अङ्गों वाली, अधिक अवस्था वाली और अत्यधिक भारी कन्या से विवाह करने को मना किया गया है-

न हीनाङ्गी नाधिकाङ्गीं तथैव च वयोधिकाम् । नोपयाद् गुर्विणी नारीं दीर्घमायुर्जिजीविषुः ।।

बृहत्पराशरस्मृति, ६।२८, ३१-३२ ने लगभग इन्हीं बातों का उल्लेख किया है, जिनका विवेचन महर्षि वात्स्यायन ने किया है। वे अप्रियवादिनी, प्रखर स्वर वाली, अतिभाषिणी, पर्वतनाम्नी और भीषणनाम्नी का भी अवरणीयाओं में उल्लेख करते हैं, रोगिणी का तो होना ही नहीं चाहिए-

वर्जयेदतिरिक्ताङ्गी

कन्यां

हीनाङ्गरोगिणीम् ।

अतिलोम्नीं

हीनलोम्नीमवाचमतिवाग्युताम् ।।

पिङ्गलां-कपिलां-कृष्णां

दुष्टवाक्काकनिः स्वनाम् ।

स्थूलांगं-जङ्घ-पादां


सदा चाऽप्रियवादिनीम् ।।
वर-वधू वरण


त्येजेन्त्रग-नदीनाम्नीं पक्षि

वृक्षक्षनामिकाम् ।

अहि-प्रेष्या-ऽन्त्यनाम्नी च तथा भीषणनामिकाम् ।।

मनुस्मृति (३।८-९) के विचार भी इसी के अनुरूप हैं। उनकी सूची पर भी दृष्टिपात् आवश्यक है-

नोदवहेत् कपिलां कन्यां नाधिकाङ्गीं न रोगिणीम् ।

नालोमिकां नातिलोमा न वाचाटां न पिङ्गलाम् ।।

नर्क्षवृक्षनदीनाम्नीं नान्त्यपर्वतानमिकाम् ।

न पक्ष्यहिप्रेष्यनाम्नीं न च भीषणनामिकाम् ।।

नातिस्थूलां नातिकृशां न दीर्घा नातिवामनाम् ।

वयोधिकां नाङ्गहीनां न सेवेत्कलहप्रियाम् ।।

इतना ही नहीं मनुस्मृति (३।७) ने ऐसे कुलों का भी उल्लेख किया है जिनसे वैवाहिक सम्बन्ध नहीं करने चाहिए। ये कुल इस प्रकार है-

जो जातकर्म आदि संस्कार से हीन हों।

जिनमें सदैव कन्या ही उत्पन्न होती हो। जो वेद में निष्ठा न रखते हों।

जिन कुलों में पुरुषों के शरीर पर बाल उगते हों।

जिस कुल में राजयक्ष्मा (टी.बी.), मन्दाग्नि, मृगी, श्वेतकुष्ठ और गलितकुष्ठ आदि रोग हों या हुए हों-

हीनक्रियं निष्पुरुषं निश्छन्दो रोमशार्शसम् ।

क्षय्यामयाव्यपस्मारिश्चित्रिकुष्ठि कुलानि च ।। कात्यायन ने वर के दोषों की विवेचना की है। उनके अनुसार वर के दोष इस प्रकार हैं- पागलपन, अपराध, कुष्ठता, नपुंसकता, स्वगोत्रता, अन्धापन, बहिरापन और मिर्गी। उन्होंने कन्या के लिए भी यही बातें कहीं है-

उनमत्तः पतितः कुष्ठी तथा षण्ढः स्वगोत्रजः । चक्षुः श्रोत्रविहीनश्च तथापस्मारदूषिता ।। वरदोषाः स्मृता होते कन्यादोषाश्च कीर्तिताः ।

धर्मशास्त्र के इन उल्लेखों पर विचार आवश्यक है। यदि धर्मशास्त्रों के वचनों पर विचार करना है तो उन्हें तीन वर्गों में विभक्त करना आवश्यक है-

(१) कुलसम्बन्धी, (२) कन्यासम्बन्धी और (३) नामसम्बन्धी। कुलसम्बन्धी-धर्मशास्त्र में कुल को सबसे अधिक महत्त्व दिया गया है।
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वर-कन्या कुण्डली मेलापक

आश्वलायनगृह्यसूत्र (१।५।१) ने कुल को सर्वोपरि स्थान दिया है और लगभग यही बात मनु (मनुस्मृति, २।२४४) ने कही है।

आज भी लोक में यह वाक्य प्रचलित है 'बेटी भले ही काणी हो, लेकिन जात काणी न हो'। मनु ने हीनता और रोगग्रस्तता के आधार पर दस कुलों से विवाह सम्बन्ध न करने का निर्देश दिया है।

महर्षि वात्स्यायन ने ऐसे कुल की कन्या से विवाह करने का परामर्श दिया है जो सदाचारी हो, विशाल एवं प्रभाव वाला हो। जिन कुलों में मिर्गी, राजयक्ष्मा, कुष्ठ आदि का रोग हों या पहले रहे हों, उन कुलों की कन्याओं से भी विवाह नहीं करना चाहिए; क्योंकि ये रोग कई पीढ़ी पश्चात् भी उदित हो सकते हैं।

कन्यासम्बन्धी-विवाह में सबसे महत्त्वपूर्ण कन्या ही है, अतः उस पर सबसे अधिक विचार किया गया है। उसके व्यक्तित्व को साधारणतः तीन रूपों में देखा जा सकता है-

प्रथम, उसमें कोई शारीरिक न्यूनता न हो। वह अधिकांगी, हीनांगी, कुरुप, बेडौल, अत्यधिक मोटी या छोटी, अत्यधिक लम्बी या अवस्था में बड़ी न हो। विष्णुपराण (३।१०।१८-२२) का कहना है कि कन्या के अधर या चिबुक पर बाल नहीं होने चाहिए, उसका स्वर कोढ की भाँति कर्कश नहीं होना चाहिए, उसके घुटने और पैरों पर बाल नहीं होने चाहिए और हँसते समय गालों में गड्ढे नहीं पड़ने चाहिए।

द्वितीय, वह शोभन व्यक्तित्व वाली हो, उसके अङ्ग प्रत्यंग सुन्दर एवं आकर्षक हों, और व्यक्तित्व निर्दोष हो अर्थात् वह आलसी, अत्यधिक भावुक, वाचाल, मूक, अप्रियवादिनी आदि दोषों से युक्त न हो।

तृतीय, वह किसी रोग से पीड़ित, किसी की वाग्दत्ता या किसी पुरुष द्वारा दूषित न की गई हो। उसका स्त्रीत्व सुनिश्चित हो और वह अक्षतयोनि हो।

नामसम्बन्धी-धर्मशास्त्र में कन्या के नामों को भी विशेष महत्त्व दिया गया है। उसका नामकरण नदी, पर्वत, सर्प, नक्षत्र आदि के आधार पर न किया गया हो और नाम के अन्त में ल-और र अक्षर न आते हो। यहाँ इन पर तनिक विस्तार से विचार कर लेना चाहिए।

नदी निम्नगा (नीचे की ओर जाने वाली) होती है और वह कूलों को तोड़कर मार्ग बना लेती है। समाज मर्यादारूपी तटों के मध्य ही विकसित होता है। यहाँ न किसी व्यक्ति को मर्यादा तोड़ने का अधिकार है और न निम्नगामी त्रत्तियों को स्वीकारने का।


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साथ ही नदी, वापी आदि सार्वजनिक स्नान के साधन हैं। कन्या को न कुल की मर्यादा को तोड़ने का अधिकार है और न कुल-वधू होने के कारण निम्न प्रवृत्तियों को स्वीकारने का ही, वह सार्वजनिक भोग की वस्तु भी नहीं है।

यदि नदीपरक नाम होगा तो प्रबुद्ध और संवेदनशील व्यक्ति तो यही सोचेगा कि नदी में सभी स्नान करते हैं। कुछ नदियों के नाम भी ऐसे ही हैं। नर्मदा 'नर्मं रतिसुखं दा ददाति या' ऐसा ही नाम है जिसकी व्युत्पत्ति श्लील या शुभ नहीं है।

सत्ताईस नक्षत्र किसी-न-किसी राशि के अंश हैं। सवा दो नक्षत्रों की एक राशि होती है। सत्ताईस नक्षत्रों को चार-चार चरणों में विभक्त कर नौ-नौ चरणों की राशि बनायी जाती है।

सूर्य और चन्द्रमा इन राशियों और नक्षत्रों में भ्रमण करते रहते हैं। जिस दिन सूर्य का संचार जिस नक्षत्र विशेष में होता है, उस दिन वह नक्षत्र याम्योत्तर मण्डल का उललंघन करता है, जिसे परगमन भी कहा जाता है।

इन नक्षत्रों के नाम वाली कन्याओं में परगमन या मर्यादा उल्लंघन की प्रवृत्ति न हो, इसलिए नक्षत्र नाम वाली कन्याओं के साथ विवाह का निषेध किया गया है।

ऐसी भी कथा है कि दक्ष प्रजापति ने अपनी अश्विनी, भरिणी आदि सत्ताईस कन्याओं का चन्द्रमा के साथ विवाह किया था जिनमें रोहिणी प्रमुखता पा सकी। कन्याओं के चरित्र पर इस प्रकार की कथाओं का प्रभाव न पड़े, इसलिए ये नाम उचित नहीं माने गये हैं।

पर्वत जड़ भी है और सार्वजनिक उपभोग के स्थल भी, सर्प भयंकरता का प्रतीक है, भयंकर नामवाली- डाकिनी, ताड़का आदि कन्याओं पर नाम की भयंकरता का प्रभाव न पड़े इसलिए इन नामों को उचित नहीं माना गया है।

महर्षि वात्स्यायन ने उन कन्याओं के साथ विवाह का भी निषेध किया है जिनके नाम के अन्त में ल और र अक्षर आते हैं। पाणिनि ने ल का अर्थ लेना और रमण करना तथा र का अर्थ देना और रमण करना माना है। यदि कन्या इनके अर्थों को हृदयंगम कर ले, तो उस पर मादक प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। अतः वात्स्यायन ने इन नाम वाली कन्याओं के साथ विवाह का निषेध किया है।

वस्तुतः नामपरक धारणाओं के पीछे धर्मशास्त्रकारों और महर्षि वात्स्यायन का यह विश्वास रहा है कि जो व्यक्ति उन नामों के अर्थों को हृदयंगम करेगा,
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उस पर उस नाम का अभद्र प्रभाव अवश्य पड़ेगा। अतएव नाम रम्य और सात्त्विक प्रभाव वाले होने चाहिए।

लड़की का मोहिनी, कामिनी नाम रखना उचित नहीं है। ऐसे नाम नहीं रखने चाहिए जो सार्वजनिक उपभोग या मर्यादा उल्लंखन को प्रेरित करते हों। यदि कन्या का नाम अप्सराओं (उर्वशी, रम्भा आदि) हैं, तो उसमें कहीं- न-कहीं अप्सरण या अनिन्द्य सौन्दर्यजन्य अहंकार अवश्य उत्पन्न होगा, यदि वह अर्थ को हृदयंगम कर लेती है।

वस्तुतः 'नक्षत्राख्यां नदीनाम्नीं यह श्लोक धर्मशास्त्र का है। महर्षि वात्स्यायन ने इसे 'कामसूत्र' में स्थान देकर यह दिखाया है कि कामशास्त्र धर्मशास्त्र के विरुद्ध नहीं कैसे हो सकता है। अतः धर्म के अनुकूल ही विवाह और कामसेवन करना उचित है। वे सामाजिक मर्यादा और शिष्टाचार के पक्षधर हैं, असामाजिक या ऐकान्तिक भोगों के समर्थक नहीं।

- धर्मशास्त्र में स्पष्ट किया गया है कि कन्या वर से कम-से-कम तीन या आठ-दस वर्ष तक छोटी होनी चाहिए। इस विषय में किसी निश्चित नियम का बन पाना असम्भव है।

- सारतः ही कहा जा सकता है कि वर की अवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य, आय, सम्पदा, स्वभाव और परिस्थितियों को ध्यान में रखकर ही तदनुकूल कन्या की खोज की जानी चाहिए। वर और कन्या, दोनों के गुणों और स्वभावों की पूरी खोज कर ली जानी चाहिए। विवाहोपरान्त दोनों को एक-दूसरे के साथ पर्याप्त स्नेह-सहयोग रखना चाहिए- यही दाम्पत्य जीवन की सफलता का रहस्य है।

कन्या पक्ष के विशाल और समृद्ध होने पर भी जिस कन्या को देखकर मन में अनुराग और नेत्रों में प्रीति उत्पन्न हो जाये, उसी की पत्नी रूप में प्राप्ति से त्रिवर्ग-धर्म, अर्थ और काम की सिद्धि होती है, अन्य से विवाह करने पर त्रिवर्ग की प्राप्ति नहीं होती है। यह उत्तम पक्ष है। जिसे देखकर मन अनुरक्त न हो और नेत्रो में प्रिति उत्पन्न न हो, उससे विवाह करना उत्तम नहीं, अधम है। केवल कन्यापक्ष की विशालता और समृद्धि देखकर विवाह नहीं करना चाहिए, कन्या को ही प्राथमिकता देनी चाहिए, वही उचित है। यदि कन्या में दो दिखे, तो भले ही नयनप्रीति और मन की आसक्ति हो, विवाह कदापि नहीं करना चाहिए। ऐसी

स्थिति में दोषों की लघुता-गुरुता का विचार अवश्य कर लेना चाहिए, तभी

सम्बन्ध निश्चित करना चाहिए।

आपस्तम्ब धर्मसूत्र का भी यही मत है कि जिस कन्या में मन और नेत्र निरन्तर लगे रहें, उसी से विवाह करने में ऋद्धि होती है


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