लंका की भारत भूमि से दूरी कितनी है इस प्रश्न के उत्तर से ही नीचे जानकारी पुनर्प्रेषित है।
वाल्मीकीय रामायण के युद्धकाण्ड के द्वाविंश सर्ग में समुद्र ने विश्वकर्मा पुत्र नल का परिचय दिया और बतलाया कि नल समस्त विश्वकर्म (इंजीनियरिंग) का ज्ञाता है। - 45
यह महोत्साही वानर पिता के समान योग्य है।मैं इसके कार्य को धारण करुँगा। - 46
तब नल ने उठकर श्रीराम से बोला - 48
मैं पिता के समान सामर्थ्य पूर्वक समुद्र पर सेतु निर्माण करुँगा। - 48
समुद्र ने मुझे स्मरण करवा दिया है। मैं बिना पूछे अपने गुणों को नही बतला सकता था। अतः चुप था।- 52
मैं सागर पर सेतु निर्माण में सक्षम हूँ। अतः सभी वानर मिल कर सेतु निर्माण आज ही आरम्भ करदें। 53।
वानर गण वन से बड़े बड़े वृक्ष और पर्वत शिखर / बड़े बड़े पत्थर/ चट्टानें ले आये।- 55
महाकाय महाबली वानर यन्त्रों ( मशीनों) की सहायता से बड़े बड़े पर्वत शिखर / शिलाओं को तोड़ कर/ उखाड़ कर समुद् तक परिवहन (ट्रांस्पोर्ट) कर लाये। -60
कुछ बड़े बड़े शिलाखण्डों से समुद्र पाटने लगे।कोई सुत पकड़े हुए था। - 61
कोई नापने के लिये दण्ड पकड़े था,कोई सामग्री जुटाते थे। वृक्षों से सेतु बाँधा जा रहा था। - 64 & 65
पहले दिन उन्होने चौदह योजन लंबा सेतु बाँधा। -69
(नोट - तट वर्ती क्षेत्र में केवल भराव करने से काम चल गया अतः 180 कि.मी. पुल बन गया। आगे गहराई बढ़ने और तरंगो/ लहरों का वेग बड़ने से गति धीमी हो जायेगी।)
दुसरे दिन बीस का योजन सेतु तैयार हो गया - 69
(अर्थात दुसरे दिन (20 + 14 = 36 योजन सेतु बना। छः योजन अर्थात 77 कि.मी. पुल बना कर सेतु की कुल लम्बाई बीस योजन अर्थात 257 कि.मी. होगई। आगे गहराई बढ़ने और तरंगो/ लहरों का वेग बड़ने से गति धीमी होगई। दुसरे दिन गति लगभग आधी ही रह गई।)
तीसरे दिन कुल इक्कीस योजन का सेतु निर्माण कर लिया। - 70
(अर्थात तीसरे दिन एक योजन यानी 12.87 कि.मी. सेतु बन पाया और सेतु की कुल लम्बाई 21 योजन = 270 कि.मी. हो गई।
(नोट - गति कम पड़ना स्वाभाविक ही है। दुसरे दिन गति आधी रह गई और तीसरे दिन से तो एक एक योजन अर्थात प्रतिदिन 12.87 कि.मी. ही पुल बनेने लगा।)
चौथे दिन वानरों ने बाईस योजन तक का सेतु बनाया। - 71
(अर्थात एक योजन / 12.87 कि.मी.वृद्धि हुई और कुल 22 योजन = 283 कि.मी. पुल बना।)
पाँचवें दिन वानरों ने कुल 23 योजन सेतु बना लिया। - 72
(अर्थात एक योजन वृद्धि कर सेतु की कुल लम्बाई 23 योजन = 296 कि.मी. होगई।)
इस प्रकार विश्वकर्मा पुत्र नल ने ( पाँच दिन में वानरों की सहायता से भारत की मुख्य भूमि से रावण की लंका तक 23 योजन = लगभग 300 कि.मी. का ) सेतु समुद्र में तैयार कर दिया।
नोट - इस प्रकार भारत की मुख्य भूमि पश्चिमी घाँट के केरल की नीलगिरी के कोजीकोड से किल्तान द्वीप की ओर दुरी लगभग तीनसौ तीन कि.मी. का सेतु / पुल तैयार कर लिया।)
(नोट - अर्थात रावण की लंका नगरी खम्बात की खाड़ी के तट जहाँ से हनुमानजी ने सीताजी की खोज हेतू छलांग लगाई थी से दक्षिण में 1287 कि.मी. दुर लक्षद्वीप समुह के द्वीप पड़ते है। तथा पश्चिमी घाँट के केरल की नीलगिरी के कोजीकोड से किल्तान द्वीप की ओर दुरी लगभग तीनसौ तीन कि.मी.है।दोनो ठीक बैठती है।अर्थात लंका लक्षद्वीप में थी। जिसकी राजधानी कवरत्ती है या किल्तान द्वीप में हो सकती है। )
(नोट यह विशुद्ध विश्वकर्म / इंजीनियरिंग का कमाल था।न कि राम नाम लिखने से पत्थर तैराने का कोई चमत्कार। तैरते पिण्डों को बानध कर पुल बनाना भी इंजीनियरिंग ही है किन्तु यहाँ उस तकनीकी का प्रयोग नही हुआ।
किन्तु नाम लिखने से फत्थर नही तैरते बल्कि जैविकीय गतिविधियों से निर्मित कुछ पाषाण नुमा संरचना समुद्र में तैरती हुई कई स्थानों में पायी। जाती है।इसमें कोई चमत्कार नही है।पाषाण नुमा संरचनाएँ जो बीच में पोली / खाली होती है उनमें हवा हरी रह जाती है।ऐसे पत्थरों का घनत्व एक ग्राम प्रति घन सेण्टीमीटर से कम होने के कारण वे भी बर्फ के समान तैरते हैं। )
नोट --श्लोक 76 में सेतु की लम्बाई शत योजन और चौड़ाई दश योजन लिखा है। निश्चित ही यह श्लोक प्रक्षिप्त है क्यों कि, नई दिल्ली से आन्ध्रप्रदेश के चन्द्रपुर से आगे असिफाबाद तक की दुरी के बराबर सेतु की लम्बाई 1288 कि.मी. कोई मान भी लेतो 129 कि.मी. चौड़ा पुल तो मुर्खता सीमा के पार की सोच लगती है। दिल्ली से हस्तिनापुर की दुरी भी 110 कि.मी. है।उससे भी बीस कि.मी.अधिक चौड़ा पुल तो अकल्पनीय है।
अस्तु यह स्पष्ट है कि, दासता युग में सूफियों के इन्द्रजाल अर्थात वैज्ञानिक और कलात्मक जादुगरी से प्रभावित कुछ लोगों ने मिलकर पुराने ग्रन्थों में भी ऐसे चमत्कार बतलाने के उद्देश्य से ऐसे प्रक्षिप्त श्लोक डाल दिये। जो मूल रचना से कतई मैल नही खाते। ऐसे ही
श्लोक 78 में वानरों की संख्या सहत्र कोटि यानी एक अरब जनसंख्या बतलाई है।
भारत की जनसंख्या के बराबर एक अरब वा्नर श्रीलंका में भी नही समा पाते।
अस्तु शास्त्राध्ययन में स्वविवेक जागृत रखना होता है।
पुरे प्रकरण को पढ़कर भारत का नक्षा एटलस लेकर जाँचे।
कि, भारत के पश्चिमी घाँट के केरल की नीलगिरी के कोजीकोड से किल्तान द्वीप की ओर दुरी लगभग तीनसौ तीन कि.मी. है। और गुजरात के खम्बात की खाड़ी से दहेज नामक स्थान से किल्तान की दुरी भी लगभग 1290 कि.मी. है।
अस्तु लगभग किल्तान द्वीप के आसपास ही रावण की लंका रही होगी।लक्षद्वीप में किल्तान द्वीप राजधानी करवत्ती से उत्तर में है।
अध्ययन कर पता लगाया जा सकता है कि किल्तान या करवत्ती या कोई डुबा हुआ द्वीप में से रावण की लंका कौनसा द्वीप था।
यह कार्य पुरातत्व विभाग और पुरातत्व शास्त्रियों का कार्य है।
अमेरिका में साइंस चैनल के एक शो में पौराणिक ग्रंथ रामायण के रामसेतु का जिक्र है, इसमें यह दावा किया गया है कि यह ढांचा वास्तव में मानव निर्मित है ना कि प्राकृतिक। वैज्ञानिकों ने इसको एक सुपर ह्यूमन एचीवमेंट बताया है.
उनके मुताबिक, यहां पर लाया गए पत्थर करीब 7 हजार साल पुराना है। जबकि, जिस सैंड के ऊपर यह पत्थर रखा गया है वह मजह सिर्फ चार हजार साल पुराना है।
ध्यान दें यह दावा/अनुमान विज्ञानको द्वारा उपग्रह से ली गई तस्वीरों के अध्ययन के बाद किया गया है वैज्ञानिक वहां जाकर अध्ययन नहीं किए हैं।
वैज्ञानिकों द्वारा पत्थर का करीब 7000 साल पुराना बताएं जाना एक अनुमान मात्र है क्योंकि पत्थर की कार्बन डेटिंग नहीं की जा सकती।
(माइथॉलजी के हिसाब से 5 हजार साल पहले द्वापर युग खत्म हुआ है. द्वापर युग खुद ही 8 लाख 64 हजार साल चला था. ऐसा वेद, पुराण और उपनिषदों में लिखा है. रामसेतु त्रेतायुग में बना क्योंकि राम उसी युग में थे, तो इस मामले में अंतिम निर्णय यही होगा कि इसमें अभी और शोध की जरूरत है।)
रहा सवाल इसके अस्तित्व का तो काफी हद तक संभव है कि रामसेतु था और अभी भी है।
स्रोत विकीपीडिया।
रामसेतु त्रेतायुग में बना था। आज से करीब 730000 साल पहले ।
सिविल इंजीनियर :- नल नील और उनके साथी ।
आवश्यकता :- लंका से कनेक्टिविटी जोड़ना।
प्रोजेक्ट निरीक्षक :- जामवंत
प्रधान सहमति :- मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम।
सामग्री:- फ्लोटिंग पत्थर और प्रभु श्री राम की महिमा।
स्थान रामेश्वरम
आइये चलते हैं त्रेतायुग में और जानते हैं विस्तार से :-
त्रेतायुग में अयोध्या यानी अवध की सत्ता राजा दशरथ के हाथ मे थी और उन्होंने सत्ता अपने ज्येष्ठ पुत्र राम को सौपने का निर्णय लिया परन्तु राज्याभिषेक के दिन मंथरा के कहने पर रानी कैकेयी ने दशरथ से अपने दिए वचन के अनुसार दोनों वचन मांगे पहला भरत को राजगद्दी दूसरा राम को 14 वर्षों का वनवास।
पिता की आज्ञा लेकर राम वन जाते हैं जहाँ सूपर्णखा,मरीचि के कांडों से रावण राम को अपना बैरी मान लेता है। और बदला लेने के लिए माँ सीता का हरण कर लेता है ।
फिर युवराज राम का मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम बनने का सफर शुरू होता है क्योंकि वो चाहते तो आराम से कई राजाओं की मदद लेकर या अकेले ही ईश्वरीय रूप से रावण का वध कर सकते थे पर उन्होंने सब कुछ ऐसा किया जो एक आम इंसान कर सकता है। इसलिए राम के जीवन से हर इंसान से सीखना चाहिए ।
जटायु से सीता का पता लगा कि रावण ने उनका हरण किया है और दक्षिण दिशा की ओर ले गया है।
सुग्रीव के नेतृत्व में राम ने सभी अपने प्रिय भक्त हनुमान और मेंटर जामवंत के अनुभव की सहायता से लंका के समुद्र के इस ओर आ चुके थे अब बस समस्या थी समुद्र को पार करना ।
ऐसे में उनकी सेना में मौजूद सिविल इंजीनियर नल और नील काम आए और डिजाइन तैयार हुआ साथ ही साथ निर्णय लिया गया कि पत्थर की सहायता से पुल बनाया जाएगा।
पर पत्थर डालते ही वह डूब गया ऐसे में जामवंत ने मेंटर का काम किया और पत्थर को समुद्र तल पर रखने के लिए उसपर राम लिखा और सबने मिलकर समुद्र देव से विनती की ।
बस वानर सेना उत्साह से भर गई और रामसेतु बनकर तैयार हो गया। आज कई लोग इस बात को नही मानते हैं उनके नाम मे भले करुणा हो पर दिमाग मे भूसा ही है। ऐसे लोगो के लिए चार लाइन लिखकर उत्तर समाप्त करूँगी
अहंकार जब सर चढ़ बोलने लगेगा कुछ लोग है कि आपको भी मानेंगे ,
ईश्वर से मिले चाहे वरदान या फिर ईश्वरीय अभिशाप को नही मानेंगे।
हर दम करते रहेंगे पाप पर पाप , पुण्य समझेंगे पाप को नही मानेंगे,
आज श्री राम को न मानते ये लोग तो क्या कल ये अपने बाप को भी नही मानेगे।।
वैज्ञानिक तथ्य:-
- रामायण मे जितने जगहों का जिक्र आया है वो सभी आज भी मौजूद है.. केवट प्रसंग से जुड़े सिंगरौर से लेकर (इलाहबाद से करीब 35 किलोमीटर ), कुरई, चित्रकूट, अत्रि ऋषि आश्रम, दंडकारण्य (मध्यप्रदेश एवं छतीसगढ़ के जंगल) पंचवटी, पर्णशाला (आंध्रपदेश ), सबरी आश्रम (केरल), ऋष्यमूक पर्वत, कोडीकरई, चंदन वन, मलय पर्वत, रामेश्वरम, धनुषकोडी, लंका, आशोक वाटिका आदि स्थानों के बारे में प्रमाणिक जानकारी है
- राम सेतु आज भी समुद्र के नीचे अवस्थित है भारतीय सेटेलाइट और अमेरिका के अनुसन्धान संस्थान ‘नासा’ के उपग्रह ने जब एतिहासिक ‘रामसेतु’ जो धनुषकोडी तथा श्रीलंका के बीच में 48 किमी चौड़ी पट्टी एक रेखा के रूप में दिखाई देता है के चित्र खींचे तब इसके राम सेतु होने के संकेत मिलेr
- रामेश्वरम मंदिर जिसकी स्थापना श्री राम ने किया था
- राम जन्म भूमि का अस्तित्व जिसे सुप्रीम कोर्ट ने archaeological सर्वे ऑफ इंडिया के खुदाई के आधार पर माना
- राम एक ऐतिहासिक व्यक्ति थे और इसके पर्याप्त प्रमाण हैं। राम का जन्म 5114 ईस्वी पूर्व हुआ था। वाल्मीकि रामायण में लिखी गई नक्षत्रों की स्थिति को 'प्लेनेटेरियम' नामक सॉफ्टवेयर से गणना की गई तो उक्त तारीख का पता चला। यह एक ऐसा सॉफ्टवेयर है जो आगामी सूर्य और चंद्र ग्रहण की भविष्यवाणी कर सकता है।
- रावण द्वारा लिखित ‘रावण सहिंता’ के अध्ययन से आज भी विज्ञान ज्योतिष को समझा जा रहा हैं
वाल्मीकि रामायण के अनुसार श्री राम ने राम सेतु का निर्माण रावण के वध हेतु लंका जाने के लिए करवाया था। समुद्र पर बने इस पुल का निर्माण वानरों, रीछ और नल नील भाइयों की निगरानी में हुआ था। नल नील विश्वकर्मा के पुत्र थे और उस समय के महान वास्तुविद माने जाते थे।
बहुत से लोगों को इसकी जानकारी नहीं है कि रामसेतु को भगवान श्री राम ने स्वयं तोड़ा था। पद्म पुराण के सृष्टि खंड में इसकी कथा विस्तारपूर्वक मिलती है।
पदम पुराण के मुताबिक जब श्री राम रावण का वध करके लक्ष्मण और सीता के साथ अयोध्या लौट आए थे और उनका राज्याभिषेक हो गया था, तब एक दिन उनके मन में विभीषण से मिलने का विचार आया। उन्होंने सोचा कि रावण की मृत्यु के बाद विभीषण किस तरह लंका का शासन कर रहे हैं? क्या उन्हें कोई परेशानी तो नहीं! ऐसा विचार मन में आने के बाद जब श्री राम लंका जाने की सोच रहे थे, उसी समय वहां भरत भी आ गए। भरत के पूछने पर श्री राम ने उन्हें यह बात बताई तो भरत भी उनके साथ जाने को तैयार हो गए।
अयोध्या की रक्षा का भार लक्ष्मण को सौंपकर श्री राम और भरत पुष्पक विमान में सवार होकर लंका की ओर चल पड़े। बीच में किष्किंधा नगरी आई। श्री राम और भरत थोड़ी देर वहां सुग्रीव और दूसरे वानरों से मिले। जब सुग्रीव को पता चला कि राम विभीषण से मिलने लंका जा रहे हैं, तो वह भी उनके साथ चले जाते हैं।
उधर जब विभीषण को सूचना मिलती है कि श्री राम, भरत और सुग्रीव लंका आ रहे हैं तो वह पूरी लंका को सजाने का आदेश देते हैं। फिर भगवान श्री राम विभीषण से मिलते हैं। विभीषण सभी से मिलकर बहुत ही प्रसन्न होते हैं।
श्रीराम तीन दिन तक लंका में रहते हुए विभीषण को धर्म अधर्म का ज्ञान देते हैं और कहते हैं कि तुम हमेशा धर्म पूर्वक इस नगर पर राज करना। जब श्रीराम वापस अयोध्या जाने के लिए पुष्पक विमान पर बैठते हैं तो विभीषण कहते हैं कि श्रीराम आपने जैसा मुझसे कहा ठीक उसी तरह में धर्म पूर्वक इस राज्य का ख्याल रखूंगा, लेकिन जब मानव यहां आकर मुझे सताएंगे, तब मुझे क्या करना है?
विभीषण के कहने पर श्रीराम ने अपने बाणों से उस पुल के दो टुकड़े कर दिए। फिर तीन भाग कर के बीच का हिस्सा भी अपने बाणों से तोड़ दिया। इस तरह स्वयं श्रीराम ने ही रामसेतु को तोड़ दिया था।
नीचे श्री लंका
यह पुल ४८ किलोमीटर (३० मील) लम्बा है[3] तथा मन्नार की खाड़ी (दक्षिण पश्चिम) को पाक जलडमरूमध्य (उत्तर पूर्व) से अलग करता है। कुछ रेतीले तट शुष्क हैं तथा इस क्षेत्र में समुद्र बहुत उथला है, कुछ स्थानों पर केवल ३ फुट से ३० फुट (१ मीटर से १० मीटर) जो नौगमन को मुश्किल बनाता है।[3][4][5] यह कथित रूप से १५ शताब्दी तक पैदल पार करने योग्य था जब तक कि तूफानों ने इस वाहिक को गहरा नहीं कर दिया। मन्दिर के अभिलेखों के अनुसार रामसेतु पूरी तरह से सागर के जल से ऊपर स्थित था, जब तक कि इसे १४८० ई० में एक चक्रवात ने तोड़ नहीं दिया।[6] इस सेतु का उल्लेख सबसे पहले वाल्मीकि द्वारा रचित प्राचीन भारतीय संस्कृत महाकाव्य रामायण में किया गया था, जिसमें राम ने अपनी वानर (वानर) सेना के लिए लंका तक पहुंचने और रक्ष राजा, रावण से अपनी पत्नी सीता को छुड़ाने के लिए इसका निर्माण कराया था।
इस्लामिक स्रोत कुरआन और हदीस में आदम का धरती पर उत्तारे जाने के स्थान का विवरण नहीं मिलता बाद की इतिहास की पुस्तकों में अलग अलग नाम मिलते हैं जिनमे अधिकतर का अनुमान श्रीलंका है।[7][8][9] पश्चिमी जगत ने पहली बार 9वीं शताब्दी में इब्न खोरादेबे द्वारा अपनी पुस्तक " रोड्स एंड स्टेट्स (850 ई) में ऐतिहासिक कार्यों में इसका सामना किया, इसका उल्लेख सेट बन्धई या" ब्रिज ऑफ़ द सी "है। [५] कुछ प्रारंभिक स्रोत, एडम के पीक के रूप में श्रीलंका के एक पहाड़ का उल्लेख करते हैं, (जहाँ एडम माना जाता है कि पृथ्वी पर गिर गया) और पुल के माध्यम से एडम को श्रीलंका से भारत के पार जाने के रूप में वर्णित किया; एडम ब्रिज के नाम से जाना जाता है। [६] अल्बेरुनी ( सी। १०३० ) शायद इस तरह से इसका वर्णन करने वाला पहला व्यक्ति था। [५] इस क्षेत्र को आदम के पुल के नाम से पुकारने वाला सबसे पहला नक्शा १ ] ०४ में एक ब्रिटिश मानचित्रकार द्वारा तैयार किया गया था।
आयु
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१९वीं शताब्दी में निर्मित इस चित्र में रामायण का वह प्रसंग चित्रित है जिसमें वानरों द्वारा सेतु का निर्माण किया जा रहा है।
रामसेतु की आयु विवाद का विषय रहा है। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के "प्रोजेक्ट रामेश्वरम" के अनुसार इस इलाके के मूँगा (कोरल) के आयु के आंकड़े बताते हैं कि रामेश्वरम द्वीप १२५,००० साल पहले विकसित हुआ है। बदलते समुद्र स्तर के कारण ये भी बताया गया है कि रामेश्वरम और तलैमन्नार, श्रीलंका के बीच के जमीन ७,००० से १८,००० वर्ष पहले शायद खुली थी। धनुषकोडी और रामसेतु के बीच के रेत की टीलों की आयु ५००-६०० साल पुरानी बताई जाती है।[10] तिरुचिरापल्ली स्थित भारतिदासन विश्वविद्यालय के २००३ के सर्वेक्षण के अनुसार रामसेतु की आयु सिर्फ ३,५०० साल है।[11]
पूरे भारत, दक्षिण पूर्व एशिया और पूर्व एशिया के कई देशों में हर साल दशहरे पर और राम के जीवन पर आधारित सभी तरह के नृत्य-नाटकों में सेतु बंधन का वर्णन किया जाता है। राम के बनाए इस पुल का वर्णन रामायण में तो है ही, महाभारत में भी श्री राम के नल सेतु का उल्लेख आया है। कालीदास की रघुवंश में सेतु का वर्णन है। अनेक पुराणों में भी श्रीरामसेतु का विवरण आता है। एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका मे राम सेतु कहा गया है। नासा और भारतीय सेटेलाइट से लिए गए चित्रों में धनुषकोडि से जाफना तक जो एक पतली सी द्वीपों की रेखा दिखती है, उसे ही आज रामसेतु के नाम से जाना जाता है। यह सेतु तब पांच दिनों में ही बन गया था। इसकी लंबाई १०० योजन व चौड़ाई १० योजन थी। इसे बनाने में रामायण काल में श्री राम नाम के साथ, उच्च तकनीक का प्रयोग किया गया था।
17:47.
"संसार में पुरुष के लिये अकृतज्ञों के प्रति दण्पनीति का प्रयोग ही
सबसे बड़ा है ऐसा मेरा है। वैसे लोगों के प्रति
क्षमा सान्त्वना और दानीति के प्रयोगको कार
अयं हि सागरी भीमः सेतुकर्मदिदृक्षया दो दण्डभवाद गार्थ राधवाय महोदधिः ॥५०॥ इस भयानक समुद्र को राजा सगर के पुत्र ने बढ़ा
श्री इसने कुता से नहीं, के भय से ही संतुकर्म देखने की इच्छा मन में लायन श्रीरघुनाथजी को अपनी बाह दी है। मम मातु दत्तो मन्दरे विकणा मया तु सदृशः पुत्रस्तव देवि भविष्यति॥५१॥
मन्दवकर्माजी ने मेरी माता की यह दिया था कि
देवा तुम्हारे गर्भ से मेरे ही समान पुत्र होगा ५१४ औरसस्तस्य पुत्रोऽहं सदृशौ विकर्मणा स्मारितोऽस्म्यहमेतेन तत्त्वमाह महोदधिः।
न चाप्यहममुक्तो प्रवृधामात्मनो गुणान्॥५२॥
इस प्रकार में विश्वका औरस पुत्र है और शिल्पकर्म में ह
के समान हूँ इस समुद्र ने आज मुझे इन सब बातों का स्मरण
दिल दिया है। बापू
आप से अपने गुणों को नहीं बता सकता था, इसीलिये
अबतक घुप ५२॥
समर्थ सेवाये
तस्मादवन्तु वानरपुङ्गवाः ॥५३॥
में महासागर पर पुल बाँधने में समर्थ है अतः सब वानर आज ही
दाँधने का कार्य आरम्भ कर दें।
ततो वा रामेण सर्वतो हरिया
उत्पेततुर्महारण्यं दृशः शतसहस्रशः ॥५४॥
तब भगवान श्रीराम के भेजने से लाखों बड़े-बड़े यानार हर्ष और
उत्साह में भरकर सब और हुए गये और बड़े-बड़े जंगलों में
घुस गये ५४ ते नगान् नगसंकाशाः शाखामृगगणर्षभाः। पादपस्तत्र प्रचच सागरम् ॥५५॥ के समान और
वृक्षों को तोड़ देते और उन्हें समुद्र ॥५५॥
तेच वैर्वरोध वानराः
कुरर्जुनैस्तालैस्तिलके स्तिनिशेरपि ॥ ५६ ॥ विल्वकैः सप्तपर्णेच कर्णिकारेच पुष्पितैः । चूतेचाशोकवृक्षेच सागरं समपूरयन् ॥५७॥
अब अर्जुन साल क
विनिश, बैल, दिलबर खिले हुए कनेर आम और अशोक आदि
वृक्षों से समुद्र को पाटने लगे। ५६-५७
मूलां विमूलांच पादपान् हरिसत्तमाः ।
इन्द्रकेतुनियोद्यम्य प्रजानस्त ॥५८॥
घेष्ठ वानर वहाँ के वृक्षों की जड़ से उखाड़ लाने या जड़ के ऊपर
सेकेको उ
लिये थे। ५८॥
तालान् दाडिमगुल्यांच नारिकेलविभीतकान्। करीरान् वकुलान् निम्बान् समाजलुरितस्ततः ॥ ताड़ी, अनार की झाड़ियों पर और बहेड़े के वृक्षों, करी तथा नीम को भी इधर-उधर से तोड़-तोड़कर लाने लगे।
हस्तिमात्रान् महाकायाः पाषाणांश्च महाबलाः।
समुपाययन्त्रैः परिहन्ति ॥ ६० ॥
हामी साथी के समान बड़ी बड़ी सिला और
पर्वतको उखाड़कर पत्र विभिन्न द्वारा समुद्रतट पर से
प्रक्षिप्यमाणैश्च सहसा जलमुतम्। समुत्सचाकाशमवात् ततः पुनः ॥६९॥ शिखण्डी को फेंकने से समुद्र का जल महला आकाश में उठ जाता और फिर वहाँ से नीचे को गिर जाता था। ६९॥
समुद्र क्षोभयामासुनिपतन्तः समन्ततः ।
सूत्राण्यन्ये प्रगृह्णन्ति द्यायतं शतयोजनम् ॥६२॥
उन बातों ने सब और पाक में मचा दी।
कुछ दूसरे वानर सौ योजन लंबा पकड़े हुए थे। २०
नल महासेतुं मध्ये नदनदीपतेः।
स तदा क्रियते सेोरकर्मभिः ॥ ६३ ॥
ननद और नदियों के स्वामी समुद्र के बीच महासेतु का
निर्माण कर रहे थे। कर कर्म करने वाले वालों ने
उस समय सेतुनिर्माण का कार्य आरम्भ किया था। ६३॥
दण्डानन्ये प्रति विचिन्वन्ति तथापरे।
वानरैः शतस्तत्र रामस्याज्ञापुर सरेः ॥६४॥
मेघाभः पर्वताभेक्षणः कान्धिरे
पुष्पिताच तरुभिः सेतुं वानराः ॥६५॥
कोई नापने के लिये दण्ड पकड़ते थे तो कोई जुटाते थे।
श्रीरामचन्द्र की जाना करके कारो
औरों के समान प्रतीत होते यहाँ और को द्वारा
स्थानों में बाँध थे जिनके प्रभाग फूली से
ऐसे भी चार सेतू ते ६५
पाषाणां गिरिप्रख्यान् गिरीणा शिखराणि चा
दृश्यन्ते परिधावन्तो गृह्य दानवसंनिभाः॥६६॥
बड़ी-बड़ी चढ़ाने और लेकर और
दोहते वानर दानतों के समान दिखायी देते थे।
शिलाना सिच्यमाणानां शैलानां तत्र पात्यताम्।
बभूव तुमुलः शब्दस्तदा तस्मिन् महोदय ॥६७॥
उस समय उस महासागर की जाती हुई मिलाओं और
हुए पहाड़ों के गिरने से बड़ा भीषण शब्द हो रहा था. ६०॥
कृतानि प्रथमेनन योजनानि चतुर्दश
प्रकाशेस्वरमाणैः ॥ ६८ ॥
हाथी के समान काय वानर बड़े उत्साह और तेजी के साथ
काम में लगे हुए थे।दिन उन्होंने ज
८०
द्वितीयेन तथैवाह योजनानि तु विंशतिः ।
कृतानि वस्तृर्ण भीमकामाः ॥६९॥
फिर दूसरे दिन भयंकर शरीराले महाबली बानरों ने तेजी से काम
करके बीस योजन लंबा पुल बाँध दिया
अहा तृतीयेन तथा योजनानि तु सागरे
त्वरमाणेमहाकार्यरेकविंशतिरेव च ॥ ७०॥
तीसरे दिन शीघ्रतापूर्वक काम में जुटे हुए महाकाय कपियों ने समुद्र
इसकी योजन लंबा पुल बाँध दिया
चतुर्थेन तथा चाहा द्वाविंशतिरथापि वा।
योजना महावेगैः कृतानि त्वरितस्ततः ॥७१॥ चौथे दिन महान वाली और कारी ने बाईस योजन लंबा पुल और बाँध दिया ७१॥ पत्यमेन तथा पाला प्लवगैः क्षिप्रकारिभिः। योजनानि प्रयोविंशत् सुवेलमधिकृत्य ये ॥ ७२ ॥
तथा पाँचवें दिन शीघ्रता करने वाले उपत के
निकट तक उस योजन लंबा पुल बाँध
वानरवरः श्रीमान् विधो बली वन्ध सागरे सेतुं यथा चास्य पिता तथा ॥ ७३ ॥ इस प्रकार विश्वकर्मा के पुत्र कान्तिमापतन समुद्र में सौ योजन लंबा पुल तैयार कर दिया। इस कार्य में वे अपने
पिता के समान ही प्रतिभाशाली ॥७३॥ सलेन कृतः सेतुः सागरे मकरालये । शुशुभे सुभगः श्रीमान् स्वातीपथ इवाम्बरे॥७४॥
मकरालय समुद्र में नल के द्वारा निर्मित हुआ वह सुन्दर और आकाश में स्वाती) के मान सुशोभित होता था ॥ ७४ ॥ ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धा पर आगम्य गगने कामास्तदद्भुतम्॥५॥
उस समय देवता सिद्ध और उस अद्भुत कार्य को
देखने के लिये आकाश में आकर खड़े
दरायोजनविस्तीर्ण शतयोजनमायतम्।
दद्देवगन्धर्वानलसेतुं सुदुष्करम् ॥ ७६ ॥
के बनाये हुए सौ योजन लंबे और दस पीजन चौड़े उस पुलको
देवताओं और देखा, जिसे बनाना बहुत ही कठिन काम
आप्लवत प्लवत प्लवंगमाः।
तमचिन्त्यमच लोमहर्षणम्॥७॥ ददृशुः सर्वभूतानि सागरे सेतुबन्धनम्। कालसी भी इधर-उधर कूदकर गर्जना करते हुए उस अद्भुत और रोमा ger को देख रहे थे।
समस्त प्राणियों ने ही समुद्र में सेतु बाँधने का यह कार्य देखा ७७
सानि कोटिसहखाणि वानराणां महौजसाम् ॥७८॥ वन्तः सागरे सेतुं जग्मुः पारं महोदधेः। इस प्रकार उन सब कोटि (एक खरब) मी एवं उ वानरों का दल पुक्त बाँध बाँधसमुद्र के उस पार पहुँच गया। ७८१/२ ॥
विशालः सुकृतः श्रीमान् सुभूमिः सुसमाहितः ॥ ७९ ॥
महान सेतुःसीमन्त इव नागरे
पुल बड़ा ही विशाल सुन्दरता से हुआ भासन्न
समतल और सुसम्बद्ध था। वह महान सेतु सागर में सीमन्त के
समानाता था
ततः पारे समुद्रस्य मदापाणिविभीषणः ॥८०॥
परेषामभिघातार्थमतिष्ठत् सचिवैः सह
पुल तैयार हो जाने पर अपने सदियों के साथ विभीषण गया हाथ में लेकर समुद्र के दूसरे तट पर खड़े हो गये, जिससे शत्रुपक्षीय राक्षस यदि पुराने के लिये आये ८० १/८२॥
सुधीवस्तु ततः प्राह रामं सत्यपराक्रमम् ॥८१॥ हनुमन्तं त्वमारीह अगदेव लक्ष्मणः।
अयं हि विपुल वीर सागरी मकरालयः ॥ ८२ ॥ हासी युवामेती वानरी धारविष्यतः। तदनन्तरमहाद हनुमान के को पर जाइये और लक्ष्मण अगद की पीठ पर
साहो क्योंकि यह मकरालय समुद्रापीड़ा है। वे
दोन चार मार्ग से चलने वाले हैं। ये ही दोनी आप
दोनों भाइयों को धारण कर सकेंगे। ८१-८२२१२०
अग्रतस्तस्य सैन्यस्य श्रीमान् रामः सलक्ष्मणः ॥८३॥
जगाम धन्दी धर्मात्मा सुग्रीवेण समन्वितः।
इस प्रकार धनुर्धर एवं धर्मात्मा भगवान् रामलक्ष्मण और सुप्री
के साथ उस सेना के आगे-आगे चले
अन्ये मध्येन गयान्ति पार्थोऽन्ये पनवेगमाः ॥८४॥
सलिल प्रपतनयन्ये मार्गमन्ये प्रपेदिरे।
केचिदहागताः सुपर्णा वपुः ॥ ८५॥ दूसरे वानर सेना के बीच में और अगल जंगल में होकर चलने लगे। कितने ही बार जल में कूद पड़ते और हुए चलते दूसरे
पुन का मार्ग पर जाते थे और कितने ही आकाश में उछलकर गरुड़ के समान उड़ते थे। ८४ घोषेण महता घोष सागरस्य समुच्छ्रितम्। भीममन्तर्दधे भीमा तरन्ती हरिवाहिनी ॥८६॥ इस प्रकार पार जाती हुई उसने अपने घोष से समुद्रकी बढ़ी हुई भीषण गर्जना को भी दबा दिया ॥ ८४६
सातवाहनी नलसेतुना
तीर निविशे राज्ञो बहुमूलफलोदके ॥ ८०॥
और बाकी सारी सेना के बनाये हुए पुल से समुद्र के
पार पहुँच गयी राजा फल मून और जल की अधिकता देख सागर के तट पर ही सेना का पड़ाव डाला ॥ ८७॥
सदरान दुष्करं समीक्ष्य देवाः सह सिद्धचारणः । उपेत्य रामं सहसा महर्षिभिस्तमभाषिन् सुशुभे सेः पृथक् ॥ भगवान श्रीराम का अद्भुत और दुष्कर कर्म देखकर सिद्ध
चारण और महर्षियों के साथ देवता उनके पास आये तथा
उन्होंने अलग अलग पवित्र एवं शुभ जल से उनका अभिषेक
जयस्य शत्रून नरदेव मेदिनी ससागरां पालय साधतीः समाः । इतीय रामं नरदेवसत्कृतं शुभैर्वचोभिर्विविधैरपूजयन् ॥ ८९ ॥ फिर बोले नरदेव तुम शत्रुओं पर विजय प्राप्त करो और समुद्रपर्यन्त पृथ्वी का सदा पालन करते रही। इस प्रकार भाँति-भाँति के मंगलसूचक का
उन्होंने अभिवादन किया ॥ ८९॥
इत्य श्रीमद्रामायणेाल्मीकि
शः सर्गः ॥२२॥
इस प्रकार वाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के
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