सत्य सनातन धर्म के बारे में (भाग 1)

बहुत से लोग हिंदू धर्म को, सनातन धर्म से  अलग मानते हैं। वे कहते हैं कि हिंदू नाम तो विदेशियों ने दिया। पहले इसका नाम सनातन धर्म ही था। फिर कुछ कहते हैं कि नहीं। पहले इसका नाम आर्य धर्म था। कुछ कहते हैं कि इसका नाम वैदिक धर्म था। हालांकि इस संबंध में विद्वानों के अलग-अलग मत हैं।

      सनातन धर्म जिसे हिंदू धर्म अथवा वैदिक धर्म भी कहा जाता है। इसका लगभग 1,96,58,83,110 वर्ष का इतिहास है। सनातन धर्म को, हमारे हिंदू धर्म के वैकल्पिक नाम से भी जाना जाता है। सनातन का अर्थ है। सारस्वत या हमेशा बना रहने वाला अर्थात जिसका न आदि है। और न अंत।

      सनातन धर्म मूलतः भारतीय धर्म है। जो किसी समय, पूरे भारतीय उपमहाद्वीप तक व्याप्त रहा है। विभिन्न कारणों से हुए, भारी धर्मांतरण के बाद भी, विश्व के इस क्षेत्र की  बहुसंख्यक आबादी। इसी धर्म में आस्था रखती है। मूल सनातन धर्म का प्रतीक चिन्ह ॐ ही नहीं। बल्कि यह सनातन परंपरा का सबसे पवित्र शब्द है।

     ऋग्वेद के अनुसार, समस्त देवता और मनुष्य इसी मार्ग से पैदा हुए हैं। तथा वृद्धि की है। हे मनुष्यों आप अपने उत्पन्न होने की आधार रूपा, अपनी मां को नष्ट न करें।

Read : Science Behind Sanatan Rituals,Tradition and Culture। सनातन परंपराओं के पीछे का वैज्ञानिक कारण।

व्यक्तित्व विकास में सनातन धर्म के संस्कारों का विशेष महत्व है। इनका उद्देश्य शरीर, मन और मस्तिष्क की शुद्धि और उनको बलवान करना है जिससे मनुष्य समाज में अपनी भूमिका आदर्श रूप मे निभा सके। संस्कार का अर्थ होता है-परिमार्जन-शुद्धीकरण। हमारे कार्य-व्यवहार, आचरण के पीछे हमारे संस्कार ही तो होते हैं। ये संस्कार हमें समाज का पूर्ण सदस्य बनाते हैं। मनु और याज्ञवल्य ने कुल 13 संस्कारों की चर्चा की है, लेकिन बाद में कुल 16 संस्कार बताए गए। इनमें तीन जन्म के पहले, आठ जन्म के बाद विवाह तक, विवाह और उपसंवेशन [वर-वधू मिलन] और अंत्येष्टि [श्राद्घ] होते हैं। इस तरह भी कुल 13 ही संस्कार हुए। कुछ लेाग विवाह और उपसंवेशन को एक ही मानते हैं। कुछ लोग वानप्रस्थ और संन्यासग्रहण के पहले होने वाले कर्मकांड को इसी में शामिल करते हैं। कुछ ग्रंथों में श्राद्ध को संस्कार माना गया है कुछ में नहीं, लेकिन आजकल इसे भी संस्कार माना जाता है। ये संस्कार पूर्वजन्म के दोषों का दूर करने और नए गुणों का समावेश करने के लिए किए जाते हैं, जिससे मनुष्य अपनी सहज वृत्तियों का विकास करके अपना और समाज का कल्याण कर सके। 

★अरुणोदयः★   ०२/०४/२३   सनातन धर्मस्य संस्कारणाम व्यक्तित्व विकासे अपि अति महत्वं अस्ति। तेषां उद्देश्यं शरीरं, मनः, मस्तिष्कं च शुद्धं, सुदृढीकरणं च भवति येन मनुष्यः समाजे आदर्शरूपेण स्वस्य भूमिकां कर्तुं शक्नोति।  संस्कार अर्थ - शुद्धि - शुद्धि।  अस्माकं कार्यव्यवहारस्य आचरणस्य च पृष्ठतः अस्माकं मूल्यानि सन्ति।  एते मूल्यानि अस्मान् समाजस्य पूर्णसदस्यान् कुर्वन्ति।  मनुः यज्ञवल्या च कुलम् १३ संस्काराणां चर्चां कृतवन्तौ, परन्तु पश्चात् कुलम् १६ संस्कारानाम् उल्लेखः अभवत् ।  एतेषु जन्मत्रयात् पूर्वं विवाहपर्यन्तं अष्टजन्मानन्तरं विवाहः उपसम्मेलनं च [वधूवधूसमागमः] अन्त्येष्टिः च [श्राधः  एवं प्रकारेण केवलं १३ संस्काराः एव कृताः ।  केचन जनाः विवाहं उपसम्मेलनं च समानं मन्यन्ते ।  केचन जनाः निवृत्ति-निवृत्ति-पूर्वं भवन्ति संस्कारान् समावेशयन्ति ।  केषुचित् ग्रन्थेषु श्राद्धं संस्कारं मन्यते, केषुचित् न, परन्तु अद्यत्वे तत् संस्कारमपि मन्यते ।  एते संस्काराः पूर्वजन्मदोषान् दूरीकर्तुं नूतनगुणान् समावेशयितुं च क्रियन्ते येन मनुष्यः स्ववृत्तिविकासेन स्वस्य समाजस्य च कल्याणं कर्तुं शक्नोति । 

★Arunodaya★ 02/04/23 Sanskars of Sanatan Dharma have special importance in personality development.  Their aim is to purify and strengthen the body, mind and brain so that man can play his role in the society ideally.  Sanskar means - purification - purification.  Behind our work-behavior and conduct are our values.  These values ​​make us full members of the society.  Manu and Yajnavalya have discussed a total of 13 samskaras, but later a total of 16 samskaras were mentioned.  In these, before three births, after eight births till marriage, there are marriage and sub-conventions [bride-bride meeting] and funerals [shradh].  In this way only 13 samskaras were performed.  Some people consider marriage and sub-convention to be the same.  Some people include the rituals that take place before retirement and retirement.  In some texts, Shraddha is considered a sacrament, in some it is not, but nowadays it is also considered a sacrament.  These rites are performed to remove the defects of previous birth and to incorporate new qualities, so that man can do welfare of himself and the society by developing his instincts.  
सनातन का अर्थ
Sanatan Meaning
  हम इसकी परिभाषा अक्सर यह कह कर देते हैं। जो पुरातन है, सनातन है। बस वही सनातन हो गया। यह पुराना है। यह तो सत्य है। लेकिन इसके साथ, यह भी एक विकृत भाव आ जाएगा। जो पुराना है, अर्थात वो कभी नया रहा होगा। जो कभी नया था। वह कभी बना भी होगा। उसकी शुरुआत भी होगी। 

     एक समय आने पर, वह पुराना समाप्त भी हो जाएगा। तो क्या सनातन धर्म भी समाप्त हो जाएगा। अगर हम कहें कि जो पुरातन हैं, वही सनातन है। लेकिन सनातन का अर्थ पुराना नहीं है। गीता में दूसरे अध्याय के, 24वें श्लोक में, बड़ा स्पष्ट उत्तर दिया गया है। श्री कृष्ण कहते हैं-

अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च |

नित्य: सर्वगत: स्थाणुरचलोऽयं सनातन: ||

       अर्थात हे अर्जुन! जो छेदा नहीं जाता। जलाया नहीं जाता। जो सूखता नहीं। जो गीला नहीं होता। जो स्थान नहीं बदलता। वो कौन है। ऐसे रहस्यमय व सात्विक गुण तो केवल परमात्मा में ही होते हैं। जो सत्ता इन दैवीय गुणों से परिपूर्ण हो। वही सनातन कहलाने के योग्य है।     

 अर्थात ईश्वर ही सनातन है। जो न तो कभी नया रहा। न ही कभी पुराना होगा। न ही इसकी शुरुआत है। न ही इसका अंत है। अर्थात ईश्वर को ही सनातन कहा गया है। हम अपने अस्तित्व की परिभाषा देते हुए कहते हैं कि हम सनातनी हैं। सनातन धर्म के अनुयाई हैं। हम सनातनी तब बनेंगे। जब ऐसे दैवी गुण, हमारे अंदर भी आ जाएं।

Read : 16 Sanskar of Vedic Sanatan Dharma। जन्म से मृत्यु तक के सोलह संस्कार ।

सनातनी कैसे बनें
How to Become Sanatani
  हमारे अंदर ऐसे दैवी गुणों का अभाव है। तो अभी हम सनातनी नहीं है। तो फिर हम सनातनी कैसे बने। कबीर दास जी एक जगह अपने भाव को प्रकट करते हुए कहते हैं।

अब मन उलटि सनातन मूवा, तब हम जानों जीवन मूवा।

      अर्थात ध्यान की उच्चतम अवस्था में, हम ईश्वर से एकाकार हो जाते हैं। उसी में विलय होकर, उसी का रूप हो जाते हैं। उस अवस्था को सनातन कहा गया है। यह अवस्था तब आती है। जब हमारी दिव्य दृष्टि खुलती है। कोई संत महापुरुष, हमारे दिव्य नेत्रों को खोलकर। बाहर भटक रहे, हमारे चंचल मन को, हमारे अंदर प्रवेश करवाते हैं।

     जब हम इस अवस्था को महसूस करते हैं। तो इस अवस्था को कहा गया है कि अब आप सनातन हो चुके हो। हमारा मन अंदर की ओर उलट गया। हम ईश्वर से मिल गए। उसमें एकाकार हो गए। इस अवस्था को सनातन कहा गया है। 

    अतः हम केवल कोरे भाषणों से अथवा कोरे वाक्यों से, सनातनी न बने। बल्कि गीता व शास्त्रों के आधार पर, हम सनातनी बने। फिर देखिए, हमारा जीवन ही कुछ अलग होगा। उसका आनंद ही कुछ अलग होगा।

 स्वस्तिक का सनातन धर्म मे क्या महत्व है । 

सनातन और हिन्दू धर्म में अंतर
Sanatan Dharma Vs Hinduism
  बचपन से ही हम सुनते आ रहे हैं कि हमारा धर्म हिंदू है। जो लोग यह मानते हैं कि उनका धर्म हिंदू है। उन्हें यह जानकर बहुत हैरानी होगी कि दुनिया भर में हिंदू नाम का कोई धर्म है, ही नहीं। तो अगर हिंदू कोई धर्म है, ही नहीं। तो हिंदू क्या है। क्या हिंदू एक अंधविश्वास है। क्या हिंदू एक अलग धर्म है। क्या हिंदू सनातन धर्म का ही एक और नाम है। तो इसे जानने की कोशिश करते हैं।

        शायद आपको पता हो कि 5000 साल पहले कुछ सैलानी भारत आए थे। उस समय भारत का क्षेत्र बहुत विस्तृत था। अगर आप मानचित्र में देखें। तो ऊपर की तरफ, एक पर्वत श्रंखला है। जिसका नाम हिंदूकुश पर्वत है। जैसे हिमालय पर्वत है। वैसे ही हिंदू कुश पर्वत भी है। तो जब सैलानी भारत आए। 

       तो उनके लिए या तो  हिंदूकुश पर्वत के आगे लोग थे। या उसके पीछे लोग थे। जैसा कि आपको पता है। भारत में प्राचीन समय से विभिन्नता रही है। मतलब भारत में अलग-अलग तरह के धर्म रहे हैं। तब उन सैलानियों को, अलग-अलग धर्म का नाम देने से अच्छा लगा। कि वह उन सबको एक नाम दे दें।

      तब उन्होंने कहा कि हिंदू कुश पर्वत के आगे जितने भी लोग हैं। उन सबको हिंदू कहा जाए। तो हिंदू कोई धर्म नहीं है। न हीं हिंदू, कोई सनातन धर्म का दूसरा नाम है। न हीं हिंदू कोई अंधविश्वास है। बल्कि हिंदू एक समाज है। तो जो लोग अपने आपको हिंदू मानते हैं। उन सब का धर्म सनातन ही है।

Read : Importance and Benefits of Havan Rituals in Sanatan । हवन का महत्व व फायदे ।

सनातन धर्म - मूल तत्व
Sanatan Dharma - Fundamentals
 सनातन धर्म के मूल तत्व इस प्रकार हैं- सत्य, अहिंसा, दया, क्षमा, दान, जप, तप, यम, नियम आदि है। इन सब का सारस्वत महत्व है। सनातन धर्म में मुख्य रूप से चार वेद हैं – ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। 

       ऋग को धर्म, यजु को मोक्ष, साम को काम तथा अथर्व को अर्थ भी कहा जाता है। इन्हीं के आधार पर धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, कामशास्त्र और मोक्षशास्त्र की रचना की गई। वैदिक या हिंदू धर्म को इसलिए सनातन धर्म कहा जाता है। क्योंकि यही एकमात्र धर्म है। जो ईश्वर आत्मा और मोक्ष को, तत्व और ध्यान से जानने का मार्ग बताता है।

       मोक्ष की अवधारणा इसी धर्म की देन है। एकनिष्ठता, ध्यान, मौन और तप सहित, यम-नियम के अभ्यास और जागरण का मोक्ष मार्ग हैं। अन्य कोई मोक्ष का मार्ग नहीं है। मोक्ष से ही आत्मज्ञान और ईश्वर का ज्ञान होता है। यही सनातन धर्म का सत्य है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष में मोक्ष अंतिम लक्ष्य है।

      यम, नियम, अभ्यास और जागरण से ही मोक्ष मार्ग निश्चित होता है। जन्म और मृत्यु मिथ्या है। जगत ब्रह्मपूर्ण है। ब्रह्मा और मोक्ष ही सत्य है। मोक्ष से ही ब्रह्मा, हुआ जा सकता है। इसके अलावा स्वयं के अस्तित्व को पूर्ण करने का कोई उपाय नहीं। 

      ब्रह्मा के प्रति ही समर्पित रहने वाले को ब्राह्मण। ब्रह्म को जानने वाले को ब्रह्मर्षि और ब्रह्मा को जानकर, ब्रह्ममय में हो जाने वाले को ही ब्रह्मलीन कहते हैं।

असतो मा सद्गमय।

तमसो मा ज्योतिर्गमय।

मृत्योर्मामृतं गमय ॥

 इसका भावार्थ है कि जो लोग उस परम तत्व, परब्रह्म परमेश्वर को नहीं मानते हैं। वे असत्य में गिरते हैं। असत्य से मृत्यु काल में, अनंत अंधकार में पड़ते हैं। उनके जीवन की गाथा, भ्रम और भटकाव की ही गाथा सिद्ध होती है। वह कभी अमृत्व को प्राप्त नहीं  होते। मृत्यु आए इससे पहले ही सनातन धर्म के, सत्य मार्ग पर आ जाने में ही भलाई है।

     अन्यथा अनंत योनियों में भटकने के बाद, प्रलय काल के अंधकार में पड़े रहना पड़ता है। सनातन धर्म के सत्य को जन्म देने वाले। अलग-अलग काल में, अनेक ऋषि हुए हैं। उक्त ऋषियों को दृष्टा कहा जाता है। अर्थात जिन्होंने सत्य को जैसा देखा, वैसा कहा। इसीलिए सभी ऋषियों की बातों में एकरूपता है।

       जो उक्त ऋषियों की बातों को नहीं समझ पाते। वही उसमें भेद करते हैं। भेद भाषाओं में होता है। अनुवादको में होता है। संस्कृतियों में होता है। परंपराओं में होता है। सिद्धांतों में होता है। लेकिन सत्य में नहीं।

Read : Importance of Vedas in Our Life in Hindi | जानिए चारों वेदों मे क्या है । 

हिन्दू धर्म के अनुसार पुराणों की संख्या
Number of Puranas According to Hinduism
 हिंदू धर्म के अनुसार, पुराणों की कुल संख्या 18 बताई गई है। इसमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वर्णन किया गया है। त्रिदेव में प्रत्येक को 6 – 6 पुराण समर्पित किए गए है। इनका संकलन महर्षि वेदव्यास जी ने देव वाणी संस्कृत में किया है। सभी पुराणों के नाम इस प्रकार हैं-

पुराणों के नाम

ब्रह्म पुराण

मार्कंडेय पुराण

स्कंद पुराण

पद्म पुराण

अग्नि पुराण

वामन पुराण

विष्णु पुराण

भविष्य पुराण

कुर्मा पुराण

वायु पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

मत्स्य पुराण

भागवत

पुराण

लिंग पुराण

गरुण पुराण

नारद पुराण

वाराह पुराण

ब्रह्मांड पुराण

 वेद कहते हैं कि ईश्वर अजन्मा है। उसे जन्म लेने की आवश्यकता नहीं। उसने कभी जन्म नहीं लिया। वह कभी जन्म नहीं लेगा। ईश्वर तो एक ही है। लेकिन देवी-देवता और भगवान अनेक हैं। लेकिन उस एक को छोड़कर, उक्त अनेक के आधार पर नियम, पूजा, तीर्थ आदि कर्मकांड को सनातन धर्म का अंग नहीं माना जाता। यही सनातन सत्य है।

।।सत्यम धर्म सनातनम ।।

 सनातन धर्म का मूल सत्य नासा कर्मणा वाचा के सिद्धांत के अनुसार, मनुष्य के मन, वाणी तथा शरीर द्वारा एक जैसे कर्म होने चाहिए। ऐसा हमारे धर्मशास्त्र कहते हैं। मन में कुछ हो, वाणी कुछ कहे और कर्म सर्वथा इनसे भिन्न हो। इसे ही मिथ्या आचरण कहा गया है।

कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्।

इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते।।

      श्री गीता जी में लिखा है कि मूढ़ बुद्धि मनुष्य समस्त इंद्रियों को हठपूर्वक ऊपर से रोककर, उन इंद्रियों के विषयों का चिंतन करता है। वह मिथ्याचारी अर्थात घमंडी कहा जाता है।

       कैकई ने दशरथ से भगवान श्री राम के वनवास जाने का वर मांगा। वचन से बंध  जाने के कारण, भगवान श्री राम ने अपने पिता के वचन धर्म की रक्षा करने हेतु, वन गमन स्वीकार किया।

रघुकुल रीति सदा चली आई।

प्राण जाए पर वचन न जाई ।।

     हमारे धर्म शास्त्रों में, वचन धर्म को अत्यधिक महत्व दिया गया है। इसी में धर्म का मर्म एवं शास्त्र मर्यादा के पालन का रहस्य छिपा हुआ है। जब स्वयंबर में अर्जुन ने द्रोपदी को प्राप्त किया। वे सब भाइयों सहित, जब अपनी माता कुंती के पास पहुंचे। तब भूलवश कुंती के मुख से, यह निकल गया। कि तुम उपहार स्वरूप जो कुछ भी लाए हो। उसे आपस में बांट लो।

        वास्तव में, यह पूर्व जन्म में भगवान शिव द्वारा द्रोपदी को दिए गए वर का परिणाम था। द्रोपदी ने भगवान शिव से सर्वगुण संपन्न पति के लिए, पांच बार प्रार्थना की थी। तब भगवान शिव के वरदान के प्रभाव से, उसे पांच पति प्राप्त हुए।

       पांडव सदैव कर्तव्य धर्म का पालन करते थे। उन्होंने अपनी माता के वचन धर्म की रक्षा की। मनुष्य का यह स्वभाव रहा है। वह परिस्थितियों को, अपने प्रतिकूल देखकर। अपने ही वचनों से मुंह फेर लेता है। लेकिन जो धर्मपरायण मनुष्य होते हैं। वे मन, वाणी और शरीर द्वारा एक जैसे होते हैं।

       सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र को केवल एक  स्वप्न आया। कि उन्होंने अपना राजपाट महर्षि विश्वामित्र को दान दे दिया है। सुबह होते ही, उन्होंने अपना संपूर्ण राज्य ऋषि विश्वामित्र को दे दिया। अपने वचनों से मुंह मोड़ लेने पर, न केवल मनुष्य की गरिमा एवं प्रतिष्ठा कम होती है। बल्कि उसकी विश्वसनीयता पर भी प्रश्न चिन्ह लग जाता है।

      उपरोक्त प्रसंगों पर उतर पाना, आधुनिक समय में किसी के लिए भी संभव नहीं है। लेकिन मनुष्य को इतना प्रयास अवश्य करना चाहिए। कि वह अपने वचनों की मर्यादा का मान रखे। जैसे कि भीष्म पितामह ने आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत रखा। वह अपने इस व्रत पर अटल रहे। वचन धर्म पालन और उसकी रक्षा के अनेकों वृतांत  हमारे धर्म ग्रंथों में हैं।

     शरणागत की रक्षा हेतु वचन इत्यादि दृष्टांत प्राप्त होते हैं। भगवान श्री कृष्ण द्वारा महाभारत के युद्ध में, शस्त्र न उठाने का वचन। समाज हित के प्रति संवेदनशीलता तथा जगत के हित को दिखाता है। ऐसा व्रत जिसमें समस्त प्राणी मात्र का कल्याण निहित हो। ऐसा वचन जिसमें किसी का अहित न हो। निश्चित रूप से सारस्वत धर्म बन जाता है। ‘सत्य धर्म सनातन’ सनातन धर्म का मूल ही सत्य है।

      हम जो कुछ भी मन के द्वारा जनकल्याण के विषय में सोचते हैं। वाणी के द्वारा उसकी अभिव्यक्ति करते हैं। कर्म के द्वारा क्रियान्वित करते हैं। इसके द्वारा शास्त्र का सिद्धांत ‘मनसा वाचा कर्मणा’ अवश्य ही चरितार्थ होता है। अगर हम वाणी के द्वारा दिखावे के तौर पर, समाज में स्वार्थ भाव के कर्म करते हैं। तो वह केवल नश्वर फल प्रदान करते हैं। जीव ‘मनसा वाचा कर्मणा’ के सारस्वत फल से वंचित रह जाता है।

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FAQ :

प्र० सनातन का अर्थ क्या है?

उ० सनातन का अर्थ है। सारस्वत या हमेशा बना रहने वाला अर्थात जिसका न आदि है। और न अंत।

 

प्र० सनातन धर्म की उत्पत्ति कैसे हुई?

उ० ईश्वर ही सनातन है। जो न तो कभी नया रहा। न ही कभी पुराना होगा। न ही इसकी शुरुआत है। न ही इसका अंत है। अर्थात ईश्वर को ही सनातन कहा गया है।

 

प्र० सनातन धर्म कितना पुराना है?

उ० सनातन धर्म जिसे हिंदू धर्म अथवा वैदिक धर्म भी कहा जाता है। इसका लगभग 1,96,58,83,110 वर्ष का इतिहास है।

 💥 *विशेष - नवमी को लौकी खाना गोमांस के समान त्याज्य है।(ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34)*
               🌞 *~ हिन्दू पंचांग ~* 🌞

🌷 *चातुर्मास्य व्रत की महिमा* 🌷

➡ *01 जुलाई 2020 बुधवार से 26 नवम्बर 2020 गुरुवार तक चातुर्मास है।*
🙏🏻 *आषाढ़ के शुक्ल पक्ष में एकादशी के दिन उपवास करके मनुष्य भक्तिपूर्वक चातुर्मास्य व्रत प्रारंभ करे। एक हजार अश्वमेघ यज्ञ करके मनुष्य जिस फल को पाता है, वही चातुर्मास्य व्रत के अनुष्ठान से प्राप्त कर लेता है।*
🙏🏻 *इन चार महीनों में ब्रह्मचर्य का पालन, त्याग, पत्तल पर भोजन, उपवास, मौन, जप, ध्यान, स्नान, दान, पुण्य आदि विशेष लाभप्रद होते हैं।*
🙏🏻 *व्रतों में सबसे उत्तम व्रत है – ब्रह्मचर्य का पालन। ब्रह्मचर्य तपस्या का सार है और महान फल देने वाला है। ब्रह्मचर्य से बढ़कर धर्म का उत्तम साधन दूसरा नहीं है। विशेषतः चतुर्मास में यह व्रत संसार में अधिक गुणकारक है।*
🙏🏻 *मनुष्य सदा प्रिय वस्तु की इच्छा करता है। जो चतुर्मास में अपने प्रिय भोगों का श्रद्धा एवं प्रयत्नपूर्वक त्याग करता है, उसकी त्यागी हुई वे वस्तुएँ उसे अक्षय रूप में प्राप्त होती हैं। चतुर्मास में गुड़ का त्याग करने से मनुष्य को मधुरता की प्राप्ति होती है। ताम्बूल का त्याग करने से मनुष्य भोग-सामग्री से सम्पन्न होता है और उसका कंठ सुरीला होता है। दही छोड़ने वाले मनुष्य को गोलोक मिलता है। नमक छोड़ने वाले के सभी पूर्तकर्म (परोपकार एवं धर्म सम्बन्धी कार्य) सफल होते हैं। जो मौनव्रत धारण करता है उसकी आज्ञा का कोई उल्लंघन नहीं करता।*
🙏🏻 *चतुर्मास में काले एवं नीले रंग के वस्त्र त्याग देने चाहिए। नीले वस्त्र को देखने से जो दोष लगता है उसकी शुद्धि भगवान सूर्यनारायण के दर्शन से होती है। कुसुम्भ (लाल) रंग व केसर का भी त्याग कर देना चाहिए।*
🙏🏻 *आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को श्रीहरि के योगनिद्रा में प्रवृत्त हो जाने पर मनुष्य चार मास अर्थात् कार्तिक की पूर्णिमा तक भूमि पर शयन करें । ऐसा करने वाला मनुष्य बहुत से धन से युक्त होता और विमान प्राप्त करता है, बिना माँगे स्वतः प्राप्त हुए अन्न का भोजन करने से बावली और कुआँ बनवाने का फल प्राप्त होता है। जो भगवान जनार्दन के शयन करने पर शहद का सेवन करता है, उसे महान पाप लगता है। चतुर्मास में अनार, नींबू, नारियल तथा मिर्च, उड़द और चने का भी त्याग करें । जो प्राणियों की हिंसा त्याग कर द्रोह छोड़ देता है, वह भी पूर्वोक्त पुण्य का भागी होता है।*
🙏🏻 *चातुर्मास्य में परनिंदा का विशेष रूप से त्याग करें । परनिंदा को सुनने वाला भी पापी होता है।*
*परनिंदा महापापं परनिंदा महाभयं।*
*परनिंदा महद् दुःखं न तस्याः पातकं परम्।।*
🙏🏻 *‘परनिंदा महान पाप है, परनिंदा महान भय है, परनिंदा महान दुःख है और पर निंदा से बढ़कर दूसरा कोई पातक नहीं है।’*
🌷 *(स्कं. पु. ब्रा. चा. मा. 4.25)*
🙏🏻 *चतुर्मास में ताँबे के पात्र में भोजन विशेष रूप से त्याज्य है। काँसे के बर्तनों का त्याग करके मनुष्य अन्य धातुओं के पात्रों का उपयोग करे। अगर कोई धातुपात्रों का भी त्याग करके पलाशपत्र, मदारपत्र या वटपत्र की पत्तल में भोजन करे तो इसका अनुपम फल बताया गया है। अन्य किसी प्रकार का पात्र न मिलने पर मिट्टी का पात्र ही उत्तम है अथवा स्वयं ही पलाश के पत्ते लाकर उनकी पत्तल बनाये और उससे भोजन-पात्र का कार्य ले। पलाश के पत्तों से बनी पत्तल में किया गया भोजन चन्द्रायण व्रत एवं एकादशी व्रत के समान पुण्य प्रदान करने वाला माना गया है।*
🙏🏻 *प्रतिदिन एक समय भोजन करने वाला पुरुष अग्निष्टोम यज्ञ के फल का भागी होता है। पंचगव्य सेवन करने वाले मनुष्य को चन्द्रायण व्रत का फल मिलता है। यदि धीर पुरुष चतुर्मास में नित्य परिमित अन्न का भोजन करता है तो उसके सब पातकों का नाश हो जाता है और वह वैकुण्ठ धाम को पाता है। चतुर्मास में केवल एक ही अन्न का भोजन करने वाला मनुष्य रोगी नहीं होता।*
🙏🏻 *जो मनुष्य चतुर्मास में केवल दूध पीकर अथवा फल खाकर रहता है, उसके सहस्रों पाप तत्काल विलीन हो जाते हैं।*
🙏🏻 *पंद्रह दिन में एक दिन संपूर्ण उपवास करने से शरीर के दोष जल जाते हैं और चौदह दिनों में तैयार हुए भोजन का रस ओज में बदल जाता है। इसलिए एकादशी के उपवास की महिमा है। वैसे तो गृहस्थ को महीने में केवल शुक्लपक्ष की एकादशी रखनी चाहिए, किंतु चतुर्मास की तो दोनों पक्षों की एकादशियाँ रखनी चाहिए।*
🙏🏻 *जो बात करते हुए भोजन करता है, उसके वार्तालाप से अन्न अशुद्ध हो जाता है। वह केवल पाप का भोजन करता है। जो मौन होकर भोजन करता है, वह कभी दुःख में नहीं पड़ता। मौन होकर भोजन करने वाले राक्षस भी स्वर्गलोक में चले गये हैं। यदि पके हुए अन्न में कीड़े-मकोड़े पड़ जायें तो वह अशुद्ध हो जाता है। यदि मानव उस अपवित्र अन्न को खा ले तो वह दोष का भागी होता है। जो नरश्रेष्ठ प्रतिदिन ‘ॐ प्राणाय स्वाहा, ॐ अपानाय स्वाहा, ॐ व्यानाय स्वाहा, ॐ उदानाय स्वाहा, ॐ समानाय स्वाहा’ – इस प्रकार प्राणवायु को पाँच आहुतियाँ देकर मौन हो भोजन करता है, उसके पाँच पातक निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं।*
🙏🏻 *चतुर्मास में जैसे भगवान विष्णु आराधनीय हैं, वैसे ही ब्राह्मण भी। भाद्रपद मास आने पर उनकी महापूजा होती है। जो चतुर्मास में भगवान विष्णु के आगे खड़ा होकर ‘पुरुष सूक्त’ का पाठ करता है, उसकी बुद्धि बढ़ती है।*
🙏🏻 *चतुर्मास सब गुणों से युक्त समय है। इसमें धर्मयुक्त श्रद्धा से शुभ कर्मों का अनुष्ठान करना चाहिए।*
🌷 *सत्संगे द्विजभक्तिश्च गुरुदेवाग्नितर्पणम्।*
*गोप्रदानं वेदपाठः सत्क्रिया सत्यभाषणम्।।*
*गोभक्तिर्दानभक्तिश्च सदा धर्मस्य साधनम्।*
🙏🏻 *‘सत्संग, भक्ति, गुरु, देवता और अग्नि का तर्पण, गोदान, वेदपाठ, सत्कर्म, सत्यभाषण, गोभक्ति और दान में प्रीति – ये सब सदा धर्म के साधन हैं।’*
🙏🏻 *देवशयनी एकादशी से देवउठी एकादशी तक उक्त धर्मों का साधन एवं नियम महान फल देने वाला है। चतुर्मास में भगवान नारायण योगनिद्रा में शयन करते हैं, इसलिए चार मास शादी-विवाह और सकाम यज्ञ नहीं होते। ये मास तपस्या करने के हैं।*
🙏🏻 *चतुर्मास में योगाभ्यास करने वाला मनुष्य ब्रह्मपद को प्राप्त होता है। ‘नमो नारायणाय’ का जप करने से सौ गुने फल की प्राप्ति होती है। यदि मनुष्य चतुर्मास में भक्तिपूर्वक योग के अभ्यास में तत्पर न हुआ तो निःसंदेह उसके हाथ से अमृत का कलश गिर गया। जो मनुष्य नियम, व्रत अथवा जप के बिना चौमासा बिताता है वह मूर्ख है।*
🙏🏻 *बुद्धिमान मनुष्य को सदैव मन को संयम में रखने का प्रयत्न करना चाहिए। मन के भलीभाँति वश में होने से ही पूर्णतः ज्ञान की प्राप्ति होती है।*
🌷 *सत्यमेकं परो धर्मः सत्यमेकं परं तपः।*
*सत्यमेकं परं ज्ञानं सत्ये धर्मः प्रतिष्ठितः।।*
*धर्ममूलमहिंसा च मनसा तां च चिन्तयन्।*
*कर्मणा च तथा वाचा तत एतां समाचरेत्।।*
🙏🏻 *‘एकमात्र सत्य ही परम धर्म है। एक सत्य ही परम तप है। केवल सत्य ही परम ज्ञान है और सत्य में ही धर्म की प्रतिष्ठा है। अहिंसा धर्म का मूल है। इसलिए उस अहिंसा को मन, वाणी और क्रिया के द्वारा आचरण में लाना चाहिए।’*
🌷 *(स्कं. पु. ब्रा. 2.18-19)* 🌷
➡ *शेष  कल........*
🌷 *(पद्म पुराण के उत्तर खंड, स्कंद पुराण के ब्राह्म खंड एवं नागर खंड उत्तरार्ध से संकलित)*

🙏🏻🌷🍀🌼🌹🌻🌸🌺💐🙏🏻

ग्रंथो की समीक्षा भी हो रही है सोशल नेटवर्किंग मंच पर वैदिक ग्रंथों में दबाए गए सत्य जो वेदों के अनुकूल है वे प्रमाण सहित उजागर हो रहे है और ग्रंथो में मिलावट भी जो वेद विरुद्ध है वो भी प्रमाण सहित उजागर हो रही है साथ साथ जातिवादी मानसिकता भी , जब इतिहास ही गलत पढ़ाया गया बताया गया तो वर्ण व्यवस्था क्या खाक सभी बताई गई 

मोक्ष प्राप्ति के शास्त्रीय प्रमाण जो वेदों के अनुकूल है सभी को जानना चाहिए।

मोक्षे धीर्ज्ञानमन्यत्र विज्ञानं शिल्प - शास्त्रयोः ।

( शब्दकल्पद्रुम)

अर्थात- मोक्ष अर्थात मुक्ति में बुद्धि ज्ञान है और कहीं ज्ञान शिल्प कौशल और शास्त्र का विज्ञान है।

बृहस्पति स्मृति में देवगुरु बृहस्पति ने शिल्प को उच्चतम विज्ञान कहा हैं यथा;

विज्ञानं उच्यते शिल्पं हेमरूप्यादिसंस्कृतिः।

(बृहस्पति स्मृति - १,१५.७)

अर्थात - विज्ञान को शिल्प, सोना, चांदी और अन्य संस्कृतियां कहा जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने भी गीता में ब्राह्मणो के कर्मो में विज्ञान अर्थात शिल्प बताया है जो निम्न है, आज कलयुग में लोग ज्ञान को विज्ञान से अलग समझने लगे है जबकि वेद ज्ञान है तो शिल्प विज्ञान है। बिना इन दोनों के कोई पूर्ण ब्राह्मण बन ही नहीँ सकता।

मोक्ष प्राप्ति के लिए शिल्प कर्म अनिवार्य है बिना शिल्प कर्म के मोक्ष प्राप्त नहीं होता । 

33 करोड़ देवी देवताओं के नाम पर कुछ स्वार्थी लोगो ने सनातनीयो को सैकडो वर्षो तक बेवकूफ बनाए रखा 

👉 ब्राह्मणो के इष्टकर्म और पूर्तकर्म* 
ब्राह्मणो के दो प्रकार के कर्मो से परिचय कराएंगे। एक है ' इस्ट ' कर्म और दूसरा है ' पूर्त ' कर्म।

इस्ट कर्म से ब्राह्मणो को स्वर्ग प्राप्ति होती है 
और पूर्त कर्मो से मोक्ष की प्राप्ति होती है। अर्थात जो ब्राह्मण इस्ट कर्म ही सिर्फ करके पूर्त कर्म ना करें उसे मोक्ष नहीं मिल सकता है जो सनातन धर्म में मनुष्यों का अंतिम लक्ष्य है। इसके प्रमाण स्वरूप कुछ धर्मशास्त्र से प्रमाण निम्न है ,

 *इस्टापूर्ते च कर्तव्यं ब्राह्मणेनैव यत्नत:।* 
 *इस्टेन लभते स्वर्ग पूर्ते मोक्षो विधियते॥* 

  - (अत्रि स्मृति)
  - (अष्टादशस्मृति ग्रन्थ पृष्ठ - ६ - पं.श्यामसुंदरलाल त्रिपाठी)

अर्थात - इष्टकर्म और पूर्तकर्म ये दोनों कर्म ब्राह्मणो के कर्तव्य है इसे बड़े ही यत्न से करना चाहिए है। ब्राह्मणो को इष्टकर्म से स्वर्ग की प्राप्ति होती है और पूर्तकर्म से मोक्ष की प्राप्ति होती है। 
इसी प्रकार की व्याख्या यम ऋषि ने भी धर्मशास्त्र यमस्मृति में की है जो निम्न है ;

 *इस्टापूर्ते तु कर्तव्यं ब्राह्मणेन प्रयत्नत:।* 
 *इस्टेन लभते स्वर्ग पूर्ते मोक्षं समश्नुते*
 
   - (यमस्मृति) 
   - (अष्टादशस्मृति ग्रन्थ पृष्ठ १०६ - पं.श्यामसुंदरलाल त्रिपाठी)

अब अत्रि ऋषि की अत्रि स्मृति नामक धर्मशास्त्र के आगे के श्लोक से इष्ट कर्म और पूर्त कर्मो के अन्तर्गत कौन से कर्म आते है उसकी व्याख्या निम्न है ;

*अग्निहोत्रं तप: सत्यं वेदानां चैव पालनम्।*
*आतिथ्यं वैश्यदेवश्य इष्टमित्यमिधियते॥* *वापीकूपतडागादिदेवतायतनानि च।* 
*अन्नप्रदानमाराम: पूर्तमित्यमिधियते॥*

  - (अत्रि स्मृति)
  - (अष्टादशस्मृति ग्रन्थ पृष्ठ - ६ - पं.श्यामसुंदरलाल त्रिपाठी)

अर्थात - ब्राह्मणो को अग्निहोत्र(हवन), तपस्या , सत्य में तत्परता , वेद की आज्ञा का पालन, अतिथियों का सत्कार और वश्वदेव ये सब इष्ट कर्म के अन्तर्गत आते है। ब्राह्मणो को बावड़ी, कूप, तालाब इत्यादि तालाबो का निर्माण, देवताओं के मंदिरों की प्रतिष्ठा जैसे शिल्पादि कर्म , अन्नदान और बगीचों को लगाना जिससे मोक्ष की प्राप्ति होती है ऐसे कर्म पूर्त कर्म है। 
उपर्युक्त सभी अकाट्य प्रमाणो से ये सिद्ध होता है कि ब्राह्मणो के सिर्फ षटकर्म जैसे इष्टकर्म ही नहीं है अपितु शिल्पकर्म जैसे पूर्तकर्म भी है जिनमें बावड़ी, कूप, तालाब इत्यादि तालाबो का निर्माण, देवताओं के मंदिरों के निर्माण एवं प्रतिष्ठा जैसे कर्म शिल्पकर्म के अन्तर्गत आते है जिसके करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है जो सनातन धर्म का अंतिम और सर्वोच्च लक्ष्य है। पूर्तकर्म (शिल्पादि कर्म) का उल्लेख अथर्ववेद में भी आया है। 
महर्षि पतंजलि ने शाब्दिक ज्ञान को मिथ्या कहा है। कल्प के व्यावहारिक ज्ञाता को ही ब्राह्मण कहा जाता है। क्योंकि उसी वेदांग कल्प के शुल्व सूत्र से शिल्पकर्म की उत्पत्ति हुई है। ब्रह्मा जी ये सृष्टि को अपनी सर्जना से कल्पित अर्थात निर्मित करते है उन्हीं ब्रह्मा जी की सृजनात्मक कल्पना शक्ति जिसमें होती है वहीं ब्राह्मण कहलाता है। सर्जनात्मक विधा ही निर्माण अर्थात शिल्पकर्म कहलाती है। 
ब्रह्मा जी का प्रमुख कर्म है सृजन अर्थात निर्माण इसी के कारण इनका पद 'ब्रह्मा ' है। ब्रह्मा जी एक दिन और रात को ' कल्प ' कहते हैं। कल्प का अर्थ होता है यज्ञ। वेदांग कल्प के शुल्व सूत्र से शिल्पकर्म की उत्पत्ति हुई हैं। वेदांग कल्प से निर्मित होने के कारण शिल्पकर्म भी यज्ञ सिद्ध होता हैं।

विश्वकर्मा कुल श्रेष्ठो धर्मज्ञो वेद पारगः।
सामुद्र गणितानां च ज्योतिः शास्त्रस्त्र चैबहि।।
लोह पाषाण काष्ठानां इष्टकानां च संकले।
सूत्र प्रास्त्र क्रिया प्राज्ञो वास्तुविद्यादि पारगः।।
सुधानां चित्रकानां च विद्या चोषिठि ममगः।
वेदकर्मा सादचारः गुणवान सत्य वाचकः।। 

(शिल्प शास्त्र) अर्थववेद

भावार्थ – विश्वकर्मा वंश श्रेष्ठ हैं विश्वकर्मा वंशी धर्मज्ञ है, उन्हें वेदों का ज्ञान है। सामुद्र शास्त्र, गणित शास्त्र, ज्योतिष और भूगोल एवं खगोल शास्त्र में ये पारंगत है। एक शिल्पी लोह, पत्थर, काष्ठ, चान्दी, स्वर्ण आदि धातुओं से चित्र विचित्र वस्तुओं सुख साधनों की रचना करता है। वैदिक कर्मो में उन की आस्था है, सदाचार और सत्यभाषण उस की विशेषता है।

 ( अध्याय ३०) के मंत्र ६ में शिल्पी को बुद्धिमता पूर्ण कार्य करने वाला कहा है व अगले मंत्र में कुशलता के लिए कारीगर शब्द कहा है। यजुर्वेद के अध्याय २९ के मंत्र 58 के ऋषि जमदाग्नि है इसमे बार्हस्पत्य शिल्पो वैश्वदेव लिखा है। वैश्वदेव में सभी देव समाहित है।

वैदिक साहित्य संस्कृत में था तो इन्होंने संस्कृत भाषा को भी अवरुद्ध कर दिया ताकि लोग वेदों को ना पढ़ सके और सत्य से दूर रहे।

इसी क्रम में मनु स्मृति में में जाति व्यवस्था के अनुसार श्लोक बना कर ठूस दिए। इसका परिणाम ये हुआ कि लोग अपने पूर्वज मनु से व उनकी नायाब रचना मनु स्मृति से भी नफरत करने लगे। पुराणों व प्रक्षेपित मनु स्मृति ने जातिवाद व अवतार वाद को खूब बढ़ावा दिया।

एक षड्यंत्र के तहत परमात्मा जिन्होंने सृष्टि सृजन किया उन्हें परमात्मा की श्रेणी से हटा दिया। क्युकी निर्माण कार्य भी तो यज्ञ ही है

ब्राह्मणों के दो भेद पोरूषेय व आर्षेय

ब्राह्मणानां कुल द्वेधा पूर्व विभजितं सुरैः । 
आर्षेय पोरूषेय च जन्म कर्म विशेषतः ॥ 

( विश्व ब्रह्म पुराण अ० २० / ८)

अर्थ – देवों ने ब्राह्मणों के कुलों के दो भाग किये। जो कि जन्म - और कर्म की विशेषता के कारण एक तो जन्म से "पौरूषेय ब्राह्मण" और दूसरे कर्म की विशेषता से "आर्षेय ब्राह्मण" कहलाये । शिल्पी ब्राह्मण जो शिल्पाचार्य महर्षि विश्वकर्मा के वंश में उत्पन्न हुए मनू , मय, त्वष्टा, शिल्पी और देवज्ञ उनकी सन्तान '' पौरूषेय ब्राह्मण '' कहलाये जो कि जन्म से ब्राह्मण हैं। और जो व्यास, वशिष्ट, पाराशर आदि तपाचरण की महिमा से कर्म करके ब्राह्मणत्व को प्राप्त किया वह " आर्षेय ब्राह्मण " नाम से प्रसिद्ध हुए ।

👉 अर्थवेद का शिल्प शास्त्र प्रमाणित करते है की विश्वकर्मा वंशी शिल्पी ब्राह्मण ही जन्मना ब्राह्मण है👇

विश्वकर्म कुले जाता गभब्राह्मणनिश्चिताः ॥
शत्वं नास्ति तद्वशे ब्राह्मणा विश्वकर्मणः ।।  

शिल्प शास्त्र (अर्थववेद)

अर्थ- श्री विश्वकर्मा कुल में जो ब्रह्मण उत्पन्न हुए है उनके वंशीय गर्भ ही से ब्राह्मणत्व ( श्रेष्ठत्व) पाते हैं। उनके वंशवालों को शूद्रत्व नहीं है 

(अर्थात् "जन्मना जायते शूद्रः इति" यह श्लोक इन का प्रमाण नहीं हो सकता) परमेश्वर के मुख के समान उत्पन्न होने के कारण यही मनु, मयादि पांचों ( विश्वकर्मा जी के पांचों पुत्र ) पंचाल ब्राह्मण चारों वर्णों में श्रेष्ठ हैं।

👉 अन्य सभी कर्म के आधार पर वेदांग के व्यवहारिक ज्ञाता ब्राह्मणत्व प्राप्त कर सकते है 👇

जन्मना जायते शूद्रः संस्कारात् भवेत द्विजः। 
वेद पाठात् भवेत् विप्रःब्रह्म जानातीति ब्राह्मणः ।। 

(स्कन्द पुराण, नागर खण्ड, 239/31-34)

अर्थात – व्यक्ति जन्मतः शुद्रवत् है। संस्कार से वह द्विज बन सकता है। वेदों के पठन-पाठन से विप्र हो सकता है। किंतु जो ब्रह्म को जान ले, वही ब्राह्मण कहलाने का सच्चा अधिकारी है।

ज्यायांसमपि_शीलेन_विहीनं_नैव_पूजयेत्।
अपि_शूद्रं_च_धर्मज्ञं_सद्वृत्तमभिपूजयेत्।। 

(महा.भा.अनुशासन. ४८/४८)

शास्त्र की आज्ञा तो यह है--
शील सद्वृत्तिसे रहित ब्राह्मण आदि की पूजा नहीं करें। यदि कोई शूद्र भी धर्मज्ञ हो, सदवृत्ति वाला हो, तो भलीभांति उसकी पूजा करें।

दास्यं तु कारयँल्लोभाद् ब्राह्मणः संस्कृताद्विजान्। 
अनिच्छतः प्राभावत्याद्राज्ञा दण्ड्यः शतानि षट् ॥

(मनुस्मृति - ८ / ४१२)

अर्थात- जो ब्राह्मण लोभ से या प्रभुत्व से उपनीत द्विजातियों से उनकी इच्छा के विरुद्ध टहलू का काम ले, राजा उसे छः सौ पण दण्ड करे।

शतपथ ब्राह्मण के बीच में यजुर्वेद 1/5 के इस मन्त्र की व्याख्या में कहा है कि मनुष्यों का आचरण दो प्रकार का होता है एक सत्य और दूसरा झुठ का अर्थात् जो पुरुष वाणी मन और शरीर से सत्य का आचरण करते हैं वे देव कहलाते है और जो झुठ का आचरण करने वाले हैं वे असुर राक्षस आदि नामों के ख्यात अधिकारी होते हैं।

यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम् ।
लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणः किं करिष्यति ॥
 
भवार्थ- जिस मनुष्य में स्वयं का विवेक, चेतना एवं बोध नहीं है, उसके लिए शास्त्र क्या कर सकता है। आंखों से हीन अर्थात् अंधे मनुष्य के लिए दर्पण क्या कर सकता है।

ये सभी वेद और वेदों के अनुकूल वैदिक ऋषिकृत शास्त्र प्रमाणित करते है वेद ही हमारी सनातन संस्कृति के फाइनल प्रमाण है वेदों में ज्ञान है विज्ञान है चमत्कार नहीं।

मनु स्मृति के अध्याय १२, श्लोक 96 में स्पष्ट लिखा है-

उत्पद्यन्ते ध्यवन्ते च यान्यतोऽन्यानि कानिचित।
तान्यर्वाक्कालिकतया निष्फलान्यनृतानि च ।।

अर्थ- वेद से अन्य मूलक जो ग्रंथ है, वे उत्पन्न व नष्ट होते रहते हैं। वे अर्वाकाल के होने से निष्फल व असत्य है। ( इसलिए जो वेद प्रमाण है वहीं सत्य है।)

मनु स्मृति के अध्याय 2 श्लोक 7 में लिखा है कि-

ये:कश्चित्कस्यचिद्धर्मो मनुना परिकीर्तितः । 
स सर्वाऽमहितो वेले सवज्ञानमयो हि सः ।। 

अर्थ- जिस वर्ण के लिए जो धर्म मनु ने कहा है वह सम्पूर्ण वेद में कहा है क्योंकि वेद सभी विद्याओं का भंडार है, अर्थात सम्पूर्ण वेद को जानकर यह स्मृति बनाई। इससे सब स्मृतियों से इसकी उत्कृष्टता दिखाई |

(अब आप मनु स्मृति के केवल उन्हीं श्लोकों को सही माने जिनके प्रमाण वेदों में मिलते हैं बाकी सभी बाते मिथ्या मानी जाएंगी। )

सभी सनातन प्रेमी सनातन संस्कृति को बढ़ावा दो सैकडो वर्षो बाद वैदिक ग्रंथों में प्रमाणित व्याख्याएं प्रमाण सहित उजागर हो रही है पोस्ट प्रमाणिक है ये किसी की निजी व्याख्या नहीं। कोई भी वेदपाठी विद्वान प्रमाण सहित व्याख्या करके तर्क रख कर सत्य असत्य पर सहमति बना सकते है वेद और वैदिक ग्रंथों के प्रमाणों सहित । जातिवादी मानसिकता में लिप्त ग्रंथो के ज्ञानी भी मंथन जरूर करे और विचार करे ।



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