भोजन के संदर्भ आचार

👉 भोजन के संदर्भ आचार 

*👉भोजन के पश्चात क्या करना चाहिए आैर क्या वर्जित है ?-६*
*🚩भोजन के समय क्या करना चाहिए आैर क्या नही ?-०१*
भोजन से संबंधित आचारों का विभाजन प्रमुखतः तीन भागों में किया जा सकता है – भोजनपूर्व आचार, भोजन के समय के आचार एवं भोजनोपरांत आचार । भोजन के समय के सर्व आचार क्रमशः आगे दिए हैं ।

*♦️१. भोजन के समय के आचार*
▪️अ. दाहिने हाथ से भोजन करें । छोटे बच्चों को भी दाहिने हाथ से भोजन करने का अभ्यास कराएं ।

▪️आ. अन्न का ग्रास लेते समय पांचों उंगलियों का प्रयोग करें । यथासंभव कांटेचम्मच से न खाएं ।

▪️इ. दाल-चावल एवं उसपर घी, इनसे भोजन आरंभ करें । भोजन के आरंभ में भारी, स्निग्ध, मीठे, शीत एवं गाढे पदार्थ सेवन करें । भोजन के बीच में खट्टे एवं खारे पदार्थ तथा भोजन के अंतमें तीखे एवं कडवे पदार्थ सेवन करें ।

▪️ई. भोजन करते समय प्रत्येक ग्रास अनेक बार (३२ बार) चबाएं ।

▪️उ. भोजन करते हुए मध्यमें अल्प जल पीएं ।

जलपात्र को (गिलास को) मुख लगाकर जल पीएं; ऊपर से न पीएं ।
बाएं हाथ में जलपात्र लेकर दाहिना हाथ उलटा कर जलपात्र के निचले भाग को आधार देकर जल पीएं ।
उच्छिष्ट (जूठे) हाथ से जल न पीएं ।
ग्रीवा उठाकर जल न पीएं ।
जल पीते समय ‘गट् ऽ गट् ऽ’, ऐसी ध्वनि न करें ।
ऊ. भोजन के समय बाएं हाथ से अन्न परोसकर न लें; दूसरे को परोसने के लिए कहें । दूसरे द्वारा परोसना संभव न हो, तो प्रार्थना कर नामजप करते हुए अपने बाएं हाथ से अन्न लें ।

▪️ए. भोजन करते समय उदरके दो भाग अन्न से, तीसरा भाग जल से भरें एवं चौथा भाग वायु के संचरण हेतु रिक्त (खाली) रखें ।

▪️एे. थाली में अन्न न छोडें । थाली में अन्न छोडने पर प्रायश्चित करें ।

▪️ओ. ‘अन्नदाता सुखी भव ।’ अर्थात ‘हे अन्नदाता, आप सुखी रहें !’, ऐसा कहकर उपास्यदेवता एवं श्री अन्नपूर्णादेवी के चरणों में भावपूर्ण कृतज्ञता व्यक्त कर पीढे से उठें ।


Comments

Popular posts from this blog

वर-कन्या कुण्डली मेलापक

रामायण की लगभग सभी कथाओं से हम परिचित ही हैं

भारतीय रसोई के चूल्हे की राख में ऐसा क्या था कि, वह पुराने जमाने का Hand Sanitizer थी ...?