आखिर कब हुआ था श्रीराम का जन्म?

आखिर कब हुआ था श्रीराम का जन्म?

रामायण श्रीराम की आयु के बारे में कुछ कहा गया है। लेकिन इन के शासनकाल के विषय मे जानकारी दी गयी है जिससे हम इनकी आयु का केवल अंदाजा लगा सकते हैं।

श्रीराम और माता सीता के विषय मे वाल्मीकि रामायण मे कहा गया है कि देवी सीता श्रीराम से 7 वर्ष छोटी थी। श्रीराम विवाह के समय 25 वर्षों के थे तो इस हिसाब से माता सीता की आयु उस समय 18 वर्षों की थी। विवाह के पश्चात 12 वर्षों तक वे दोनों अयोध्या में रहे उसके बाद उन्हें वनवास हुआ। इस हिसाब से वनवास के समय श्रीराम 37 और माता सीता 30 वर्ष की थी। तत्पश्चात 14 वर्षों तक वे वन में रहे और वनवास के अंतिम मास में श्रीराम ने रावण का वध किया। अर्थात 52 वर्ष की आयु में श्रीराम ने 40000 वर्ष के रावण का वध किया। तत्पश्चात श्रीराम ने 11000 वर्षों तक अयोध्या पर राज्य किया। तो उनकी आयु भी हम तकरीबन 11100 वर्ष अर्थात लगभग 30 दिव्य वर्ष के आस पास मान सकते हैं।


मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम अवतारी पुरुष जरूर थे लेकिन उन्होंने सामान्य बच्चे की तरह माता के गर्भ से जन्म लिया।
 
पुराणों में इस बात को लेकर काफी मतभेद है कि श्रीराम का जन्म आखिर कब हुआ था। प्रचलित कथा के अनुसार श्रीराम का जन्म चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को श्री राम का जन्म हुआ था। इस दिन देश भर में राम नवमी मनाई जाती है जो श्रीराम के जन्म की द्योतक मानी जाती है।
 
सवाल ये उठता है कि श्रीराम के युग के बाद इतनी सभ्यताएं आई और गई कि यह  तय करना असंभव प्रतीत होता है कि श्रीराम किस काल, वर्ष और खंड में जन्में। उनके जन्म की तारीख और स्थान पर भी कई बार बहस होती है लेकिन अब तक भी बात को प्रमाणित नहीं किया जा सका है। 
आइए अलग अलग काल के पुराणों और प्रचलित मान्यताओं में लिखित श्रीराम के जन्म की तारीख जानते हैं।
 
क्या कहती है महर्षि वाल्मीकि की रामायण 

महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण के बाल काण्ड में श्री राम के जन्म का उल्लेख इस तरह किया गया है। जन्म सर्ग 18वें श्लोक 18-8-10 में महर्षि वाल्मीक जी ने उल्लेख किया है कि श्री राम जी का जन्म चैत्र शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को अभिजीत महूर्त में हुआ। अचंभे की बात ये है कि आधुनिक युग में कंप्यूटर द्वारा गणना करने पर यह 21 फरवरी, 5115 ईस्वी पूर्व निकलता है।
 
तुलसीदास की रामचरित मानस के अनुसार 

मानस के बाल काण्ड के 190 वें दोहे के बाद पहली चौपाई में तुलसीदास ने भी इसी तिथि और ग्रहनक्षत्रों का जिक्र किया है। तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में राम के पूरे जीवन की हर अवस्था का जिक्र करते हुए कहा है कि सोलहवें वर्ष में वो विश्वमित्र के साथ तपोवन गए और युद्ध की शिक्षा ली।

आई वेदा ने की वाल्मीकि रामायण की पुष्टि

वाल्मीकि रामायण की पुष्टि दिल्ली में स्थित एक संस्था इंस्टीट्यूट ऑफ साइंटिफिक रिसर्च ऑन वेदा यानी आई सर्वे  ने भी की है। वेदा ने खगौलीय स्थितियों की गणना के आधार पर ये थ्योरी बनाई है कि वाल्मीकि ने तारों की गणना के आधार पर राम जन्म की स्थिति की जानकारी दी है।
वेदा द्वारा कराए गए इस शोध में मुख्य भूमिका अशोक भटनागर, कुलभूषण मिश्र और सरोज बाला ने निभाई है। सरोज बाला आईवेदा की अध्यक्ष भी हैं। इनके अनुसार 10 जनवरी 5114 को भगवान राम का जन्म हुआ था।
 
वाल्मीकि लिखते हैं कि चैत्र मास के शुक्लपक्ष की नवमी तिथी को पुनर्वसु नक्षत्र और कर्क लग्न में कौशल्यादेवी ने दिव्य लक्षणों से युक्त सर्वलोकवन्दित श्री राम को जन्म दिया। वाल्मीकि कहते हैं कि जिस समय राम का जन्म हुआ उस समय पांच ग्रह अपनी उच्चतम स्थिति में थे। 

क्या दोपहर को हुआ राम का जन्म

यूनीक एग्जीबिशन ऑन कल्चरल कॉन्टिन्यूटी फ्रॉम ऋग्वेद टू रोबॉटिक्स नाम की इस एग्जीबिशन में प्रस्तुत रिपोर्ट के अनुसार भगवान राम का जन्म 10 जनवरी, 5114 ईसापूर्व सुबह बारह बजकर पांच मिनट पर हुआ (12:05 ए.एम.) पर हुआ था।

कंप्यूटर ने खोज निकाली नई तिथि

वाल्मीकि रामायण द्वारा बताए गए ग्रह नक्षत्रों का जब प्लेनेटेरियम सॉफ्टवेयर के अनुसार आकलन किया गया तो राम जन्म की तिथि 4 दिसंबर ईसा पूर्व यानी आज से 9349 साल पहले हुआ। 

भगवान राम का जन्म कब हुआ था? पुराण इस बारे में कुछ और कहते हैं जबकि रामायण पर आधारित शोधानुसार नई बात निकलकर सामने आई है। इस शोधानुसार 5114 ईसा पूर्व 10 जनवरी को दिन के 12.05 पर भगवान राम का जन्म हुआ था जबकि सैंकड़ों वर्षों से चैत्र मास (मार्च) की नवमी को रामनवमी के रूप में मनाया जाता रहा है। राम एक ऐतिहासिक महापुरुष थे और इसके पर्याप्त प्रमाण हैं।

हालांकि कुछ शोधकर्ता मानते हैं कि भगवान राम का जन्म 7323 ईसा पूर्व हुआ था। चैत्र मास की नवमी को रामनवमी के रूप में मनाया जाता है।  लेकिन असल में वैज्ञानिक शोधकर्ताओं अनुसार राम की जन्म दिनांक वाल्मीकि द्वारा बताए गए ग्रह-नक्षत्रों के आधार पर प्लैनेटेरियम सॉफ्टवेयर अनुसार 4 दिसंबर 7323 ईसा पूर्व अर्थात आज से 9339 वर्ष पूर्व हुआ था। 

वाल्मीकि के अनुसार श्रीराम का जन्म चैत्र शुक्ल नवमी तिथि एवं पुनर्वसु नक्षत्र में जब पांच ग्रह अपने उच्च स्थान में थे तब हुआ था। इस प्रकार सूर्य मेष में 10 डिग्री, मंगल मकर में 28 डिग्री, ब्रहस्पति कर्क में 5 डिग्री पर, शुक्र मीन में 27 डिग्री पर एवं शनि तुला राशि में 20 डिग्री पर था। (बाल कांड 18/श्लोक 8, 9)।

शोधकर्ता डॉ. वर्तक पीवी वर्तक के अनुसार ऐसी स्थिति 7323 ईसा पूर्व दिसंबर में ही निर्मित हुई थी, लेकिन प्रोफेसर तोबयस के अनुसार जन्म के ग्रहों के विन्यास के आधार पर श्रीराम का जन्म 7130 वर्ष पूर्व अर्थात 10 जनवरी 5114 ईसा पूर्व हुआ था। उनके अनुसार ऐसी आका‍शीय स्थिति तब भी बनी थी। तब 12 बजकर 25 मिनट पर आकाश में ऐसा ही दृष्य था जो कि वाल्मीकि रामायण में वर्णित है।

ज्यातादर शोधकर्ता प्रोफेसर तोबयस के शोध से सहमत हैं। इसका मतलब यह कि राम का जन्म 10 जनवरी को 12 बजकर 25 मिनट पर 5114 ईसा पूर्व हुआ था ।


संदर्भ : (वैदिक युग एवं रामायण काल की ऐतिहासिकता: सरोज बाला, अशोक भटनाकर, कुलभूषण मिश्र)



वैदिक प्रमाण द्वारा राम का जन्म

राम का जन्म त्रेता युग में हुआ था। आदिकाव्य वाल्मीकीय रामायण में राम जन्म के सम्बन्ध में निम्नलिखित वर्णन उपलब्ध है:-

नक्षत्रेऽदितिर्देवत्ये स्वोच्चसंस्थेषु पञ्चसु। 
ग्रहेषु कर्क लग्ने वाक्पताविन्दुना सह ।।1.18.9 ।। 

अर्थात् चैत्र मास की नवमी तिथि में, पुनर्वसु नक्षत्र में, पाँच ग्रहों के अपने उच्च स्थान में रहने पर तथा कर्क लग्न में चन्द्रमा के साथ बृहस्पति के स्थित होने पर (श्रीराम का जन्म हुआ)।

राम का जन्म त्रेता के अंत में हुआ था। वाल्मीकि जी लिखते हैं,

हत्वा क्रूरम् दुराचर्षम् देव ऋषीणाम् भयावहम्।
दश वर्ष सहस्राणि दश वर्ष शतानि च ।। १-१५-२९ ॥

भावार्थ- देवताओं तथा ऋषियोंको भय देनेवाले उस क्रूर एवं दुर्धर्ष राक्षस का नाश करके मैं ग्यारह हजार वर्षोंतक इस पृथ्वीका पालन करता हुआ मन्युष्यलोकमें निवास करूँगा । अर्थात राम 11000 वर्षों तक पृथ्वी पर रहे। युग, वैदिक धर्म (हिन्दू धर्म) सभ्यता के अनुसार, एक निर्धारित संख्या के वर्षों की कालावधि है। 

ब्रह्माण्ड का काल चक्र चार युगों के बाद दोहराता है। जिसमे चार युग होते हैं। यह चारो योग में कुल कितने समय होते हैं इस बारे में हमने अपने लेख में बता दिया है। अवश्य पढ़े हिन्दू वैदिक चार युग का कुल समय।

कलि युग 432,000 मानव वर्ष का होता है। अभी- अभी कृष्ण द्वापर में हुए है। द्वापर युग 864,000 मानव वर्ष - का होता है। जब कृष्ण संसार से प्रस्थान किये तो कलियुग का प्रारम्भ हुआ। आज से लगभग 5100 वर्ष पहले कृष्ण प्रस्थान किये थे। और जब राम संसार से प्रस्थान किये तब द्वापर युग प्रारंभ हुआ।

अतएव द्वापर 8,64,000 वर्ष का होता हैं। राम का जन्म युग में अर्थात द्वापर से पहले हुआ था। राम रहे हैं 11000 त्रेता वर्ष फिर द्वापर युग के अंत से अबतक कलियुग का 5100 वर्ष बीत चूका है। अतएव द्वापर युग के 8,64,000 वर्ष + राम रहे 11000 वर्ष + द्वापर युग के अंत से अबतक 5100 वर्ष बीत चुके है तो कुल हुआ 880100 वर्ष।

अतएव वेदों पुराणों के ज्ञान अनुसार राम का जन्म आज से लगभग 880100 वर्ष पहले हुआ है। राम के जन्म समय पर आधुनिक वैज्ञानिक शोध

मराठी शोधकर्ता विद्वान डॉ० पद्माकर विष्णु वर्तक ने एक दृष्टि से वैदिक राम जन्म के समय को संभाव्य माना है। उनका कहना है कि वाल्मीकीय रामायण में एक स्थल पर विंध्याचल तथा हिमालय की ऊँचाई की समान बताया गया है।

विंध्याचल की ऊँचाई 2467 फीट है तथा यह प्रायः स्थिर है, जबकि हिमालय की ऊँचाई वर्तमान में 29,029 फीट है तथा यह निरंतर वर्धनशील (वर्धमान) है। दोनों की ऊंचाई का अंतर 26,562 फीट है। विशेषज्ञों की मान्यता के अनुसार 100 वर्षों में हिमालय 3 फीट बढ़ता है। अतः 26,562 फीट बढ़ने में हिमालय को करीब 8,85,400 वर्ष लगे होंगे। अतः अभी से करीब 8,85,400 वर्ष पहले हिमालय की ऊँचाई विंध्याचल के समान रही होगी, जिसका उल्लेख वाल्मीकीय रामायण में वर्तमानकालिक रूप में हुआ है। इस तरह डॉ० वर्तक को एक दृष्टि से यह समय संभव लगता है, परंतु उनका स्वयं मानना है। कि वे किसी अन्य स्रोत से राम के जन्म के समय की पुष्टि नहीं कर सकते हैं।

डॉ० पी० वी० वर्तक के शोध के अनेक वर्षों के बाद (2004 ईस्वी से) 'आई सर्व के एक शोध दल ने 'प्लेनेटेरियम 'गोल्ड' सॉफ्टवेयर का प्रयोग करके श्री राम का जन्म 10 जनवरी 5114 ईसापूर्व में सिद्ध किया। उनका मानना था कि इस तिथि को ग्रहों की वही स्थिति थी जिसका वर्णन वाल्मीकीय रामायण में है। परंतु यह समय काफी संदेहास्पद हो गया है।

'आई सर्व' के शोध दल ने जिस 'प्लेनेटेरियम गोल्ड सॉफ्टवेयर का प्रयोग किया वह वास्तव में ईसा पूर्व 3000 से पहले का सही ग्रह गणित करने में सक्षम नहीं है। वस्तुतः 2013 ईस्वी से पहले का ग्रह गणित करने हेतु यह सॉफ्टवेयर सक्षम ही नहीं था। इस गणना द्वारा प्राप्त ग्रह-स्थिति में शनि वृश्चिक में था अर्थात उच्च (तुला) में नहीं था। चन्द्रमा पुनर्वसु नक्षत्र में न होकर पुष्य के द्वितीय चरण में ही था तथा तिथि भी अष्टमी ही थी।

बाद में अन्य विशेषज्ञ द्वारा ejplde431 सॉफ्टवेयर द्वारा की गयी सही गणना में तिथि तो नवमी हो जाती हैं परन्तु शनि वृश्चिक में ही आता है तथा चन्द्रमा पुष्य के चतुर्थ चरण में। अतः 10 जनवरी 5114 ईसापूर्व की तिथि वस्तुतः श्रीराम की जन्म- तिथि सिद्ध नहीं हो पाती है। वैज्ञानिक आज कुछ कहते है तो कल कुछ कहते हैं। आज

ये सही है तो कल ये सही है, इन वैज्ञानिको के शोध में ही एकता नहीं है। वैज्ञानिको का जो भी मत हो, लेकिन राम का जन्म वेदों पुराणों के ज्ञान अनुसार आज से लगभग 880100 वर्ष पहले हुआ है।

 100888 रावण का मृत्यु के समय आयु कितनी थी?

इसको समझने के लिए हमें अपना दिमाग थोड़ा खोलना होगा क्योंकि समय की जिस गणना की बात हम कर रहे हैं उसे आज का विज्ञान नही समझ सकता। पहली बात तो ये कि जब कोई कहता है कि रामायण 14000 वर्ष पहले की कथा है तो ये याद रखिये कि ये वैज्ञानिकों ने आधुनिक गणना के अनुसार माना है। अगर वैदिक गणना की बात करें तो रामायण का काल खंड बहुत पहले का है। आइये इसे समझते हैं।

पहले तो इस बात को जान लीजिए कि रावण की वास्तविक आयु के बारे में किसी ग्रंथ में कोई वर्णन नही दिया गया है। मैंने कोरा पर कई उत्तर देखे कि रावण तो 20 लाख वर्ष का था, किसी ने कहा वो 80 लाख वर्ष का था या कुछ और एक बात समझ लें कि अगर कोई रावण की वास्तविक आयु बता रहा है तो वो झूठ बोल रहा है। रामायण में ना रावण की आयु और ना ही श्रीराम की आयु के बारे में कुछ कहा गया है। लेकिन इन दोनों के शासनकाल के विषय में जानकारी दी गयी है जिससे हम इनकी आयु का केवल अंदाजा लगा सकते हैं।

पर इससे पहले कि हम उनकी आयु के विषय में जाने, बस सरसरी तौर पर पौराणिक काल गणना समझ लेते हैं क्योंकि विस्तार से तो इस लेख में बताना संभव नहीं। काल गणना को समझने के लिए एक विस्तृत उत्तर [1] मैंने लिखा है जो आप पढ़ सकते हैं। संक्षेप में त्रेतायुग 3600 दिव्य वर्षों का था। एक दिव्य वर्ष 360 मानव वर्षों के बराबर होता है। इस हिसाब से त्रेतायुग का कुल काल हमारे समय के हिसाब से 3600 360 1296000 (बारह लाख छियानवे हजार) मानव वर्षों का था। इस गणना को याद रखियेगा ताकि आगे की बात समझ सकें।

रावण त्रेतायुग के अंतिम चरण के मध्य में पैदा हुआ था और श्रीराम अंतिम चरण के अंत में त्रेता युग में कुल तीन चरण थे। रामायण में ये वर्णन है कि रावण ने अपने भाइयों (कुम्भकर्ण एवं विभीषण) के साथ 11000 वर्षों तक ब्रह्माजी की तपस्या की थी। इसके पश्चात रावण और कुबेर का संघर्ष भी बहुत काल तक चला। इसके अतिरिक्त रावण के शासनकाल के विषय में कहा गया है कि रावण ने कुल 72 चौकड़ी तक लंका पर शासन किया। एक चौकड़ी में कुल 400 वर्ष होते हैं तो इस हिसाब से रावण ने कुल 72 x 400 = 28800 वर्षों तक लंका पर शासन किया।

इसके अतिरिक्त रामायण में ये वर्णित है कि जब रावण महादेव उलझा और महादेव ने उसके हाथ कैलाश के नीचे दबा दिए तब रावण 1000 वर्षों तक उनसे क्षमा याचना (उनकी तपस्या) करता रहा और उसी समय उसने शिवस्त्रोत्रतांडव की रचना की। हालांकि ऐसा उसके लंका शासनकाल में ही हुआ इसीलिए इसे मैं अलग से नहीं जोड़ रहा।

तो रावण के शासनकाल और तपस्या के वर्ष मिला दें तो 11000 + 28800 = 39800 वर्ष तो कहीं नहीं गए तो इस आधार पर हम ये कह सकते हैं कि रावण की आयु कम से कम 40000 वर्ष तो थी ही (उससे भी थोडी अधिक हो सकती है)। अर्थात दो करीब 112 दिव्य वर्षों तक जीवित रहा।

श्रीराम और माता सीता के विषय में वाल्मीकि रामायण में कहा गया है कि देवी सीता श्रीराम से 7 वर्ष 1 माह छोटी थी। श्रीराम विवाह के समय 25 वर्षों के थे तो इस हिसाब से माता सीता की आयु उस समय 18 वर्षों की थी। विवाह के पश्चात 12 वर्षों तक वे दोनों अयोध्या में रहे. उसके बाद उन्हें वनवास प्राप्त हुआ। इस हिसाब से वनवास के समय श्रीराम 37 और माता सीता 30 वर्ष की थी। तत्पश्चात 14 वर्षों तक वे वन में रहे और चनवास के अंतिम मास में श्रीराम ने रावण का वध किया। अर्थात 51 वर्ष की आयु में श्रीराम ने 40000 वर्ष के रावण का वध किया। तत्पश्चात श्रीराम ने 11000 वर्षो तक अयोध्या पर राज्य किया तो उनकी आयु भी हम तकरीबन 11100 वर्ष (30 दिव्य वर्ष) के आस पास मान सकते हैं।

रावण का गोत्र उनके पितामह का गोत्र ही था अर्थात पुलत्स्य गोत्र। 

इस गणना के हिसाब से रावण के अतिरिक्त कुम्भकर्ण, मेघनाद, मंदोदरी इत्यादि की आयु भी बहुत होगी। विभीषण तो चिरंजीवी है तो आज भी जीवित होंगे। जाम्बवन्त तो सतयुग के व्यक्ति थे जो द्वापर के अंत तक जीवित रहे, तो उनकी आयु का केवल अनुमान ही लगा सकते हैं। महावीर हनुमान रावण से आयु में छोटे और श्रीराम से आयु में बहुत बड़े थे। वे भी चिरंजीवी है तो आज भी जीवित होंगे। परशुराम रावण से आयु में थोड़े छोटे और हनुमान से बड़े थे और वे भी चिरजीवी हैं। • कर्त्यवीर्य अर्जुन आयु में रावण से भी बड़े थे किंतु परशुराम ने अपनी युवावस्था में ही उनका वध कर दिया था।

कुछ लोग ये सोच रहे होंगे कि किसी व्यक्ति की आयु इतनी अधिक कैसे हो सकती है। किंतु हमारे पुराणों में चारों युग के मनुष्यों की औसत आयु और कद का वर्णन है और ये सभी मनुष्यों के लिए है, ना कि केवल रावण और श्रीराम जैसे विशिष्ट लोगों के लिए। हालांकि रावण जैसे तपस्वी और श्रीराम जैसे अवतारी पुरुष की आयु वर्णित आयु से अधिक होने का विवरण है।

जैसे जैसे युग अपने अंतिम चरम में पहुंचता है, वैसे वैसे ही मनुष्यों की आयु और ऊंचाई घटती जाती है अर्थात सतयुग के अंतिम चरण में जन्में लोगों की आयु और ऊंचाई सतयुग के ही प्रथम चरण में जन्में लोगों से कम होगी। आइये इसपर भी एक दृष्टि डाल लेते हैं:

1. सतयुग आयु 100000 वर्ष, ऊंचाई 21 हाथ
2. त्रेतायुग आयु 10000 वर्ष, ऊंचाई 14 हाथ
3. द्वापरयुग आयु 1000 वर्ष, ऊंचाई 7 हाथ
4. कलियुग आयु 100 वर्ष, ऊंचाई 4 हाथ 

महाभारत में वर्णित है कि रेवती के पिता कुकुद्धि, जो सतयुग से थे, ब्रह्माजी के आदेश पर अपनी पुत्री का विवाह करवाने द्वापर आये।

उन्होंने रेवती का विवाह बलराम से कर दिया किन्तु सतयुग की होने के कारण रेवती बलराम से 3-4 गुणा अधिक ऊंची थी। तब बलराम ने अपने हल के दवाब से रेवती की ऊंचाई स्वयं जितनी कर ली। मैंने जितना हो सकता था, इस उत्तर को सारगर्भित बनाने का प्रयास किया है। आशा है आपको पसंद आएगा जय श्रीराम । 

भगवान श्री राम चित्रकूट में कितने दिन रुके थे?

मंदाकिनी नदी के तट पर बसा चित्रकूट धाम भारत के सबसे प्राचीन तीर्थस्थलों में एक है। कहते है यहां भगवान राम १४ वर्ष के बनवास के दौरान माता सीता और अनुज लक्ष्मण के संग ११ वर्ष ११ माह ११ दिन बिताए थे।





वानर सेना में वानरों के अलग अलग झूंड थे। हर झूंड का एक सेनापति होता था जिसे यूथपति कहा जाता था। यूथ अर्थात झूंड। लंका पर चढ़ाई के लिए सुग्रीव ने ही वानर तथा ऋक्ष सेना का प्रबन्ध किया था।

सुग्रीव- बाली का छोटा भाई और राम सेना का प्रमुख प्रधान सेना अध्यक्ष। वानरों के राजा 10,00,000 से ज्यादा सेना के साथ युद्ध कर रहे थे।

हनुमान- सुग्रीव के मित्र और वानर यूथ पति। प्रधान योद्धाओं में से एक। ये रामदूत भी हैं।

लक्ष्मण- दशरथ तथा सुमित्रा के पुत्र, उर्मिला के पति लक्ष्मण प्रधान योद्धाओं में शामिल थे।

अंगद- बाली तथा तारा का पुत्र वानर यूथ पति एवं प्रधान योद्धा। ये रामदूत भी थे।

विभीषण- रावण का भाई। प्रमुख सलाहकार।

जामवंत- सुग्रीव के मित्र रीछ, रीछ सेना के सेनापति एवं प्रमुख सलाहकार। अग्नि पुत्र जाम्बवंत एक कुशल योद्धा के साथ ही मचान बांधने और सेना के लिए रहने की कुटिया बनने में भी कुशल थे। ये रामदूत भी हैं।

नल- सुग्रीव की सेना का वानरवीर। सुग्रीव के सेना नायक। सुग्रीव सेना में इंजीनियर। सेतुबंध की रचना की थी।

नील- सुग्रीव का सेनापति जिसके स्पर्श से पत्थर पानी पर तैरते थे, सेतुबंध की रचना में सहयोग दिया था। सुग्रीव सेना में इंजीनियर और सुग्रीव के सेना नायक। नील के साथ 1,00000 से ज्यादा वानर सेना थी।

क्राथ- वानर यूथपति।

मैन्द- द्विविद के भाई यूथपति।
द्विविद- सुग्रीव के मन्त्री और मैन्द के भाई थे। ये बहुत ही बलवान और शक्तिशाली थे, इनमें दस हजार हाथियों का बल था। महाभारत सभा पर्व के अनुसार किष्किन्धा को पर्वत-गुहा कहा गया है और वहाँ वानरराज मैन्द और द्विविद का निवास स्थान बताया गया है। द्विविद को भौमासुर का मित्र भी कहा गया है।

दधिमुख- सुग्रीव का मामा।

संपाती- जटायु का बड़ा भाई,वानरों को सीता का पता बताया।

जटायु- रामभक्त पक्षी,रावण द्वारा वध, राम द्वारा अंतिम संस्कार।

गुह- श्रंगवेरपुर के निषादों का राजा, राम का स्वागत किया था।

सुषेण वैद्य- सुग्रीव के ससुर।

परपंजद पनस-

कुमुद-

गवाक्ष-

केसरी- केसरी, पनस, और गज 1,00000 से ज्यादा वानर सेना के साथ युद्ध कर रहे थे। ये सभी यूथपति थे। केसरी हनुमानजी के पिता थे।

शतबली- शतबली के साथ भी 1,00000 से ज्यादा वानर सेना थी।

शरभ-

गवय-

गज-

गन्धमादन-

गवाक्ष-

जम्भ-

ज्योतिर्मुख-

क्रथन-

महोदर-

मयंद-

प्रजंघ-

प्रमथी-

पृथु-

रम्भ-

ऋषभ-

सानुप्रस्थ-

सभादन-

सुन्द-

वालीमुख-

वेगदर्श-


राम भगवान के कितने भाई थे?

राम की पत्नी का नाम सीता था इनके तीन भाई थे- लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न।

1.लक्ष्मण रामायण के एक आदर्श पात्र हैं। इनको शेषनाग का अवतार माना जाता है। रामायण के अनुसार, राजा दशरथ के तीसरे पुत्र थे, उनकी माता सुमित्रा थी। वे राम के भाई थे

उनके अन्य भाई भरत और शत्रुघ्न थे। लक्ष्मण हर कला में निपुण थे, चाहे वो मल्लयुद्ध हो या धनुर्विद्या।

2.भरत रामायण के अनुसार, राजा दशरथ के दूसरे पुत्र थे, उनकी माता कैकेयी थी। वे राम के भाई थे। लक्ष्मण और शत्रुघ्न इनके अन्य भाई थे। परंपरा के अनुसार राम, जो की राजा दशरथ के सबसे बड़े पुत्र थे

3.शत्रुघ्न, रामायण के अनुसार, राजा दशरथ के चौथे पुत्र थे, उनकी माता सुमित्रा थी। वे राम के भाई थे, उनके अन्य भाई थे भरत और लक्ष्मण। ये और लक्ष्मण जुड़वे भाई थे।

4. इनके एक बड़ी बहन भी थी जिसका नाम शांता था बहन भगवान राम से बड़ी थी।


Rex Jordan की प्रोफाइल फ़ोटो

नहीं ! बहुत से लोग शांता को श्रीराम की बहन और दशरथ की पुत्री बताते हैं !
परन्तु वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड सर्ग 11 में स्पष्ट वर्णन है कि-

इक्ष्वाकूणां कुले जातो भविष्यति सुधार्मिक:। राजा दशरथो नाम्ना श्रीमान्सत्यप्रतिश्रव:।।1.11.2।।
अङ्गराजेन सख्यं च तस्य राज्ञो भविष्यति। कन्या चास्य महाभागा शान्ता नाम भविष्यति।।1.11.3।। पुत्रस्तु सोऽङ्गराजस्य रोमपाद इति श्रुत:। तं स राजा दशरथो गमिष्यति महायशा:।।1.11.4।।

इक्ष्वाकु कुल में दशरथ नाम के एक राजा होंगें ! उनकी अंग देश के राजा रोमपाद से मित्रता होगी ! उन्हीं अंगराज रोमपाद की शांता नामकी कन्या होगी ! राजा दशरथ उन्हीं अंगराज के पास जाकर कहेंगे कि महाराज आपकी आज्ञा हो तो शांता के पति रिष्यश्रृंग चलकर मेरा पुत्र्येष्टि यज्ञ सम्पन्न करवा दें !

यही वर्णन आध्यात्म रामायण में भी है ! यही कम्ब रामायण में भी है ! कहीं भी शांता को दशरथ की पुत्री नहीं बताया गया है ! पर आश्चर्य है यह कहानी प्रचलित कर दी गयी है कि शांता श्रीराम की बहन है ! वह भी बिना किसी स्रोत के !

किसी पाठक को कोई ग्रन्थ अथवा स्रोत ऐसा मिले तो अवश्य सूचित करें !

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  1. Roopal Garg
  • यह कथा विष्णु पुराण में है। इसे इक्ष्वाकु वंश के स्थान पर अंग की वंशावली में खोजिए।
  • इसमें यह लिखा है कि अंग के वंशज रोमपद, जिन्हें दशरथ भी कहा जाता था- को अज के पुत्र दशरथ ने अपनी पुत्री शांता गोद दी थी। इसके पश्चात रोमपद को चतुरंग नामक पुत्र की प्राप्ति हुई। और इक्ष्वाकु वंश की वंशावली में यह स्पष्ट है कि अयोध्या के राजा अज श्रीराम के पिता राजा दशरथ के पिता थे।

दो व्यक्तियों के एक जैसे नाम हो सकते हैं । आश्चर्यजनक रूप से इक्ष्वाकु वंश का जो वर्णन श्रीविष्णु पुराण में दिया है वहां पर भी अज पुत्र दशरथ के 4 पुत्र ही बताए गए हैं, शांता का वर्णन नहीं है ।

समस्या खड़ी होती है कि वाल्मीकिजी और पराशरजी में से किसकी बात मानी जाए ? न्याय की दृष्टि से तीन स्वतंत्र स्रोत किसी बात की पुष्टि करें तो उसे सच मान लेना चाहिए । यहाँ पर वाल्मीकि और पराशर दोनों का मत है कि रोमपाद की पुत्री शांता थी । लेकिन केवल पराशर जी ने ही उन्हें अज पुत्र दशरथ की गोद दी हुई पुत्री कहा है । वह भी रोमपाद की वंशावली में दशरथ (इक्ष्वाकु) की वंशावली में नहीं ।

यहाँ से यह श्रद्धा का विषय बन जाता है । जिन जन को जो इतिहासकार पसंद हों उनको मानें । लेकिन स्पष्ट अवश्य करें कि आप किस ग्रंथ का आवलंबन लेकर ऐसा कह रहे हैं ।

रूपल गर्ग जी को हृदय से धन्यवाद ।
अब इस विषय की और गहन अध्ययन करने की आवश्यक्ता है ।

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2. Roopal Garg

  • पहले मैं भी यही सोचती थी। लेकिन फिर धीरे-धीरे पता चला कि रामायण-महाभारत-पुराण यह सब एक पूर्ण universe है जिसमें एक का तार दूसरे से जुड़ा है। कोई तथ्य कहीं मिलता है व कोई कहीं और। किसी स्थान पर तथ्य हैं व किसी अन्य स्थान पर विश्लेषण।
  • पहले मैं स्वयं शांता की कथा को मिथ्या ही मानती थी, किंतु हरिवंश में उसका नाम रोमपद की वंशावली में पढ़कर मुझे विस्मय हुआ। क्योंकि वंशावलियों में स्त्रियों का नाम तभी आता है जब उनसे जुड़ी हुई कोई प्रसिद्ध घटना होती है। इनमे से कई की कथाएँ अब खो गई हैं, किंतु वंशावली में नाम हैं। और फिर यह कथा विष्णु पुराण में मिल गई।
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भगवान श्रीराम की एक बहन शान्ता थी जिस का जन्म कौशल्या के गर्भ से हुआ था ।जिसे महाराज दशरथ ने अपने मित्र महाराज रोमपाद को दे दिया था उसका विवाह ऋषि विभाण्डक के पुत्र ऋषि ॠगं से हुआ था।

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चित्र स्रोत: गूगल

जी हाँ, श्रीराम की एक बड़ी बहन भी थी जिनका नाम शांता था। वे आयु में श्रीराम से बहुत बड़ी थी। बचपन मे ही महाराज दशरथ के चचेरे भाई राजा रोमपाद ने शांता गोद ले लिया था और वे उन्ही की पुत्री के रूप में पली। आगे चलकर रोमपाद ने शांता का विवाह विभांडक ऋषि के पुत्र ऋष्यश्रृंग से किया।

बाद में जब सम्राट दशरथ को बहुत काल तक कोई संतान ना हुई तो रोमपाद ने उनसे कहा कि वे उनके जामाता ऋष्यश्रृंग से ही कोई उपाय पूछें। तब दशरथ ने अपनी पुत्री शांता को उनके पति को मनाने को कहा। शांता के अनुरोध पर ही ऋष्यश्रृंग ने महाराज दशरथ के लिए पुत्रकामेष्टि यज्ञ सम्पन्न किया जिसके हविष्य के प्रभाव से श्रीराम,

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रामायण कवि द्वारा लिखा गया । संस्कृत का एक अनुपम महाकाव्य है इसके बारे में बहुत से लोग तो जानते ही होंगे । और जाहिर है । उन्हें इससे संबंधित कई रहस्य के बारे में भी पता होगा । श्री राम के चार भाई थे । इसके बारे में तो हर कोई जानता है । लेकिन उनकी एक बहन भी थी । इस बात का ज्ञान शायद किसी को होगा । । श्री राम की इस बहन का नाम शांता था । इतना ही हिमाचल प्रदेश के कुल्लू शहर मे इनको समर्पित एक अनोखा मंदिर भी स्थापित है । वह और कोई नहीं बल्कि भगवान राम की बड़ी बहन है जिसका नाम है शांता कुल्लू शहर के करीब 50 किलोमीटर दूर स्थित एक मंदिर में देवी शांता की प्रतिमा उनके पति शृंग ऋषि के साथ विराजमान कहा जाता है भगवान राम के एक बहन थी जिसका नाम शांता था । बाद में श्रृंगी ऋषि से शादी हुई थी । सुना है कुल्लू मनाली में इनका मंदिर है , जिसमें शांता और श्रृंगी ऋषि की मूर्ति है । यही उनका स्थान था । देवी शांता को लेकर मान्यता प्रचलित है कि राजा दशरथ ने अंगदेश के राजा रोमपद को अपनी बेटी शांता गोद दे दी थी । जब रोमपद पत्नी के साथ अयोध्या आए तो राजा दशरथ को मालूम चला कि उनकी कोई संतान नही हैं । तब राजा दशरथ ने शांता को उन्हें संतान स्वरूप दिया ।

क्या आपको पता है की भगवान श्री राम किसकी भक्ति करते थे ?

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नहीथी।

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अब तक आप सिर्फ यही जानते आए हैं कि राम के तीन भाई लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न थे, लेकिन राम की बहन के बारे में कम लोग ही जानते हैं।

बहुत दुखभरी कथा है राम की बहन की, लोग उनकी सच्चाई जानेंगे तो राम को कठोर दिल वाला मानेंगे और दशरथ को स्वार्थी|

श्रीराम की दो बहनें भी थी एक शांता और दूसरी कुकबी। यहा हम आपको यहा शांता के बारे में बता रहे है।

दक्षिण भारत की रामायण के अनुसार राम की बहन का नाम शांता था, जो चारों भाइयों से बड़ी थीं।

शांता राजा दशरथ और कौशल्या की पुत्री थीं, लेकिन पैदा होने के कुछ वर्षों बाद कुछ कारणों से राजा दशरथ ने शांता को अंगदेश के राजा रोमपद को दे दिया था।

भगवान राम की बड़ी बहन का पालन-पोषण राजा रोमपद और उनकी पत्नी वर्षिणी ने किया, जो महारानी कौशल्या की बहन अर्थात राम की मौसी थीं।

क्यों दशरथ ने शान्ता को वर्षिणी को दे दिया था,

इस संबंध में तीन कथाएं हैं:
1. पहली : वर्षिणी नि:संतान थीं तथा एक बार अयोध्या में उन्होंने हंसी-हंसी में ही बच्चे की मांग की।

दशरथ भी मान गए। रघुकुल का दिया गया वचन निभाने के लिए शांता अंगदेश की राजकुमारी बन गईं।

शांता वेद, कला तथा शिल्प में पारंगत थीं और वे अत्यधिक सुंदर भी थीं।

2. दूसरी : लोककथा अनुसार शांता जब पैदा हुई, तब अयोध्‍या में अकाल पड़ा और 12 वर्षों तक धरती धूल-धूल हो गई।

चिंतित राजा को सलाह दी गई कि उनकी पुत्री शां‍ता ही अकाल का कारण है। राजा दशरथ ने अकाल दूर करने के लिए अपनी पुत्री शांता को वर्षिणी को दान कर दिया।

उसके बाद शां‍ता कभी अयोध्‍या नहीं आई। कहते हैं कि दशरथ उसे अयोध्या बुलाने से डरते थे इसलिए कि कहीं फिर से अकाल नहीं पड़ जाए।

3. तीसरी कथा : कुछ लोग मानते थे कि राजा दशरथ ने शां‍ता को सिर्फ इसलिए गोद दे दिया था, क्‍योंकि वह लड़की होने की वजह से उनकी उत्‍तराधिकारी नहीं बन सकती थीं।

शान्ता का विवाह किससे हुआ,

शांता का विवाह महर्षि विभाण्डक के पुत्र ऋंग ऋषि से हुआ।

एक दिन जब विभाण्डक नदी में स्नान कर रहे थे, तब नदी में ही उनका वीर्यपात हो गया।

उस जल को एक हिरणी ने पी लिया था जिसके फलस्वरूप ऋंग ऋषि का जन्म हुआ था।

एक बार एक ब्राह्मण अपने क्षेत्र में फसल की पैदावार के लिए मदद करने के लिए राजा रोमपद के पास गया,

तो राजा ने उसकी बात पर ध्‍यान नहीं दिया। अपने भक्‍त की बेइज्‍जती पर गुस्‍साए इंद्रदेव ने बारिश नहीं होने दी, जिस वजह से सूखा पड़ गया।

तब राजा ने ऋंग ऋषि को यज्ञ करने के लिए बुलाया। यज्ञ के बाद भारी वर्षा हुई। जनता इतनी खुश हुई कि अंगदेश में जश्‍न का माहौल बन गया।

तभी वर्षिणी और रोमपद ने अपनी गोद ली हुई बेटी शां‍ता का हाथ ऋंग ऋषि को देने का फैसला किया।

दशरथ ने पुत्र की कामना से जब बुलाया अपने दामाद को...

राजा दशरथ और इनकी तीनों रानियां इस बात को लेकर चिंतित रहती थीं कि पुत्र नहीं होने पर उत्तराधिकारी कौन होगा।

इनकी चिंता दूर करने के लिए ऋषि वशिष्ठ सलाह देते हैं कि आप अपने दामाद ऋंग ऋषि से पुत्रेष्ठि यज्ञ करवाएं। इससे पुत्र की प्राप्ति होगी।

दशरथ ने उनके मंत्री सुमंत की सलाह पर पुत्रकामेष्ठि यज्ञ में महान ऋषियों को बुलाया।

इस यज्ञ में दशरथ ने ऋंग ऋषि को भी बुलाया। ऋंग ऋषि एक पुण्य आत्मा थे तथा जहां वे पांव रखते थे वहां यश होता था।

सुमंत ने ऋंग को मुख्य ऋत्विक बनने के लिए कहा। दशरथ ने आयोजन करने का आदेश दिया।

पहले तो ऋंग ऋषि ने यज्ञ करने से इंकार किया लेकिन बाद में शांता के कहने पर ही ऋंग ऋषि राजा दशरथ के लिए पुत्रेष्ठि यज्ञ करने के लिए तैयार हुए थे। लेकिन...

शांता के आने से हुई अयोध्या में वर्षा,

दशरथ ने केवल ऋंग ऋषि (उनके दामाद) को ही आमंत्रित किया लेकिन ऋंग ऋषि ने कहा कि मैं अकेला नहीं आ सकता।

मेरी पत्नी शांता को भी आना पड़ेगा। ऋंग ऋषि की यह बात जानकर राजा दशरथ विचार में पड़ गए,

क्योंकि उनके मन में अभी तक दहशत थी कि कहीं शांता के अयोध्या में आने से फिर से अकाल नहीं पड़ जाए।

लेकिन जब पुत्र की कामना से पुत्र कामेष्ठि यज्ञ के दौरान उन्‍होंने अपने दामाद ऋंग ऋषि को बुलाया, तो दामाद ने शां‍ता के बिना आने से इंकार कर दिया।

तब पुत्र कामना में आतुर दशरथ ने संदेश भिजवाया कि शांता भी आ जाए। शांता तथा ऋंग ऋषि अयोध्या पहुंचे। शांता के पहुंचते ही अयोध्या में वर्षा होने लगी और फूल बरसने लगे।

शांता ने दशरथ के चरण स्पर्श किए। दशरथ ने आश्चर्यचकित होकर पूछा कि 'हे देवी, आप कौन हैं? आपके पांव रखते ही चारों ओर वसंत छा गया है।'

जब माता-पिता (दशरथ और कौशल्या) विस्मित थे कि वो कौन है? तब शांता ने बताया कि 'वो उनकी पुत्री शांता है।' दशरथ और कौशल्या यह जानकर अधिक प्रसन्न हुए। वर्षों बाद दोनों ने अपनी बेटी को देखा था।

दशरथ ने दोनों को ससम्मान आसन दिया और उन दोनों की पूजा-आरती की। तब ऋंग ऋषि ने पुत्रकामेष्ठि यज्ञ किया तथा इसी से भगवान राम तथा शांता के अन्य भाइयों का जन्म हुआ।

यज्ञ कराने से ऋंग ऋषि का पुण्य नष्ट हो गया तब उन्होंने क्या किया...

कहते हैं कि पुत्रेष्ठि यज्ञ कराने वाले का जीवनभर का पुण्य इस यज्ञ की आहुति में नष्ट हो जाता है।

इस पुण्य के बदले ही राजा दशरथ को पुत्रों की प्राप्ति हुई। राजा दशरथ ने ऋंग ऋषि को यज्ञ करवाने के बदले बहुत-सा धन दिया जिससे ऋंग ऋषि के पुत्र और कन्या का भरण-पोषण हुआ और यज्ञ से प्राप्त खीर से राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न का जन्म हुआ।

ऋंग ऋषि फिर से पुण्य अर्जित करने के लिए वन में जाकर तपस्या करने लगे।

रामायण और रामचरित मानस में शांता के चित्र क्यों नहीं...

जनता के समक्ष शान्ता ने कभी भी किसी को नहीं पता चलने दिया कि वो राजा दशरथ और कौशल्‍या की पुत्री हैं।

यही कारण है कि रामायण या रामचरित मानस में उनका खास उल्लेख नहीं मिलता है।

दुख तो तब हुआ शान्ता को जब कोई भाई मिलने नहीं आया...

कहते हैं कि जीवनभर शांता राह देखती रही अपने भाइयों की कि वे कभी तो उससे मिलने आएंगे, पर कोई नहीं गया उसका हाल-चाल जानने।

मर्यादा पुरुषोत्तम भी नहीं, शायद वे भी रामराज्‍य में अकाल पड़ने से डरते थे।

कहते हैं कि वन जाते समय भगवान राम अपनी बहन के आश्रम के पास से भी गुजरे थे। तनिक रुक जाते और बहन को दर्शन ही दे देते।

बिन बुलाए आने को राजी नहीं थी शांता। सती माता की कथा सुन चुकी थी बचपन में, दशरथ से।

ऐसा माना जाता है कि ऋंग ऋषि और शांता का वंश ही आगे चलकर सेंगर राजपूत बना। सेंगर राजपूत को ऋंगवंशी राजपूत कहा जाता है।



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