*क्या है सोलह संस्कार और क्यों आवश्यक है सब के लिए*

*क्या है सोलह संस्कार और क्यों आवश्यक है सब के लिए*

*संस्कार का सामान्य अर्थ है-किसी को संस्कृत करना या शुद्ध करके उपयुक्त बनाना। किसी साधारण या विकृत वस्तु को विशेष क्रियाओं द्वारा उत्तम बना देना ही उसका संस्कार है। इसी तरह किसी साधारण मनुष्य को विशेष प्रकार की धार्मिक क्रिया-प्रक्रियाओं द्वारा श्रेष्ठ बनाना ही सुसंस्कृत करना कहा जाता है।*

*संस्कार का सामान्य अर्थ है-किसी को संस्कृत करना या शुद्ध करके उपयुक्त बनाना। किसी साधारण या विकृत वस्तु को विशेष क्रियाओं द्वारा उत्तम बना देना ही उसका संस्कार है। इसी तरह किसी साधारण मनुष्य को विशेष प्रकार की धार्मिक क्रिया-प्रक्रियाओं द्वारा श्रेष्ठ बनाना ही सुसंस्कृत करना कहा जाता है।*

*संस्कार के पालन से मिलती है आयु-आरोग्यता। । भारतीय संस्कृति में सोलह संस्कार बताए गए हैं। इन संस्कारों के अनुसार जीवन-यापन करने से मनुष्य जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। इसमें उपनयन संस्कार की विशेष महत्ता है। इस संस्कार के साथ ही बालक ब्रह्मचर्य आश्रम में प्रवेश करता है। ब्रह्मचर्य के नियम कायदों का पालन करने से आयु-आरोग्यता और जीवन में सफलता मिलती है। आज अभिभावकों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वे उपनयन संस्कार के नियमों का पालन करें।*

*संस्कृत भाषा का शब्द है संस्कार। मन, वचन, कर्म और शरीर को पवित्र करना ही संस्कार है। हमारी सारी प्रवृतियों और चित्तवृत्तियों का संप्रेरक हमारे मन में पलने वाला संस्कार होता है। संस्कार से ही हमारा सामाजिक और आध्यात्मिक जीवन पुष्ट होता है और हम सभ्य कहलाते हैं। व्यक्तित्व निर्माण में हिन्दू संस्कारों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। संस्कार विरुद्ध आचरण असभ्यता की निशानी है। संस्कार मनुष्य को पाप और अज्ञान से दूर रखकर आचार-विचार और ज्ञान-विज्ञान से संयुक्त करते हैं। मुख्यत: तीन भागों में विभाजित संस्कारों को क्रमबद्ध सोलह संस्कार में विभाजित किया जा सकता है। ये तीन प्रकार होते हैं- (1) मलापनयन, (2) अतिशयाधान और (3) न्यूनांगपूरक।*

*(1) मलापनयन -उदाहरणार्थ किसी दर्पण आदि पर पड़ी हुए धूल, मल या गंदगी को पोंछना, हटाना या स्वच्छ करना मलापनयन कहलाता है।*

*(2) अतिशयाधान- किसी रंग या पदार्थ द्वारा उसी दर्पण को विशेष रूप से प्रकाशमय बनाना या चमकाना 'अतिशयाधानÓ कहलाता है। दूसरे शब्दों में इसे भावना, प्रतियत्न या गुणाधान-संस्कार भी कहा जाता है।*

*(3) न्यूनांगपूरक- अनाज के भोज्य पदार्थ बन जाने पर दाल, शाक, घृत आदि वस्तुएँ अलग से लाकर मिलाई जाती हैं। उसके हीन अंगों की पूर्ति की जाती हैं, जिससे वह अनाज रुचिकर और पौष्टिक बन सके। इस तृतीय संस्कार को न्यूनांगपूरक संस्कार कहते हैं।*

*अत: गर्भस्थ शिशु से लेकर मृत्युपर्यंत जीव के मलों का शोधन, सफाई आदि कार्य विशिष्ट विधिक क्रियाओं व मंत्रों से करने को संस्कार कहा जाता है। हिंदू धर्म में सोलह संस्कारों का बहुत महत्व है। वेद, स्मृति और पुराणों में अनेकों संस्कार बताए गए है किंतु धर्मज्ञों के अनुसार उनमें से मुख्य सोलह संस्कारों में ही सारे संस्कार सिमट जाते हैं अत: इन संस्कारों के नाम है-*

*(1)गर्भाधान संस्कार, (2)पुंसवन संस्कार, (3)सीमन्तोन्नयन संस्कार, (4)जातकर्म संस्कार, (5)नामकरण संस्कार, (6)निष्क्रमण संस्कार, (7)अन्नप्राशन संस्कार, (8)मुंडन संस्कार, (9)कर्णवेधन संस्कार, (10)विद्यारंभ संस्कार, (11)उपनयन संस्कार, (12)वेदारंभ संस्कार, (13)केशांत संस्कार, (14)सम्वर्तन संस्कार, (15)विवाह संस्कार और (16)अन्त्येष्टि संस्कार।*

*संस्कार का अभिप्राय उन धार्मिक कृत्यों हैं जो किसी व्यक्ति को अपने समुदाय का योग्य सदस्य बनाकर उसके शरीर, मन और मस्तिष्क को पवित्र करें। संस्कार ही मनुष्य को सभ्यता का हिस्सा बनाए रखते हैं। लेकिन वर्तमान में हिंदुजन उक्त सोलह संस्कार मनमाने तरीके से करके मत भिन्नता का परिचय देते हैं, जो कि वेद विरुद्ध है।*

*वेदों के अलावा गृहसूत्रों में संस्कारों का उल्लेख मिलता है। स्मृति और पुराणों में इसके बारे में विस्तृत जानकारी मिलती है। वेदज्ञों अनुसार गर्भस्थ शिशु से लेकर मृत्युपर्यंत जीव के मलों का शोधन, सफाई आदि कार्य को विशिष्ट विधि व मंत्रों से करने को संस्कार कहा जाता है। यह इसलिए आवश्यक है कि व्यक्ति जब शरीर त्याग करे तो सद्गति को प्राप्त हो।*

*कर्म के संस्कार👉 हिंदू दर्शन के अनुसार, मृत्यु के बाद मात्र यह भौतिक शरीर या देह ही नष्ट होती है, जबकि सूक्ष्म शरीर जन्म-जन्मांतरों तक आत्मा के साथ संयुक्त रहता है। यह सूक्ष्म शरीर ही जन्म-जन्मांतरों के शुभ-अशुभ संस्कारों का वाहक होता है। ये संस्कार मनुष्य के पूर्वजन्मों से ही नहीं आते, अपितु माता-पिता के संस्कार भी रज और वीर्य के माध्यम से उसमें (सूक्ष्म शरीर में) प्रविष्ट होते हैं, जिससे मनुष्य का व्यक्तित्व इन दोनों से ही प्रभावित होता है। बालक के गर्भधारण की परिस्थितियां भी इन पर प्रभाव डालती हैं।*

*ये संस्कार ही प्रत्येक जन्म में संगृहीत (एकत्र) होते चले जाते हैं, जिससे कर्मों (अच्छे-बुरे दोनों) का एक विशाल भंडार बनता जाता है। इसे संचित कर्म कहते हैं। इन संचित कर्मों का कुछ भाग एक जीवन में भोगने के लिए उपस्थित रहता है और यही जीवन प्रेरणा का कार्य करता है। अच्छे-बुरे संस्कार होने के कारण मनुष्य अपने जीवन में प्रेरणा का कार्य करता है। अच्छे-बुरे संस्कार होने के कारण मनुष्य अपने जीवन में अच्छे-बुरे कर्म करता है। फिर इन कर्मों से अच्छे-बुरे नए संस्कार बनते रहते हैं तथा इन संस्कारों की एक अंतहीन श्रृंखला बनती चली जाती है, जिससे मनुष्य के व्यक्तित्व का निर्माण होता है।*

*उक्त संस्कारों के अलावा भी अनेकों संस्कार है जो हमारी दिनचर्या और जीवन के महत्वपूर्ण घटनाक्रमों से जुड़े हुए हैं, जिन्हें जानना प्रत्येक हिंदू का कर्तव्य माना गया है और जिससे जीवन के रोग और शोक मिट जाते हैं तथा शांति और समृद्धि का रास्ता खुलता है। यह संस्कार ऐसे हैं जिसको निभाने से हम परम्परागत व्यक्ति नहीं कहलाते बल्कि यह हमारे जीवन को सुंदर बनाते हैं।*

सोलह संस्कार
हिन्दू धर्म के सोलह (16) संस्कार – शास्त्रों के अनुसार मनुष्य जीवन के लिए कुछ आवश्यक नियम बनाए गए हैं जिनका पालन करना हमारे लिए आवश्यक माना गया है। मनुष्य जीवन में हर व्यक्ति को अनिवार्य रूप से सोलह संस्कारों का पालन करना चाहिए। यह संस्कार व्यक्ति के जन्म से मृत्यु तक अलग-अलग समय पर किए जाते हैं।प्राचीन काल से इन सोलह संस्कारों के निर्वहन की परंपरा चली आ रही है। हर संस्कार का अपना अलग महत्व है। जो व्यक्ति इन सोलह संस्कारों का निर्वहन नहीं करता है उसका जीवन अधूरा ही माना जाता है।

***ये सोलह संस्कार क्या-क्या हैं ***
(1). गर्भाधान :- प्रथम कर्त्तव्य के रूप में इस संस्कार को मान्यता दी गई है। जीवन का प्रमुख उद्देश्य श्रेष्ठ सन्तानोत्पत्ति है। उत्तम संतति की इच्छा रखनेवाले माता-पिता को गर्भाधान से पूर्व अपने तन और मन की पवित्रता के लिये यह संस्कार करना चाहिए।  

निषेकाद बैजिकं चैनो गार्भिकं चापमृज्यते। 
क्षेत्रसंस्कारसिद्धिश्च गर्भाधानफलं स्मृतम्॥
विधिपूर्वक संस्कार से युक्त गर्भाधान से अच्छी और सुयोग्य संतान उत्पन्न होती है। इस संस्कार से वीर्यसंबधी पाप का नाश होता है, दोष का मार्जन तथा क्षेत्र का संस्कार होता है। यही गर्भाधान-संस्कार का फल है।

गर्भाधान के समय स्त्री-पुरुष जिस भाव से भावित होते हैं, उसका प्रभाव उनके रज-वीर्य में भी पड़ता है। अतः उस रज-वीर्यजन्य संतान में माता-पिता के वे भाव स्वतः ही प्रकट हो जाते है। 
आहाराचारचेष्टाभिर्यादृशोभि: समन्वितौ। 
स्त्रीपुंसौ समुपेयातां तयोः पुतोडपि तादृशः॥
स्त्री और पुरुष जैसे आहार-व्यवहार तथा चेष्टा से संयुक्त होकर परस्पर समागम करते हैं, उनका पुत्र भी वैसे ही स्वभाव का होता है।

सन्तानार्थी पुरुष ऋतुकाल में ही स्त्री का समागम करे, पर-स्त्री का सदा त्याग रखे। स्त्रियों का स्वाभाविक ऋतुकाल रजो-दर्शन से 16 रात्रि पर्यन्त है। इसमे प्रथम चार रात्रियों में तो स्त्री-पुरुष सम्बन्ध होना ही नहीं चाहिए, ऐसा समागम व्यर्थ ही नहीं होता अपितु महा रोग कारक भी है।

इसी प्रकार 11 वीं और तेरहवी रात्रि भी गर्भाधान के लिए वर्जित है। शेष दस रात्रियां ठीक है। इनमें भी जो पूर्णमासी, अमावस्या, चदुर्दशी व अष्टमी (पर्व) रात्रि हो उसमें भी स्त्री-समागम से बचा रहे। छ्ठी, आठवी दशवी, बारहवी, चौदहवी और सोलहवी ये छः रात्रि पुत्र चाहने वाले के लिए तथा पाचंवी, सातवीं, नवीं और पन्द्रहवीं-ये चार रात्रियां कन्या की इच्छा से किये गये गर्भाधान के लिए उत्तम मानी गई है।

ऋतुस्नान के बाद स्त्री जिस प्रकार के पुरुष का दर्शन करती है, वैसा ही पुत्र उत्पन्न होता है। अतः जो स्त्री चाहती है कि मेरे पति के समान गुण वाला या अभिमन्यु जैसा वीर, ध्रुव जैसा भक्त, जनक जैसा आत्मज्ञानी, कर्ण जैसा दानी पुत्र हो, तो उसे चाहिए की ऋतुकाल के चौथे दिन स्नान आदि से पवित्र होकर अपने आदर्श रुप इन महापुरुषों के चित्रों का दर्शन तथा सात्त्विक भावों से उनका चिंतन करें और इसी सात्त्विकभावों में योग्य रात्रि को गर्भाधान करावे। रात्रि के तृतीय प्रहर (12  से 3 बजे) की संतान हरिभक्त और धर्मपरायण होती है।
संतानप्राप्ति के उद्देश्य से किए जाने वाले समागम के लिए अनेक वर्जनाएं भी निर्धारित की गई है, जैसे गंदी या मलिन-अवस्था में, मासिक धर्म के समय, प्रातः या सायं की संधिवेला में अथवा चिंता, भय, क्रोध आदि मनोविकारों के पैदा होने पर गर्भाधान नहीं करना चाहिए।

दिन में गर्भाधान करने से उत्पन्न संतान दुराचारी और अधम होती है। दिति के गर्भ से हिरण्यकशिपु जैसा महादानव इसलिए उत्पन्न हुआ था कि उसने आग्रहपूर्वक अपने स्वामी कश्यप के द्धारा संध्याकाल में गर्भाधान करवाया था। श्राद्ध के दिनों, पर्वों व प्रदोष-काल में भी समागम करना शास्त्रों में वर्जित है।

(2). पुंसवन :- गर्भस्थ शिशु के मानसिक विकास की दृष्टि से यह संस्कार उपयोगी समझा जाता है। गर्भाधान के दूसरे या तीसरे महीने में इस संस्कार को करने का विधान है। गर्भस्थ शिशु से सम्बन्धित इस संस्कार को शुभ नक्षत्र में सम्पन्न किया जाता है।  विशेष तिथि एवं ग्रहों की गणना के आधार पर ही गर्भधान करना उचित माना गया है। पुंसवन संस्कार का प्रयोजन स्वस्थ एवं उत्तम संतति को जन्म देना है। मनीषियों ने सन्तानोत्कर्ष के उद्देश्य से किये जाने वाले इस संस्कार को अनिवार्य माना है। गर्भधारण के पश्चात संभोग निषिद्ध है। 

पुंसवन संस्कार के दो प्रमुख लाभ :- पुत्र प्राप्ति और स्वस्थ, सुंदर गुणवान संतान है। गर्भ ठहर जाने पर भावी माता के आहार, आचार, व्यवहार, चिंतन, भाव सभी को उत्तम और संतुलित बनाने का प्रयास किया जाय। शारीरिक, मानसिक दृष्टि से परिपक्व हो जाने के बाद, समाज को श्रेष्ठ, तेजस्वी नई पीढ़ी देने के संकल्प के साथ ही संतान पैदा करने की पहल करें। उसके लिए अनुकूल वातवरण भी निर्मित किया जाता है। गर्भ के तीसरे माह में विधिवत पुंसवन संस्कार सम्पन्न कराया जाता है, क्योंकि इस समय तक गर्भस्थ शिशु के विचार तंत्र का विकास प्रारंभ हो जाता है। वेद मंत्रों, यज्ञीय वातावरण एवं संस्कार सूत्रों की प्रेरणाओं से शिशु के मानस पर तो श्रेष्ठ प्रभाव पड़ता ही है, अभिभावकों और परिजनों को भी यह प्रेरणा मिलती है कि भावी माँ के लिए श्रेष्ठ मनःस्थिति और परिस्थितियाँ कैसे विकसित की जाए।

क्रिया और भावना :-  गर्भ पूजन के लिए गर्भिणी के घर परिवार के सभी वयस्क परिजनों के हाथ में अक्षत, पुष्प आदि दिये जाएँ। निम्न मंत्रोचारण किया जाये :- 
ॐ सुपर्णोऽसि गरुत्माँस्त्रिवृत्ते शिरो, गायत्रं चक्षुबरृहद्रथन्तरे पक्षौ। स्तोमऽआत्मा छन्दा स्यङ्गानि यजूषि नाम।
 साम ते तनूर्वामदेव्यं, यज्ञायज्ञियं पुच्छं धिष्ण्याः शफाः। सुपर्णोऽसि गरुत्मान दिवं गच्छ स्वःपत॥
मंत्र समाप्ति पर अक्षत, पुष्प एक तश्तरी में एकत्रित करके गर्भिणी को दिया जाए। वह उसे पेट से स्पर्श करके रख दे। भावना की जाए, गर्भस्थ शिशु को सद्भाव और देव अनुग्रह का लाभ देने के लिए पूजन किया जा रहा है। गर्भिणी उसे स्वीकार करके गर्भ को वह लाभ पहुँचाने में सहयोग कर रही है।

(3). सीमन्तोन्नयन :- सीमन्तोन्नयन का अभिप्राय है सौभाग्य संपन्न होना। गर्भपात रोकने के साथ-साथ गर्भस्थ शिशु एवं उसकी माता की रक्षा करना भी इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य है। इस संस्कार के माध्यम से गर्भिणी स्त्री का मन प्रसन्न रखने के लिये सौभाग्यवती स्त्रियां गर्भवती की माँग भरती हैं। यह संस्कार गर्भ धारण के छठे अथवा आठवें महीने में होता है।

(4). प्रसव उपरान्त क्रियाएँ- जातकर्म :- नवजात शिशु के नालच्छेदन से पूर्व इस संस्कार को करने का विधान है। इस दैवी जगत् से प्रत्यक्ष सम्पर्क में आने वाले बालक को मेधा, बल एवं दीर्घायु के लिये स्वर्ण खण्ड से मधु एवं घृत चटाया जाता है। दो बूंद घी तथा छह बूंद शहद का सम्मिश्रण अभिमंत्रित कर चटाने के बाद पिता यज्ञ करता है , बालक के बुद्धिमान, बलवान, स्वस्थ एवं दीर्घ जीवी होने की प्रार्थना करता है। इसके बाद माता बालक को स्तनपान कराती है।यह संस्कार विशेष मन्त्रों एवं विधि से किया जाता है।

शिशु के विश्व प्रवेश पर उसके ओजमय अभिनन्दन का यह संस्कार है। इसमें सन्तान की अबोध अवस्था में भी उस पर संस्कार डालने की चेष्टा की जाती है। माता से शारीरिक सम्बन्ध टूटने पर उसके मुख नाकादि को स्वच्छ करना ताकि वह श्वास ले सके तथा दूध पी सके।

यह सफाई सधी हुई दाई या नर्स द्वारा किया जाता है। सैंधव नमक घी में मिलाकर देने से नाक और गला साफ हो जाते हैं। बच्चे की त्वचा को साफ करने के लिए साबुन या बेसन और दही को मिलाकर उबटन की तरह प्रयोग किया जाता है।
स्नान के लिए गुनगुने पानी का प्रयोग होता है। चरक के अनुसार कान को साफ करके वे शब्द सुन सकें इसलिए कान के पास पत्थरों को बजाना चाहिए।

बच्चे के सिर पर घी में डूबोया हुआ फाया रखते हैं क्योंकि तालु जहां पर सिर की तीन अस्थियां दो पासे की ओर एक माथे से मिलती है वहां पर जन्मजात बच्चे में एक पतली झिल्ली होती है।

इस तालु को दृढ़ बनाने इसकी रक्षा करने इसे पोषण दिलाने के लिए ये आवश्यक होता है। इस प्रयोग से बच्चे को सर्दी जुकाम आदि नहीं सताते। जन्म पश्चात सम शीतोष्ण वातावरण में शिशु प्रथम श्वास ले।

शिशु का प्रथम श्वास लेना अति महत्वपूर्ण घटना है। गर्भ में जन्म पूर्व शिशु के फफ्फुस जल से भारी होते हैं। प्रथम श्वास लेते समय ही वे फैलते हैं और जल से हलके होते हैं। इस समय का श्वसन-प्रश्वसन शुद्ध समशीतोष्ण वातायन में हो।
शिशु के तन को कोमल वस्त्र या रुई से सावधानीपूर्वक साफ-सुथरा कर गोद में लेकर देवयज्ञ करके स्वर्ण शलाका को सममात्रा मिश्रित घी-षहद में डुबोकर उसकी जिह्वा पर ब्रह्म नाम लिखकर उसके वाक देवता जागृत करे।

इसके साथ उसके दाहिने तथा बाएं कान में "वेदोऽसि" कहा जाता है। अर्थात तू ज्ञानवाला प्राणी है, अज्ञानी नहीं है। तेरा नाम ब्रह्मज्ञान है। इसके पष्चात सोने की शलाका से उसे मधु-घृत चटाया जाता है और उसके अन्य बीज देवताओं में शब्द उच्चारण द्वारा शतवर्ष स्वस्थ अदीन ब्रह्म निकटतम जीने की भावना भरें, यह कामना की जाती है।

शिशु के दाएं तथा बाएं कान में क्रमषः शब्दोच्चार करते सविता, सरस्वती, इड़ा, पिंगला, सुषुम्णा, मेधा, अग्नि, वनस्पति, सोम, देव, ऋषि, पितर, यज्ञ, समुद्र, समग्र व्यवस्था द्वारा आयुवृद्धि, स्वस्थता प्राप्ति भावना भरें, यह कामना की जाती है। 

तत्पश्चात शिशु के कन्धों को अपनत्व भाव स्पर्श करके उसके लिए उत्तम दिवसों, ऐश्वर्य, दक्षता, वाक का भाव रखते उसके ब्रह्मचर्य-गृहस्थ-वानप्रस्थ (संन्यास सहित) तथा बल-पराक्रमयुक्त इन्द्रियों सहित और विद्या-शिक्षा-परोपकार सहित (त्र्यायुष-त्रि) होने की भावना का शब्दोच्चार करें।

इसी के साथ प्रसूता पत्नी के अंगों का सुवासित जल से मार्जन करता परिशुद्धता ऋत-शृत भाव उच्चारे।
इसके पश्चात शिशु को कः, कतरः, कतमः याने आनन्द, आनन्दतर, आनन्दतम भाव से सशब्द आशीर्वाद देकर, अपनत्व भावना भरा उसके अंग-हृदय सम-भाव अभिव्यक्त करते हुए उसके ज्ञानमय शतवर्ष जीने की कामना करता उसके शीष को सूंघे।

इतना करने के पश्चात पत्नी के दोनों स्तनों को पुष्पों द्वारा सुगन्धित जल से मार्जन कराकर दक्षिण, वाम स्तनों से शिशु को ऊर्जित, सरस, मधुमय प्रविष्ट कराने दुग्धपान कराए। इसके पष्चात वैदिक विद्वान पिता-माता सहित शिशु को दिव्य इन्द्रिय, दिव्य जीवन, स्वस्थ तन, व्यापक-अभय-उत्तम जीवन शतवर्षाधिक जीने का आषीर्वाद दें।

जातकर्म की अन्तिम प्रक्रिया जो शिशु के माता-पिता को करनी है वह है :- दस दिनों तक भात तथा सरसौं मिलाकर आहुतियां देना।

(5).नामकरण :- इस संस्कार का सनातन धर्म में बहुत अधिक महत्व है।जन्म के दस दिन तक अशौच (-सूतक) माना जाता है। इसलिये यह संस्कार ग्यारहवें दिन करने का विधान है। लेकिन अनेक कर्मकाण्डी विद्वान इस संस्कार को शुभ नक्षत्र अथवा शुभ दिन में करना उचित मानते हैं।यह व्यक्तित्व के विकास में सहायक होता है। महर्षि याज्ञवल्क्य का भी यही मत है, लेकिन अनेक कर्म काण्डी विद्वान इस संस्कार को शुभ नक्षत्र अथवा शुभ दिन में करना उचित मानते हैं।मनीषियों ने नाम का प्रभाव इसलिये भी अधिक बताया है, क्योंकि यह व्यक्तित्व के विकास में भी सहायक है।कहा गया है राम से बड़ा राम का नाम। धर्म में ज्योतिष मनुष्य के भविष्य की रूपरेखा  का ज्ञान-भान करा देता है। 

इस संस्कार का उदेश्य केवल शिशु को नाम देना भर नहीं है, अपितु उसे श्रेष्ठ तम सस्कारों सहित उच्च कोटि के मानव के रूप में विकसित करना है। नाम केवल सम्बोधन के लिए अपितु साभिप्राय होना चाहिये।  सन्तान के जन्म के दिन से ग्यारहवें दिन, एक सौ एकवें दिन या दूसरे वर्ष के आरम्भ में जिस दिन जन्म हुआ हो यह संस्कार करना चाहिए। नाम ऐसा रक्खे कि श्रवण मात्र से मन में उदात्त भाव उत्पन्न करनेवाला हो।यह उच्चारण में सरल होना चाहिए। स्व-नाम श्रवण व्यक्ति अपने जीवन में अधिकतम बार करता है। अपना नाम उसकी सबसे बड़ी पहचान है। अपना नाम पढ़ना, सुनना हमेशा भला और उत्तम लगता है। नाम रखने में देवश्रव, दिवस ऋत या श्रेष्ठ श्रव भाव आना चाहिए। नाम हमेशा शुभ ही रखना चाहिए। शुभ तथा अर्थमय नाम ही सार्थक नाम है। 

कः कतमः सिद्धान्त नामकरण का आधार सिद्धान्त है। कौन हो ? सुख हो, ब्रह्मवत हो। कौन-तर हो ? ब्रह्मतर हो। कौन-तम हो ? ब्रह्मतम हो। ब्रह्म व्यापकता का नाम है। मानव का व्यापक रूप प्रजा है। अतिव्यापक रूप सु-प्रजा है। भौतिक व्यापकता क्रमश: पृथ्वी, अन्तरिक्ष, द्युलोक है। इन लोकों के आरोहण के भाव वेद मन्त्रों में हैं। वीर शरीर-आत्म-समाज बल से युक्त युद्ध कुशल व्यक्ति का नाम है। सुवीर प्रशस्त वीर का नाम है, जो परमात्म बल शरीर, आत्म, समाज में उतारने में कुशल होता है। सामाजिक आत्मिक निष्ठाओं (यमों) का पालन ही व्यक्ति को श्रेष्ठ ऐश्वर्य देता उसको सु-ऐश्वर्य दे परिपुष्ट करता है। 

यदि सन्तान बालक है तो समाक्षरी अर्थात दो अथवा चार अक्षरोंयुक्त नाम रखा जाता है। और इनमें ग घ ङ ज झ ´ ड ढ ण द ध न ब भ म य र ल व इन अक्षरों का प्रयोग किया जाए। बालिका का नाम विषमाक्षर अथात एक, तीन या पांच अक्षरयुक्त होना चाहिए।

(6).  निष्क्रमण :- निष्क्रमण का अर्थ है बाहर निकालना। तीन माह तक शिशु का शरीर बाहरी वातावरण यथा तेज धूप, तेज हवा आदि के अनुकूल नहीं होता है इसलिये प्राय: तीन मास तक उसे बहुत सावधानी से घर में रखना चाहिए। इसके बाद धीरे-धीरे उसे बाहरी वातावरण के संपर्क में आने देना चाहिए। इस संस्कार का तात्पर्य यही है कि शिशु समाज के सम्पर्क में आकर सामाजिक परिस्थितियों से अवगत हो। यह घर की अपेक्षा अधिक शुद्ध वातावरण में शिशु के भ्रमण की योजना है। बच्चे के शरीर तथा मन के विकास के लिए उसे घर के चार दीवारी से बाहर ताजी शुद्ध हवा एवं सूर्यप्रकाश का सेवन कराना इस संस्कार का उद्देश्य है। 

गृह्यसूत्रों के अनुसार जन्म के बाद तीसरे शुक्ल पक्ष की तृतीया अर्थात चान्द्रमास की दृष्टि से जन्म के दो माह तीन दिन बाद अथवा जन्म के चौथे माह में यह संस्कार करे। दैवी जगत् से शिशु की प्रगाढ़ता बढ़े तथा ब्रह्माजी की सृष्टि से वह अच्छी तरह परिचित होकर दीर्घ काल तक धर्म और मर्यादा की रक्षा करते हुए इस लोक का भोग करे यही इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य है। भगवान् भास्कर के तेज तथा चन्द्रमा की शीतलता से शिशु को अवगत कराना ही इसका उद्देश्य है। इसके पीछे मनीषियों की शिशु को तेजस्वी तथा विनम्र बनाने की परिकल्पना होगी। उस दिन देवी-देवताओं के दर्शन तथा उनसे शिशु के दीर्घ एवं यशस्वी जीवन के लिये आशीर्वाद ग्रहण किया जाता है। इस संस्कार का तात्पर्य यही है कि शिशु समाज के सम्पर्क में आकर सामाजिक परिस्थितियों से अवगत हो। हमारा शरीर पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश जिन्हें पंचभूत कहा जाता है, से बना है। इसलिए पिता इन देवताओं से बच्चे के कल्याण की प्रार्थना करते हैं।

इसमें शिशु को ब्रह्म द्वारा समाज में अनघ अर्थात पाप रहित करने की भावना तथा वेद द्वारा ज्ञान पूर्ण करने की भावना अभिव्यक्त करते माता-पिता यज्ञ करें। पति-पत्नी प्रेमपूर्वक शिशु के शत तथा शताधिक वर्ष तक समृद्ध, स्वस्थ, सामाजिक, आध्यात्मिक जीने की भावनामय होकर शिशु को सूर्य का दर्शन कराए।इसी प्रकार रात्रि में चन्द्रमा का दर्षन उपरोक्त भावना सहित कराए। यह संस्कार शिशु को आकाष, चन्द्र, सूर्य, तारे, वनस्पति आदि से परिचित कराने के लिए है।

आयुर्वेद के ग्रन्थों में कुमारागार, बालकों के वस्त्र, उसके खिलौने, उसकी रक्षा एवं पालनादि विषयों पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है। कुमारागार ऐसा हो जिसमें अधिक हवा न आती हो किन्तु एक ही मार्ग से वायु प्रवेश हो। कुत्ते, हिंसक जन्तु, चूहे, मच्छर, आदि न आ सकें ऐसा पक्का मकान हो।जिसमें यथा स्थान जल, कूटने-पीसने का स्थान, मल-मूत्र त्याग के स्थान, स्नानगृह, रसोई अलग-अलग हों। इस कुमारागार में रक्षा के समस्त साधन, मंगलकार्य, होमादि की सामग्री उपस्थित हों।
बच्चों के बिस्तर, आसन, बिछाने के वस्त्र कोमल, हल्के पवित्र, सुगन्धित होनें चाहिए। पसीना, मलमूत्र एवं जूं आदि से दूषित कपड़े हटा देवें। बरतन नए हों अन्यथा अच्छी प्रकार धोकर गुग्गुल, सरसो, हींग, वच, चोरक आदि का धुंआ देकर साफ करके सुखाकर काम में ले सकते हैं। बच्चों के खिलौने विचित्र प्रकार के बजनेवाले, देखने में सुन्दर एवं हल्के हों। वे नुकीले न हों, मुख में न आ सकनेवाले तथा प्राणहरण न करनेवाले होनें चाहिए।

(7) अन्नप्राशन :- शिशु जो अब तक पेय पदार्थो विशेषकर दूध पर आधारित था, अब अन्न जिसे शास्त्रों में प्राण कहा गया है उसको ग्रहण कर शारीरिक व मानसिक रूप से अपने को बलवान व प्रबुद्ध बनाए। तन और मन को सुदृढ़ बनाने में अन्न का सर्वाधिक योगदान है। शुद्ध, सात्विक एवं पौष्टिक आहार से ही तन स्वस्थ रहता है और स्वस्थ तन में ही स्वस्थ मन का निवास होता है। आहार शुद्ध होने पर ही अन्त:करण शुद्ध होता है तथा मन, बुद्धि, आत्मा सबका पोषण होता है। अन्नप्राशन के लिये जन्म से छठे महीने को उपयुक्त माना है। छठे मास में शुभ नक्षत्र एवं शुभ दिन देखकर यह संस्कार करना चाहिए। खीर और मिठाई से शिशु के अन्नग्रहण को शुभ माना गया है। हमारे शास्त्रों में खीर को अमृत के समान माना गया है।
जब बालक के प्रायः दाँत निकल आते हैं, तब उसे उबला हुआ अन्न खिलाया जाता है। इसमें वह दही, मधु, घी, चावल आदि खिला सकते हैं। इस संस्कार के पूर्व शिशु अपने भोजन के लिए माता के दूध या गाय के दूध पर निर्भर रहता था।  

जब उसकी पाचन शक्ति बढ़ जाती है और उसके शरीर के विकास के लिए पौष्टिक तत्वों की आवश्यकता पड़ती है, तब बालक को प्रथम बार अन्न अथवा ठोस भोजन दिया जाता है।
मानव एवं शंख के अनुसार यह संस्कार जन्म से पाँचवें या छठे महीने में किया जाना चाहिए, किंतु मनु तथा याज्ञवलक्य दोनों ही इसके लिए 6-12 मास के बीच का समय उपयुक्त मानते हैं तथा साथ ही यह मत भी कि पुत्र शिशु का अन्नप्राशन सम मासों ( 6, 8, 10, 12) तथा कन्या शिशु का विषम मासों ( 5,  7, 9, 11) में किया जाना अधिक उपयुक्त होता है। जीवन में पहले पहल बालक को अन्न खिलाना इस संस्कार का उद्देश्य है। पारस्कर गृह्यसूत्र के अनुसार छठे माह में अन्नप्राशन संस्कार होना चाहिए। कमजोर पाचन शिशु का सातवे माह जन्म दिवस पर कराए।

इसमें ईश्वर प्रार्थना उपासना पश्चात शिशु के प्राण-अपानादि श्वसन व्यवस्था तथा पंचेन्द्रिय परिशुद्धि भावना का उच्चारण करता घृतमय भात पकाना तथा इसी भात से यज्ञ करने का विधान है।

इस यजन में माता-पिता तथा यजमान विश्व देवी प्रारूप की अवधारणा के साथ शिशु में वाज स्थापना (षक्तिकरण-ऊर्जाकरण) की भावना अभिव्यक्त करे। इसके पश्चात पुनः पंच श्वसन व्यवस्था तथा इन्द्रिय व्यवस्था की शुद्धि भावना पूर्वक भात से हवन करे। फिर शिशु को घृत, मधु, दही, सुगन्धि (अति बारीक पिसी इलायची आदि) मय भात रुचि अनुकूल सहजतापूर्वक खिलाए। 

इस संस्कार में अन्न के प्रति पकाने की सौम्य महक तथा हवन के एन्झाइम ग्रहण से क्रमषः संस्कारित अन्नभक्षण का अनुकूलन है। माता के दूध से पहले पहल शिशु को अन्न पर लाना हो तो मां के दूध की जगह गाय का दूध देना चाहिए। इस दूध को देने के लिए 150 मि.ग्रा. गाय के दूध में 60 मि.ग्रा. उबला पानी व एक चम्मच मीठा ड़ालकर शिशु को पिला दें। यह क्रम एक सप्ताह तक चलाकर दूसरे सप्ताह एक बार की जगह दो बार बाहर का दूध दें। तीसरे सप्ताह दो बार की जगह तीन बार बाहर का दूध दें, चौथे सप्ताह दोपहर दूध के स्थान पर सब्जी का रसा, थोड़ा दही, थोड़ा शहद, थोड़ा चावल दें। पांचवें सप्ताह दो समय के दूध के स्थान पर रसा, सब्जी, दही, शहद आदि बढ़ा दें। इस प्रकार बालक को धीरे-धीरे माता का दूध छुड़ाकर अन्न पर ले आने से बच्चे के पेट में कोई रोग होने की सम्भावना नहीं रहती। इस संस्कार पश्चात कालान्तर में दिवस-दिवस क्रमश: मूंगदाल, आलू, विभिन्न मौसमी सब्जियां, शकरकंद, गाजर, पालक, लौकी आदि (सभी भातवत अर्थात अति पकी- गलने की सीमा तक पकी) द्वारा भी शिशु का आहार अनुकूलन करना चाहिए। 

इस प्रकार व्यापक अनुकूलित अन्न खिलाने से शिशु अपने जीवन में सुभक्षण का आदि होता है तथा स्वस्थता प्राप्त करता है। इस संस्कार के बाद शिशु मितभुक्, हितभुक्, ऋतभुक्, शृतभुक होता है।

(8).  चूड़ा कर्म-मुण्डन संस्कार :- बालक के पहले, तीसरे या पांचवें वर्ष में इस संस्कार को करने का विधान है। इस संस्कार के पीछे शुाचिता और बौद्धिक विकास की भावना है। मुंडन संस्कार का अभिप्राय है कि जन्म के समय उत्पन्न अपवित्र बालों को हटाकर बालक को प्रखर बनाना है। नौ माह तक गर्भ में रहने के कारण शरीर के साथ-साथ उसके बालों भी अपवित्र-अशुद्ध हो जाते हैं। मुंडन संस्कार से इन दोषों का निवारण होता है।ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस संस्कार को शुभ मुहूर्त में करने का विधान है।

संस्कारों की प्रतिष्ठापना बालकपन में ही करके उन्हें सुसंस्कारी बनाया जाता है ताकि वेदारम्भ तथा क्रिया-कर्मों के लिए अधिकारी बन सके अर्थात वेद-वेदान्तों के पढ़ने तथा यज्ञादिक कार्यों में भाग ले सके। उसका मस्तिष्कीय विकास एवं सुरक्षा व्यवस्थित रूप से आरम्भ हो जाए, ऐसा विचार किया जाता है।चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करते रहने के कारण आत्मा कितने ही ऐसे पाशविक संस्कार, विचार, मनोभाव अपने भीतर धारण किये रहती है, जो मानव जीवन में अनुपयुक्त एवं अवांछनीय होते हैं।मूल केशों को हटाकर मानवता वादी आदर्शो को प्रतिष्ठापित किये जाने हेतु यह कर्म आवश्यक है। ऐसा न होने पर यह मानना होगा कि आकृति मात्र मनुष्य की हुई-प्रवृत्ति पशु की।

रोग रहित उत्तम समृद्ध ब्रह्म गुणमय आयु तथा समृद्धि-भावना के कथन के साथ शिशु के प्रथम केशों के छेदन का विधान चूडाकर्म अर्थात मुण्डन संस्कार है। बच्चे के दांत छः सात मास की आयु से निकलना प्रारम्भ होकर ढाई-तीन वर्ष तक की आयु तक निकलते रहते हैं।

दांत निकलते समय सिर भारी हो जाता है, गर्म रहता है, सिर में दर्द होता है, मसूड़े सूझ जाते हैं, लार बहा करती है, दस्त लग जाते हैं, आंखे आ जाती हैं, बच्चा चिड़चिड़ा हो जाता है।दांतों के निकलने का भारी प्रभाव सिर पर पड़ता है। इसलिए सिर को हल्का और ठंडा रखने के लिए सिर पर बालों का बोझ उतार ड़ालना ही इस संस्कार का उदेश्य है।

शिशु गर्भ में होता है तभी उसके बाल आ जाते हैं, उन मलिन बालों को निकाल देने से, सिर की खुजली दाद आदि से रक्षा होती है। उसके उपरांत उगने वाले बाल मजबूत-घने होते हैं। 
इस संस्कार द्वारा बालक में त्र्यायुष भरने की भावना भरी जाती है। त्र्यायुष एक व्यापक विज्ञान है।

(i) ज्ञान-कर्म-उपासना त्रिमय चार आश्रम त्र्यायुष हैं। 
(ii) शुद्धि, बल और पराक्रम त्र्यायुष हैं। 
(iii) शरीर, आत्मा और समाज त्र्यायुष हैं। 
(iv) विद्या, धर्म, परोपकार त्र्यायुष हैं। 
(v) शरीर-मन-बुद्धि, धी-चित्त-अहंकार आदि अर्थात आधिदैविक, आधिभौतिक, आध्यात्मिक इन त्रिताप से रहित करके त्रिसमृद्धमय जीवन जीना त्र्यायुष है।

(9). विद्यारम्भ :- विद्यारम्भ संस्कार के क्रम के बारे में मतभिन्नता है। कुछ का मत है कि अन्नप्राशन के बाद विद्यारम्भ संस्कार होना चाहिये तो कुछ चूड़ाकर्म के बाद इस संस्कार को उपयुक्त मानते हैं चूड़ाकर्म के बाद ही विद्यारम्भ संस्कार उपयुक्त लगता है। विद्यारम्भ का अभिप्राय बालक को शिक्षा के प्रारम्भिक स्तर से परिचित कराना है। प्राचीन काल में जब गुरुकुल की परम्परा थी तो बालक को वेदाध्ययन के लिये भेजने से पहले घर में अक्षर बोध कराया जाता था। 

शुभ मुहूर्त में ही विद्यारम्भ संस्कार करना चाहिये। विद्यारंभ संस्कार का संबध उपनयन संस्कार की भांति गुरुकुल प्रथा से था, जब गुरुकुल का आचार्य बालक को यज्ञोपवीत धारण कराकर, वेदाध्ययन करता था। गुरुजनों से वेदों और उपनिषदों का अध्ययन कर तत्त्वज्ञान की प्राप्ति करना ही इस संस्कार का परम प्रयोजन है। जब बालक-बालिका का मस्तिष्क शिक्षा ग्रहण करने योग्य हो जाता है, तब यह संस्कार किया जाता है। आमतौर या 5 वर्ष का बच्चा इसके लिए उपयुक्त होता है। मंगल के देवता गणेश और कला की देवी सरस्वती को दमन करके उनसे प्रेरणा ग्रहण करने की मूल भावना इस संस्कार में निहित होती है। बालक विद्या देने वाले गुरु का पूर्ण श्रद्धा से अभिवादन व प्रणाम इसलिए करता है कि गुरु उसे एक श्रेष्ठ मानव बनाए। ज्ञानस्वरुप वेदों का विस्तृत अध्ययन करने के पूर्व मेधाजनन नामक एक उपांग-संस्कार करने का विधान भी शास्त्रों में वर्णित है। इसके करने से बालक में मेधा, प्रज्ञा, विद्या तथा श्रद्धा की अभिवृद्धि होती है। इससे वेदाध्ययन आदि में ना केवल सुविधा होती है, बल्कि विद्याध्ययन में कोई बाधा उत्पन्न नहीं होती।

विद्यया लुप्यते पापं विद्ययाडयुः प्रवर्धते। 
विद्यया सर्वसिद्धिः स्याद्धिद्ययामृतश्नुते॥ 
वेदविद्या के अध्ययन से सारे पापों का लोप होता है, आयु की वृद्धि होती है, सारी सिद्धियां प्राप्त होती है, यहां तक कि विद्यार्थी के समक्ष साक्षात् अमृतरस अशन-पान के रुप में उपलब्ध हो जाता है। शास्त्रवचन है की जिसे विद्या नहीं आती, उसे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के चारों फलों से वंचित रहना पडता है। इसलिए विद्या की आवश्यकता अनिवार्य है।

(10) कर्णवेध संस्कार उपनयन :– कर्णवेध संस्कार उपनयन के पूर्व ही कर दिया जाना चाहिए। इस संस्कार को 6 माह से लेकर 16वें माह तक अथवा 3,5 आदि विष्म वर्षो में या कुल की परंपरा के अनुसार उचित आयु में किया जाता है। इसे स्त्री-पुरूषों में पूर्ण स्त्रीत्व एवं पुरूषत्व की प्राप्ति के उद्देश्य से कराया जाता है। मान्यता यह भी है कि सूर्य की किरणें कानों के छिद्र से प्रवेश पाकर बालक-बालिका को तेज संपन्न बनाती हैं। बालिकाओं के आभूषण धारण हेतु तथा रोगों से बचाव हेतु यह संस्कार आधुनिक एक्युपंचर पद्धति के अनुरूप एक सशक्त माध्यम भी है।

हमारो शास्त्रों में कर्णवेध रहित पुरूष को श्राद्ध का अधिकारी नहीं माना गया है। ब्राह्मण और वैश्य का कर्णवेध चांदी की सुई से, शूद्र का लोहे की सुई से तथा क्षत्रिय और संपन्न पुरूषों का सोने की सुई से करने का विधान है। कर्णवेध संस्कार द्विजों का साही के कांटे से भी करने का विधान है। शुभ समय में, पवित्र स्थान पर बैठकर देवताओं का पूजन करने से पश्चात सूर्य के सम्मुख बालक या बालिका के कानों को निम्नलिखित मंत्र द्वारा अभिमंत्रित करना चाहिए। 

भद्रं कर्णेभि: श्रृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्रा:। 
स्थिरैरंगैस्तुष्टुवां सस्तनूभिव्र्यशेमहि देवहितं यदायु:।।
 इसके बाद बालक के दाहिने कान में पहले और बाएं कान में बाद में सुई से छेद करें। उनमें कुंडल आदि पहनाएं। बालिका के पहले बाएं कान में, फिर दाहिने कान में छेद करके तथा बाएं नाक में भी छेद करके आभूषण पहनाने का विधान है। मस्तिष्क के दोनों भागों को विद्युत के प्रभावों से प्रभावशील बनाने के लिए नाक और कान में छिद्र करके सोना पहनना लाभकारी माना गया है। 

नाक में नथुनी पहनने से नासिका संबंधी रोग नहीं होते और सर्दी खांसी में राहत मिलती है। कानों में सोने की बालियां या झुमके आदि पहनने से स्त्रियों में मासिक धर्म नियमित रहता है, इससे हिस्टीरिया गोग में भी लाभ मिलता है। 

(11). यज्ञोपवीत-जनेऊ :- यज्ञोपवीत बौद्धिक विकास के लिये सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार है। धार्मिक उन्नति का इस संस्कार में पूर्णरूपेण समावेश है। इस संस्कार के माध्यम से वेदमाता गायत्री को आत्मसात करने का प्रावधान दिया है। आधुनिक युग में भी गायत्री मंत्र पर विशेष शोध हो चुका है। गायत्री एक शक्तिशाली मंत्र है। यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं अर्थात् यज्ञोपवीत जिसे जनेऊ भी कहा जाता है अत्यन्त पवित्र है। प्रजापति ने स्वाभाविक रूप से इसका निर्माण किया है। यह आयु को बढ़ानेवाला, बल और तेज प्रदान करनेवाला है। गुरुकुल परम्परा में प्राय: आठ वर्ष की उम्र में यज्ञोपवीत संस्कार सम्पन्न किया जाता था।

यज्ञोपवीत से ही बालक को ब्रह्मचर्य की दीक्षा दी जाती थी जिसका पालन गृहस्थाश्रम में आने से पूर्व तक किया जाता था। इस संस्कार का उद्देश्य संयमित जीवन के साथ आत्मिक विकास में रत रहने के लिये बालक को प्रेरित करना है।

जनेऊ:

जनेऊ का नाम सुनते ही सबसे पहले जो चीज़ मन में आती है, वो है धागा, दूसरी चीज है ब्राह्मण। जनेऊ का संबंध क्या सिर्फ ब्राह्मण से है, ये जनेऊ पहनते क्यों हैं, क्या इसका कोई लाभ है, जनेऊ क्या, क्यों, कैसे आज आपका परिचय इससे ही करवाते हैं।

जनेऊ को उपवीत, यज्ञसूत्र, व्रतबन्ध, बलबन्ध, मोनीबन्ध और ब्रह्मसूत्र के नाम से भी जाना जाता है।

हिन्दू धर्म के 24 संस्कारों (आप सभी को 16 संस्कार पता होंगे लेकिन वो प्रधान संस्कार हैं, 8 उप संस्कार हैं, जिनके विषय मे आगे आपको जानकारी दूँगा) में से एक ‘उपनयन संस्कार’ के अंतर्गत ही जनेऊ पहनी जाती है, जिसे ‘यज्ञोपवीत धारण करने वाले व्यक्ति को सभी नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है। उपनयन का शाब्दिक अर्थ है, "सन्निकट ले जाना" और उपनयन संस्कार का अर्थ है- "ब्रह्म (ईश्वर) और ज्ञान के पास ले जाना"

हिन्दू धर्म में प्रत्येक हिन्दू का कर्तव्य है जनेऊ पहनना और उसके नियमों का पालन करना। हर हिन्दू जनेऊ पहन सकता है बशर्ते कि वह उसके नियमों का पालन करे। ब्राह्मण ही नहीं समाज का हर वर्ग जनेऊ धारण कर सकता है। जनेऊ धारण करने के बाद ही द्विज बालक को यज्ञ तथा स्वाध्याय करने का अधिकार प्राप्त होता है। द्विज का अर्थ होता है दूसरा जन्म। मतलब सीधा है जनेऊ संस्कार के बाद ही शिक्षा का अधिकार मिलता था और जो शिक्षा नही ग्रहण करता था उसे शूद्र की श्रेणी में रखा जाता था (वर्ण व्यवस्था)।

जिस लड़की को आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करना हो, वह जनेऊ धारण कर सकती है। ब्रह्मचारी तीन और विवाहित छह धागों की जनेऊ पहनता है। यज्ञोपवीत के छह धागों में से तीन धागे स्वयं के और तीन धागे पत्नी के बतलाए गए हैं।

#जनेऊ -- 

जनेऊ का नाम सुनते ही सबसे पहले जो चीज़ मन मे आती है वो है धागा दूसरी चीज है ब्राम्हण ।। जनेऊ का संबंध क्या सिर्फ ब्राम्हण से है , ये जनेऊ पहनाए क्यों है , क्या इसका कोई लाभ है, जनेऊ क्या ,क्यों ,कैसे आज आपका परिचय इससे ही करवाते है ----

#जनेऊ_को_उपवीत, यज्ञसूत्र, व्रतबन्ध, बलबन्ध, मोनीबन्ध और ब्रह्मसूत्र के नाम से भी जाना जाता है ।।

हिन्दू धर्म के 24 संस्कारों (आप सभी को 16 संस्कार पता होंगे लेकिन वो प्रधान संस्कार है 8 उप संस्कार है जिनके विषय मे आगे आपको जानकारी दूँगा ) में से एक ‘उपनयन संस्कार’ के अंतर्गत ही जनेऊ पहनी जाती है जिसे ‘यज्ञोपवीतधारण करने वाले व्यक्ति को सभी नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है। उपनयन का शाब्दिक अर्थ है "सन्निकट ले जाना" और उपनयन संस्कार का अर्थ है --
"ब्रह्म (ईश्वर) और ज्ञान के पास ले जाना"

#हिन्दू_धर्म_में प्रत्येक हिन्दू का कर्तव्य है जनेऊ पहनना और उसके नियमों का पालन करना। हर हिन्दू जनेऊ पहन सकता है बशर्ते कि वह उसके नियमों का पालन करे।ब्राह्मण ही नहीं समाज का हर वर्ग जनेऊ धारण कर सकता है। जनेऊ धारण करने के बाद ही द्विज बालक को यज्ञ तथा स्वाध्याय करने का अधिकार प्राप्त होता है। द्विज का अर्थ होता है दूसरा जन्म। मतलब सीधा है जनेऊ संस्कार के बाद ही शिक्षा का अधिकार मिलता था और जो शिक्षा नही ग्रहण करता था उसे शूद्र की श्रेणी में रखा जाता था(वर्ण व्यवस्था)।।

#लड़की_जिसे_आजीवन_ब्रह्मचर्य का पालन करना हो, वह जनेऊ धारण कर सकती है। ब्रह्मचारी तीन और विवाहित छह धागों की जनेऊ पहनता है। यज्ञोपवीत के छह धागों में से तीन धागे स्वयं के और तीन धागे पत्नी के बतलाए गए हैं।

#जनेऊ_का_आध्यात्मिक_महत्व -- 

#जनेऊ_में_तीन-सूत्र –  त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक – देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण के प्रतीक – सत्व, रज और तम के प्रतीक होते है। साथ ही ये तीन सूत्र गायत्री मंत्र के तीन चरणों के प्रतीक है तो तीन आश्रमों के प्रतीक भी। जनेऊ के एक-एक तार में तीन-तीन तार होते हैं। अत: कुल तारों की संख्‍या नौ होती है। इनमे एक मुख, दो नासिका, दो आंख, दो कान, मल और मूत्र के दो द्वारा मिलाकर कुल नौ होते हैं। इनका मतलब है – हम मुख से अच्छा बोले और खाएं, आंखों से अच्छा देंखे और कानों से अच्छा सुने। जनेऊ में पांच गांठ लगाई जाती है जो ब्रह्म, धर्म, अर्ध, काम और मोक्ष का प्रतीक है। ये पांच यज्ञों, पांच ज्ञानेद्रियों और पंच कर्मों के भी प्रतीक है।

#जनेऊ_की_लंबाई : जनेऊ की लंबाई 96 अंगुल होती है क्यूंकि जनेऊ धारण करने वाले को 64 कलाओं और 32 विद्याओं को सीखने का प्रयास करना चाहिए। 32 विद्याएं चार वेद, चार उपवेद, छह अंग, छह दर्शन, तीन सूत्रग्रंथ, नौ अरण्यक मिलाकर होती है। 64 कलाओं में वास्तु निर्माण, व्यंजन कला, चित्रकारी, साहित्य कला, दस्तकारी, भाषा, यंत्र निर्माण, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, दस्तकारी, आभूषण निर्माण, कृषि ज्ञान आदि आती हैं।

#जनेऊ_के_लाभ -- 

#प्रत्यक्ष_लाभ जो आज के लोग समझते है - 

""जनेऊ बाएं कंधे से दाये कमर पर पहनना चाहिये""।।

#जनेऊ_में_नियम_है_कि - 
मल-मूत्र विसर्जन के दौरान जनेऊ को दाहिने कान पर चढ़ा लेना चाहिए और हाथ स्वच्छ करके ही उतारना चाहिए। इसका मूल भाव यह है कि जनेऊ कमर से ऊंचा हो जाए और अपवित्र न हो। यह बेहद जरूरी होता है।

मतलब साफ है कि जनेऊ पहनने वाला व्यक्ति ये ध्यान रखता है कि मलमूत्र करने के बाद खुद को साफ करना है इससे उसको इंफेक्शन का खतरा कम से कम हो जाता है 

#वो_लाभ_जो_अप्रत्यक्ष_है जिसे कम लोग जानते है -

शरीर में कुल 365 एनर्जी पॉइंट होते हैं। अलग-अलग बीमारी में अलग-अलग पॉइंट असर करते हैं। कुछ पॉइंट कॉमन भी होते हैं। एक्युप्रेशर में हर पॉइंट को दो-तीन मिनट दबाना होता है। और जनेऊ से हम यही काम करते है उस point को हम एक्युप्रेश करते है ।।
 कैसे आइये समझते है 

#कान_के_नीचे_वाले_हिस्से (इयर लोब) की रोजाना पांच मिनट मसाज करने से याददाश्त बेहतर होती है। यह टिप पढ़नेवाले बच्चों के लिए बहुत उपयोगी है।अगर भूख कम करनी है तो खाने से आधा घंटा पहले कान के बाहर छोटेवाले हिस्से (ट्राइगस) को दो मिनट उंगली से दबाएं। भूख कम लगेगी। यहीं पर प्यास का भी पॉइंट होता है। निर्जला व्रत में लोग इसे दबाएं तो प्यास कम लगेगी।

एक्युप्रेशर की शब्दवली में इसे  point जीवी 20 या डीयू 20 - 
इसका लाभ आप देखे  -
#जीबी 20 - 
कहां : कान के पीछे के झुकाव में। 
उपयोग: डिप्रेशन, सिरदर्द, चक्कर और सेंस ऑर्गन यानी नाक, कान और आंख से जुड़ी बीमारियों में राहत। दिमागी असंतुलन, लकवा, और यूटरस की बीमारियों में असरदार।(दिए गए पिक में समझे)

इसके अलावा इसके कुछ अन्य लाभ जो क्लीनिकली प्रोव है - 

1. #बार-बार बुरे स्वप्न आने की स्थिति में जनेऊ धारण करने से ऐसे स्वप्न नहीं आते।
2. #जनेऊ_के हृदय के पास से गुजरने से यह हृदय रोग की संभावना को कम करता है, क्योंकि इससे रक्त संचार सुचारू रूप से संचालित होने लगता है।
3. #जनेऊ_पहनने वाला व्यक्ति सफाई नियमों में बंधा होता है। यह सफाई उसे दांत, मुंह, पेट, कृमि, जीवाणुओं के रोगों से बचाती है।
4. #जनेऊ_को_दायें कान पर धारण करने से कान की वह नस दबती है, जिससे मस्तिष्क की कोई सोई हुई तंद्रा कार्य करती है।
5. #दाएं_कान_की नस अंडकोष और गुप्तेन्द्रियों से जुड़ी होती है। मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ लपेटने से शुक्राणुओं की रक्षा होती है।
6. #कान_में_जनेऊ लपेटने से मनुष्य में सूर्य नाड़ी का जाग्रण होता है।
7. #कान_पर_जनेऊ लपेटने से पेट संबंधी रोग एवं रक्तचाप की समस्या से भी बचाव होता है।
  हमारी संस्कृति हमारी विरासत
🙏🙏🙏🙏🕉️🙏🙏🙏🙏
 

(12).  वेदारम्भ :- यह संस्कारज्ञानार्जन से सम्बन्धित है।  इस संस्कार का अभिप्राय है कि बालक वेदाध्ययन से  ज्ञान को समाविष्ट करना शुरू करे। शास्त्रों में ज्ञान से बढ़कर दूसरा कोई प्रकाश नहीं समझा गया है।यज्ञोपवीत के बाद बालकों को वेदों का अध्ययन एवं विशिष्ट ज्ञान से परिचित होने के लिये गुरुकुल में भेजा जाता था। असंयमित जीवन जीने वाले वेदाध्ययन के अधिकारी नहीं माने जाते थे। चारों वेद ज्ञान के अक्षुण्ण भंडार हैं। वेदारम्भ से पहले आचार्य अपने शिष्यों को ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने एवं संयमित जीवन जीने की प्रतिज्ञा कराते थे तथा उसकी परीक्षा लेने के बाद ही वेदाध्ययन कराते थे।

जीवन को सकारात्मक बनाने के लिए शिक्षा जरूरी है। शिक्षा का शुरू होना ही विद्यारंभ संस्कार है। गुरु के आश्रम में भेजने के पहले अभिभावक अपने पुत्र को अनुशासन के साथ आश्रम में रहने की सीख देते हुए भेजते थे। ये संस्कार भी उपनयन संस्कार जैसा ही है, इस संस्कार के बाद बच्चों को वेदों की शिक्षा मिलना आरम्भ किया जाता है ।

(13).  केशान्त-मुण्डन :- वेदाध्ययन पूर्ण कर लेने पर आचार्य के समक्ष यह संस्कार सम्पन्न किया जाता था। वस्तुत: यह संस्कार गुरुकुल से विदाई लेने तथा गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने का उपक्रम है। वेद-पुराणों एवं विभिन्न विषयों में पारंगत होने के बाद ब्रह्मचारी के समावर्तन संस्कार के पूर्व बालों की सफाई की जाती थी तथा उसे स्नान कराकर स्नातक की उपाधि दी जाती थी। केशान्त संस्कार शुभ मुहूर्त में किया जाता था। इस संस्कार के बाद ही ब्रह्मचारी युवक को गृहस्थ जीवन के योग्य शारीरिक और व्यावहारिक योग्यता की दीक्षा दी जाती थी।[आगोदानकर्मणः-ब्रह्मचर्यम्‌-भा.यू.सू.] उसके बाद इस केशान्त संस्कार में भी मुंण्डन करना होता है। इसलिए कहा भी है कि शास्त्रोक्त विधि से भली-भाँति व्रत का आचरण करने वाला ब्रह्मचारी इस केशान्त-संस्कार में सिर के केशों को तथा श्मश्रु के बालों को कटवाता है।

केशान्तकर्मणा तत्र यथोक्त-चरितव्रतः [व्यासस्मृति 1|41]  

इस संस्कार में दाढ़ी बनाने के पश्चात उन बालों को या तो गाय के गोबर में मिला दिया जाता था या गौशाला में गढ्ठा खोदकर दबा दिया जाता था अथवा किसी नदी में प्रवाहित कर दिया जाता था।इस प्रकार की क्रिया इसलिए की जाती थी ताकि कोई तांत्रिक उन बालों पर अपनी तान्त्रिक क्रिया के द्वारा नुकसान न पहुंचा सके।इस संस्कार के बाद गुरू को गाय दान दिया जाता था। यह संस्कार शुभ मुहुर्त देखकर आयोजित किया जाता था।

(14). समावर्तन :- गुरुकुल से विदाई लेने से पूर्व शिष्य का समावर्तन संस्कार होता था। इस संस्कार से पूर्व ब्रह्मचारी का केशान्त संस्कार होता था और फिर उसे स्नान कराया जाता था। यह स्नान समावर्तन संस्कार के तहत होता था। इसमें सुगन्धित पदार्थो एवं औषधादि युक्त जल से भरे हुए वेदी के उत्तर भाग में आठ घड़ों के जल से स्नान करने का विधान है। यह स्नान विशेष मन्त्रोच्चारण के साथ होता था। इसके बाद ब्रह्मचारी मेखला व दण्ड को छोड़ देता था जिसे यज्ञोपवीत के समय धारण कराया जाता था। इस उपाधि से वह सगर्व गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने का अधिकारी समझा जाता था। सुन्दर वस्त्र व आभूषण धारण करता था तथा गुरुजनों से आशीर्वाद ग्रहण कर अपने घर के लिये विदा होता था।

(15).  विवाह :- स्त्री और पुरुष दोनों के लिये यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार है। यज्ञोपवीत से समावर्तन संस्कार तक ब्रह्मचर्य व्रत के पालन का शास्त्रों में विधान है। वेदाध्ययन के बाद जब युवक में सामाजिक परम्परा निर्वाह करने की क्षमता व परिपक्वता आ जाती थी तो उसे गृर्हस्थ्य धर्म में प्रवेश कराया जाता था। लगभग पच्चीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य का व्रत का पालन करने के बाद युवक परिणय सूत्र में बंधता था।

शास्त्रों में आठ प्रकार के विवाहों का उल्लेख है-(1).  ब्राह्म, (2). दैव,  (3). आर्ष,  (4). प्राजापत्य,  (5). आसुर,  (6). गान्धर्व,  (7). राक्षस,  एवं  (8). पैचाश।

वैदिक काल में ये सभी प्रथाएं प्रचलित थीं। विवाह शब्द का तात्पर्य  मात्र स्त्री-पुरुष के समागम सम्बन्ध तक ही सीमित नहीं है अपितु सन्तानोत्पादन के साथ-साथ सन्तान को सक्षम आत्मनिर्भर होने तक के दायित्व का निर्वाह और सन्तति परम्परा को योग्य लोक शिक्षण देना भी इसी संस्कार का अंग है। शास्त्रों में अविवाहित व्यक्ति को अयज्ञीय कहा गया है और उसे सभी प्रकार के अधिकारों के अयोग्य माना गया है-
अयज्ञियो वा एष योऽपत्नीकः
मनुष्य जन्म ग्रहण करते ही तीन ऋणों से युक्त हो जाता है, ऋषि ऋण, देव ऋण, पितृऋण और तीनों ऋणों से क्रमशः ब्रह्मचर्य, यज्ञ, सन्तानोत्पादन करके मुक्त हो पाता है। 
जायमानो ह वै ब्राहणस्त्रिार्ऋणवान्‌ जायते-ब्रह्मचर्येण ऋषिभ्यो, यज्ञेन देवेभ्यः प्रजया पितृभ्यः। 
गृहस्थाश्रम सभी आश्रमों का आश्रम है। जैसे वायु प्राणिमात्रा के जीवन का आश्रय है, उसी प्रकार गार्हस्थ्य सभी आश्रमों का आश्रम है। 

यथा वायुं समाश्रित्य वर्त्तन्ते सर्वजन्तवः तथा गृहस्थमाश्रित्य वर्तन्ते सर्व आश्रमाः।
यस्मात्‌ त्रायोऽप्याश्रमिणो ज्ञानेनान्नेन चान्वहम्‌ गृहस्थेनैव धार्यन्ते तस्मा ज्येष्ठाश्रमो गृही।

विवाह अनुलोम रीति से ही करना चाहिए-प्रातिलोम्य विवाह सुखद नहीं होता अपितु परिणाम में कष्टकारी होता है। 
त्रायाण्यमानुलोम्यं स्यात्‌ प्रातिलोम्यं न विद्यते प्रातिलौम्येन यो याति न तस्मात्‌ पापकृत्तरः।
अपत्नीको नरो भूप कर्मयोग्यो न जायते। ब्राह्मणः क्षत्रिायो वापि वैश्यः शूद्रोऽपि वा नरः।

विवाह के प्रकार :- स्मृतियों ने इस प्रकार के विवाहों को आठ भागों में विभक्त कियाᅠहै।
(1).  ब्राह्म, (2). दैव,  (3). आर्ष,  (4). प्राजापत्य,  (5). आसुर,  (6). गान्धर्व,  (7). राक्षस,  व  (8). पैचाश।

इनमें प्रथम चार प्रशस्त और चार अप्रशस्त की श्रेणी में रखे गये हैं। प्रथम चार में भी ब्राह्म विवाह सर्वोत्तम और समाज में प्रशंसनीय था शेष तारतम्य भाव से ग्राह्य थे। किन्तु दो सर्वथा अग्राह्य थे।
(1). पैशाच-सोती या रोती कन्या का बलात्‌ अपहरण।
(2).  राक्षस-अभिभावकों को मारपीट कर बलात्‌ छीनकर रोती बिलखती कन्या का अपहरण इस कोटि का निन्दनीय विवाह था।
(3). गान्धर्व-जब कन्या और वर कामवश होकर स्वेच्छापूर्वक परस्पर संयोग करते हैं तो ऐसा विवाह गान्धर्व विवाह होता है। 
(4). जिस विवाह में कन्या के पक्ष को यथेष्ट धन-सम्पत्ति देकर स्वच्छन्दतापूर्वक कन्या से विवाह किया जाता है ऐसा विवाह आसुर संज्ञक है।
(5). वर स्वयं प्र्रस्ताव करके कन्या के पिता से विवाह का निवेदन करता और सन्तानोत्पादन के लिए विवाह स्वीकार किया जाता। ऐसा विवाह प्राजापत्य कोटि का था।
(6). आर्ष विवाह में कन्या का पिता वर से यज्ञादि कर्म के लिए दो गो मिथुन प्राप्त करके धर्म कार्य सम्पन्न कर लेता था और उसके बदले में कन्यादान करता था।
(7). दैव
(8). ब्राह्म विवाह सबसे श्रेष्ठ प्रशंसनीय विधि मानी जाती है जिसमें कन्या का पिता योग्य वर को सब प्रकार सुसज्जित यथाशक्ति अलंकृत कन्या को गार्हस्थ्य जीवन की समस्त उपयोगी वस्तुओं के साथ समर्पित करता था।

आच्छाद्य चार्चयित्वा च श्रुतिशीलवते स्वयम्‌ आहूय दानं कन्याया ब्राह्मो धर्मः प्रकीर्तितः। 
सक्षेप में विवाह संस्था के उद्देश्य और उसके प्रकार का विवरण दिया गया है। विवाह के विविध-विधान के लिए देश-काल-प्रान्तभेद से पद्धतियां उपलब्ध हैं तदनुसार वैवाहिक संस्कार सम्पन्न किया जाना चाहिए।

(16).  अन्त्येष्टि :-  अन्त्येष्टि को अग्नि परिग्रह संस्कार भी कहा जाता है। आत्मा में अग्नि का आधान करना ही अग्नि परिग्रह है। धर्म शास्त्रों की मान्यता है कि मृत शरीर की विधिवत् क्रिया करने से जीव की अतृप्त वासनायें शान्त हो जाती हैं। शास्त्रों में बहुत ही सहज ढंग से इहलोक और परलोक की परिकल्पना की गयी है। जब तक जीव शरीर धारण कर इहलोक में निवास करता है तो वह विभिन्न कर्मो से बंधा रहता है। प्राण छूटने पर वह इस लोक को छोड़ देता है। उसके बाद की परिकल्पना में विभिन्न लोकों के अलावा मोक्ष या निर्वाण है।अन्त्येष्टि ऐहिक जीवन का अन्तिम अध्याय है। आत्मा की अमरता एवं लोक परलोक का विश्वासी जीवन इस लोक की अपेक्षा पारलौकिक कल्याण की सतत कामना करता है। मरणोत्तर संस्कार से ही पारलौकिक विजय प्राप्त होती है -
जात संस्कारेणेमं लोकमभिजयति मृतसंस्कारेणामुं लोकम्‌॥ 

विधि-विधान, आतुरकालिक दान, वैतरणीदान, मृत्युकाल में भू शयन व्यवस्था मृत्युकालिक स्नान, मरणोत्तर स्नान, पिण्डदान, (मलिन षोडशी) के 6 पिण्ड दशगात्रायावत्‌ तिलाञ्जलि, घटस्थापन दीपदान, दशाह के दिन मलिन षोडशी के शेष पिण्डदान एकादशाह के षोडश श्राद्ध, विष्णुपूजन शैय़्यादान आदि। सपिण्डीकरण, शय्यादान एवं लोक व्यवस्था के अनुसार उत्तर कर्म आयोजित कराने चाहिए। इन सभी कर्मों के लिए प्रान्त देशकाल के अनुसार पद्धतियां उपलब्ध हैं तदनुसार उन कर्मों का आयोजन किया जाना चाहिए।
श्राद्ध-पितृ तर्पण 
(1). पितृ पक्ष का (-महालय पक्ष) का महत्त्व :: वृश्चिक राशिमें प्रवेश करनेसे पूर्व, जब सूर्य कन्या एवं तुला राशि में होता है, वह काल महालय कहलाता है।

इस कालावधि में पितर यम लोक से आकर अपने परिवार के सदस्यों के घर में वास करते हैं। इसीलिए शक संवत अनुसार भाद्र पद कृष्ण प्रतिपदासे भाद्रपद अमावास्या तक के एवं विक्रम संवत अनुसार आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से आश्विन अमावस्या तक के पंद्रह दिनकी कालावधि में पितृ तर्पण एवं तिथि के दिन पितरोंका श्राद्ध अवश्य करना चाहिए ।

ऐसा करनेसे पितृव्रत यथा सांग पूरा होता है। इसीलिए यह पक्ष पितरोंको प्रिय है। इस पक्षमें पितरोंका श्राद्ध करनेसे वे वर्ष भर तृप्त रहते हैं। जो लोग पितृ पक्ष में कुछ कारण वश महालय श्राद्ध नहीं कर पाते, उन्हें पितृ पक्ष के उपरांत सूर्य के वृश्चिक राशिमें प्रवेश करने से पहले तो महालय श्राद्ध करना ही चाहिए।

श्राद्धं कन्यागते भानौ यो न कुर्याद् गृहाश्रमी। 
धनं पुत्राः कुततस्य पितृकोपाग्निपीडनात्॥ 
यावच्च कन्यातुलयोः क्रमादास्ते दिवाकरः। 
शून्यं प्रेतपुरं तावद् यावद् वृश्चिकदर्शनम्॥ [महाभारत]

कन्या राशिमें सूर्यके रहते, जो गृहस्थाश्रमी श्राद्ध नहीं करता, उसे पितरों की कोपाग्निके कारण धन, पुत्र इत्यादिकी प्राप्ति कैसे होगी ? उसी प्रकार सूर्य जब तक कन्या एवं तुला राशियोंसे वृश्चिक राशिमें प्रवेश नहीं करता, तब तक पितृलोक रिक्त रहता है।

पितृलोकके रिक्त रहनेका अर्थ है, उस कालमें कुल के सर्व पितर आशीर्वाद देनेके लिए अपने वंशजों के समीप आते हैं । वंशजों द्वारा श्राद्ध न किए जानेपर शाप देकर चले जाते हैं। अतः इस कालमें श्राद्ध करना महत्त्वपूर्ण है। 

(2). पितृ पक्ष अर्थात महालय में श्राद्ध के लिए आने वाले पितर गण :- (2-1). पितृ त्रय :- पिता, दादा, पर दादा, (2-2). मातृ त्रय :- माता, दादी, पर  दादी,  (2-3). सापत्न माता अर्थात सौतेली मां, (2-4). माता मह त्रय :- मां के पिता, नाना एवं परनाना,  (2-5). माता मही त्रय :- मां की माताजी, नानी एवं पर नानी, (2-6). भार्या, पुत्र, पुत्रियां, चाचा, मामा, भाई, बुआ, मौसियां बहनें, ससुर, अन्य आप्तजन, (2-7). श्राद्ध कर्ता किसी के शिष्य हों, तो गुरु, (2-8). श्राद्धकर्ता किसीके गुरु हों, तो शिष्य। 

यह स्पष्ट है कि मनुष्य मृत्यु के पश्चात पुनर्जन्म लेकर पुनः-पुनः उसी परिवार में तब तक आता है जब तक कि उसके उस परिवार सम्बन्धी संस्कार उपस्थित हैं। मृत्यु के उपरांत भी जीव के सुख एवं उन्नति से संबंधित इतना गहन अभ्यास केवल हिंंदू धर्म ने ही किया है। 

(3). भरणी श्राद्ध :- गया जाकर श्राद्ध करनेपर जो फल मिलता है, वही फल पितृ पक्ष के भरणी नक्षत्र पर करने से मिलता है। शास्त्रानुसार भरणी श्राद्ध वर्ष श्राद्ध के पश्चात् करना चाहिए । वर्ष श्राद्ध से पूर्व सपिंडीकरण (-सपिंडी) श्राद्ध किया जाता है । तत्पश्चात् भरणी श्राद्ध करने से मृतात्मा को प्रेत योनि से छुडाने में सहायता मिलती है। यह श्राद्ध प्रत्येक पितृ पक्ष में करना चाहिए।पूर्वजों का बहुत-प्रेत-पिशाच योनि में होना अहितकर है। 

कालानुरूप प्रचलित पद्धतिनुसार व्यक्ति की मृत्यु होनेके पश्चात् 12 वें दिन ही सपिंडीकरण श्राद्ध किया जाता है। इसलिए, कुछ शास्त्रज्ञों के मतानुसार व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात् उस वर्ष पडने वाले पितृ पक्ष में ही भरणी श्राद्ध कर सकते हैं ।

(4). सर्व पित्री अमावस्या :- यह पितृ पक्ष की अमावस्या का  नाम है। इस तिथि पर कुल के सर्व पितरों को उद्देशित कर श्राद्ध करते हैं। वर्ष भर में सदैव एवं पितृ पक्ष की अन्य तिथियों पर श्राद्ध करना संभव न हो, तब भी इस तिथि पर सबके लिए श्राद्ध करना अत्यंत आवश्यक है; क्योंकि पितृ पक्ष की यह अंतिम तिथि है।

शास्त्र में बताया गया है कि, श्राद्ध के लिए अमावस्या की तिथि अधिक उचित है, जबकि पितृ पक्ष की अमावस्या सर्वाधिक उचित तिथि है।

इस दिन प्रायः सभी घरों में कम से कम एक ब्राह्मण को तो भोजन का निमंत्रण दिया ही जाता है। उस दिन मछुआरे, ठाकुर, बुनकर, कुनबी इत्यादि जातियों में पितरोंके नामसे भात का अथवा आटे का पिंड दान दिया जाता है और अपनी ही जाति के कुछ लोगों को भोजन कराया जाता है । इन में इस दिन ब्राह्मणों को सीधा (-अन्न सामग्री) देने की भी परंपरा प्रचलित है।

(5). पितृ पक्ष में भगवान् दत्तात्रेय का नाम जपने का महत्त्व :- पितृ पक्ष में श्री गुरु देव दत्त का नाम जप अधिकाधिक करने से पितरों को गति प्राप्त होने में सहायता मिलती है।

(6). परिवार में किसी की मृत्यु होने पर उस वर्ष महालय श्राद्ध न करना :- परिवारमें जिस व्यक्तिके पिता अथवा माता  की मृत्यु हो गई हो, उस श्राद्धकर्ता को उनके लिए उनके देहांत के दिन से आगे एक वर्ष तक महालय श्राद्ध करने की आवश्यकता नहीं होती; क्योंकि, उनके लिए वर्ष भरमें श्राद्धकर्म किया ही जाता है।

श्राद्ध कर्ता पुत्र के अतिरिक्त अन्यों को, उदा. श्राद्ध कर्ता के चचेरे भाई एवं जिन्हें सूतक लगता है, ऐसे लोगोंको अपने पिता इत्यादि के लिए प्रति वर्ष की भांति महालय श्राद्ध करना चाहिए। किंतु, सूतक के दिनों में महालय पक्ष पडने पर श्राद्ध न करें। सूतक समाप्त होनेपर आने वाली अमावस्या पर श्राद्ध अवश्य करें।

(7). महालय श्राद्ध के लिए आमंत्रित ब्राह्मण :- महालय श्राद्ध के समय प्रत्येक पितर के लिए एक ब्राह्मण होना चाहिए। ब्राह्मण को पितृ स्थान पर बिठाकर देवस्थान पर शालिग्राम अथवा बाल कृष्ण की मूर्ति-प्रतिमा-तस्वीर रखें। देवस्थान पर बाल कृष्ण एवं पितृ स्थान पर दर्भ रखें अथवा दोनों ही स्थानों पर दर्भ रखें । इसे चट अथवा दर्भबटु (-कुश से बनी कूंची) कहते हैं । चट रखकर किए गए श्राद्ध को चट श्राद्ध कहते हैं । इस श्राद्धमें दक्षिणा भी देते हैं।

श्राद्ध विधि-पितृ ऋण से मुक्त कराने की विधि :-
(1).अप  सव्य करना :- देश काल का उच्चारण कर अप सव्य करें, अर्थात् जनेऊ बाएं कंधे से दाएं कंधे पर लें।
(2). श्राद्ध संकल्प करना :- श्राद्ध के लिए उचित पितरों की षष्ठी विभक्ति का विचार कर (-उनका उल्लेख करते समय, षष्ठी-विभक्ति का प्रयोग करना, प्रत्यय लगाना, उदा. रमेशस्य), श्राद्ध कर्ता निम्न संकल्प करे :–
अमुक श्राद्धं सदैवं सपिण्डं पार्वणविधीना एकोद्दिष्टेन वा अन्नेन वा आमेन वा हिरण्येन सद्यः करिष्ये।
(3). यवोदक (-जौ) एवं तिलोदक बनाएं।
(4). प्रायश्चित के लिए पुरुष सूक्त, वैश्व देव सूक्त इत्यादि सूक्त बोलें।
(5). ब्राह्मणों की परिक्रमा करें एवं उन्हें नमस्कार करें। तदुपरांत श्राद्धकर्ता ब्राह्मणोंसे प्रार्थना करें कि -‘हम सब यह कर्म सावधानी से, शांत चित्त, दक्ष एवं ब्रह्मचारी रहकर करेंगे।’
(6). 21 क्षण देना (-आमंत्रण देना) :- श्राद्धकर्मके समय देवता एवं पितरोंके लिए एक-एक दर्भ (-कुश) अर्पित कर आमंत्रित करें।
(7). देव स्थान पर पूर्व की ओर एवं पितृ स्थान पर उत्तर की ओर मुख कर ब्राह्मणों को बैठाएं। ब्राह्मणों को आसन के लिए दर्भ दें, देवताओं को सीधे दर्भ अर्पित करें एवं पितरों को अग्र से मोड़ कर दें।

(8). आवाहन, अर्घ्य, संकल्प, पिंडदान, पिंडाभ्यंजन (-पिंडों को दर्भ से घी लगाना), अन्न दान, अक्षयोदक, आसन तथा पाद्यके उपचारों में पितरों के नाम-गोत्र का उच्चारण करें।
गोत्र ज्ञात न हो तो कश्यप गोत्र का उच्चारण करें; क्योंकि श्रुति बताती है कि ‘समस्त प्रजा कश्यप से ही उत्पन्न हुई हैं’। पितरों के नाम के अंत में ‘शर्मन्’ उच्चारण करें। स्त्रियों के नाम के अंत में ‘दां’ उपपद लगाएं।
(9). ‘उदीरतामवर’ मंत्र से सर्वत्र तिल बिखेरें तथा गायत्री मंत्र से अन्न प्रोक्षण करें (-अन्न पर पानी छिडकें)।
(10). देवता पूजन में भूमि पर नित्य दाहिना घुटना टिकाएं। पितरों की पूजा में भूमि पर बायां घुटना टिकाएं।
(11). देव कर्म प्रदक्षिण एवं पितृ कर्म अप्रदक्षिण करें। देवताओं को उपचार समर्पित करते समय ‘स्वाहा नमः’ एवं पितरों को उपचार समर्पित करते समय ‘स्वधा नमः’ कहें।
(12). देव-ब्राह्मणके सामने यवोदकसे दक्षिणावर्त अर्थात् घडीकी दिशामें चौकोर मंडल व पितर-ब्राह्मणके सामने तिलोदकसे घडीकी विपरीत दिशामें गोलाकार मंडल बनाकर, उनपर भोजनपात्र रखें। उसी प्रकार कुलदेवता एवं गोग्रास के ( -गायके लिए नैवेद्य) लिए पूजा घर के सामने पानी का घडी की दिशा में मंडल बनाकर उन पर भोजन पात्र रखें। पितृ स्थान पर बैठे ब्राह्मणों के भोजन पात्र के चारों ओर भस्म का उलटा (-घडी की विपरीत दिशा में) वर्तुल बनाएं। देवस्थान पर बैठे ब्राह्मणों के भोजन पात्रों के चारों ओर नित्य पद्धति से (-घडी की दिशामें) भस्मकी रंगोली बनाएं।
(13). पितर एवं देवताओंको विधिवत् संबोधित कर अन्न-निवेदन करें।
(14). पितरों को संबोधित कर भूमि पर अग्रयुक्त एक बित्ता लंबे 100 दर्भ फैला कर उस पर पिंड दान, तदनंतर पिंडों की पूजा करें। तत्पश्चात् देव ब्राह्मण के लिए परोसी थाली के सामने दर्भ पर थोडे चावल (-विकिर), पितर ब्राह्मण के लिए परोसी थाली के सामने दर्भ पर थोडे चावल (-प्रकिर) रखकर उन पर क्रमानुसार यवोदक, तिलोदक दें। इसके पास में भिन्न दर्भप र एक पिंड रख कर उस पर तिलोदक दें। उसे ‘उच्छिष्ट पिंड’ कहते हैं। इन सर्व पिंडों को जलाशयमें विसर्जित करें अथवा गाय को दें।
(15). महालय श्राद्ध के समय सबको संबोधित कर पिंडदान होने के पश्चात् चार दिशाओं को धर्म पिंड दें। सृष्टि की निर्मिति करने वाले ब्रह्म देव से लेकर जिन्होंने हमारे माता-पिताके कुलमें जन्म लिया है; साथ ही गुरु, आप्त, हमारे इस जन्म में सेवक, दास, दासी, मित्र, घर के पालतू प्राणी, लगाए गए वृक्ष, हम पर उप कृत (-हमारे प्रति कृतज्ञ) व्यक्ति, जिनका पिंड दान करने के लिए कोई न हो तथा अन्य ज्ञात एवं अज्ञात व्यक्ति को पिंड दान करें।
(16). पिंड दान के उपरांत ब्राह्मणों को दक्षिणा देकर उनसे आशीर्वाद के अक्षत लें। स्वधा वाचन कर सर्व कर्म ईश्वरार्पण करें ।

यदि घर में मंगलकार्य हुआ हो, तो एक वर्ष तक श्राद्ध में पिंड दान निषिद्ध है। कर्ता (-पुत्र का विवाह, यज्ञोपवीत, चौल संस्कार करने वाला) विवाहोपरांत एक वर्ष, व्रत बंध के उपरांत छः मास, चौल संस्कार के उपरांत तीन मास क पिंड दान, मृत्तिका स्नान एवं तिल तर्पण न करे।इसके लिए ये अपवाद है-विवाह होनेके पश्चात् भी, तीर्थ स्थलमें, माता के पितरों के सांवत्सरिक श्राद्धमें, प्रेत श्राद्ध में, पिता के और्ध्वदेहिक कर्मों में एवं महालय श्राद्धमें सर्वदा पिंडदान किया जा सकता है।
भातमें अर्थात पके हुए चावलमें अग्नौ करण अर्थात अग्निमें आहुति देने हेतु लिए गए भात का शेष भाग, तिलोदक, काले तिल, दही, मधु एवं घी, ये मुख्य घटक मिलाएं।शास्त्र में सर्व प्रकार के श्राद्धीय अन्न पदार्थों के अल्प भाग से पिंड बनाने का विधान है। इसलिए पिंड बनाने के मिश्रण में मुख्य घटकों के साथ ही बडे एवं खीर इत्यादि श्राद्धीय भोजनके पदार्थ भी डालने चाहिए।

पिंड बनाने के इस मिश्रण को मसलकर साधारणतः चार बडे पिंड एवं अन्य आवश्यक छोटे पक्के पिंड बनायें । पितृ त्रय के लिए थोडे बड़े आकार के पिंड बनाने की पद्धति निम्न है-
(1).  श्राद्ध में भात अर्थात पके हुए चावल के पिंड बनाना :- चावल सर्व समा वेशक है। चावल पकाने से उसमें रजो गुण बढता है। इस प्रक्रिया में चावल में पृथ्वी तत्त्व का प्रमाण घटकर आप तत्त्वका प्रमाण बढता है। आप तत्त्वके कारण भातसे प्रक्षेपित सूक्ष्म-वायुमें आर्द्रता अधिक होती है। जब श्राद्ध में भात का गोला बनाकर उस पर संस्कार किए जाते हैं, तब उसका रूपांतर पिंड में होता है। संक्षेप में, भात  के सर्व ओर उत्पन्न होनेवाले आर्द्रता दर्शक प्रभावलय में पितरों की लिंग देहों की रज-तमात्मक तरंगों का संस्करण होता है।इस रजो गुणी पिंड की वातावरण कक्षा में पितरों की लिंग देहोंके लिए प्रवेश करना सरल होता है। अतः मंत्रोच्चारण से संचारित वायुमंडल द्वारा लिंग देह को सूक्ष्म बल प्राप्त होता है तथा उनके लिए आगे का मार्ग प्रशस्त एवं सुगम होता है।
(2). पिंड के लिए सर्व प्रकारके अन्न पदार्थों का अल्प भाग लेना :- भातसे बनाया पिंड लिंगदेहका प्रतिनिधित्व करता है। जब लिंग देह प्रत्यक्षतः व्यक्ति की स्थूल देह से विलग होती है, तब वह मन के विविध संस्कारों का आवरण लेकर निकलती है। आसक्ति दर्शक संस्कारों में अन्न संबंधी संस्कार सर्वाधिक होते हैं। प्रत्येक जीव की अन्न विषयक रुचि-अरुचि भिन्न होती है। इन सभी रुचियों के सूचक जैसे मीठा, चटपटा, नमकीन इत्यादि स्वादिष्ट पदार्थों से युक्त अन्न का अल्प अंश लेकर उससे पिंड बनाकर श्राद्ध स्थल पर रखा जाता है। श्राद्ध में इन विशिष्ट अन्न पदार्थों की सूक्ष्म-वायु कार्यरत होती है एवं श्राद्ध स्थल पर आई लिंग देह को इस सूक्ष्म-वायु के माध्यम से विशिष्ट अन्न के हविर्भाग अर्थात पितरों को अर्पित अन्न के अंश की प्राप्ति होती है। इससे लिंग देह संतुष्ट होती हैं।विशिष्ट पदार्थोें का अंश प्राप्त होने से विशिष्ट पदार्थोें की लिंग देह की आसक्ति अंशतः क्षीण होती है। जिससे लिंग देह के भूलोक में अटकने की आशंका घटती है।
(3). मधु युक्त पिंड देना :-  मधु में पृथ्वी एवं आप तत्त्वोंसे संबंधित पितर तरंगों को अपनी मिठास से प्रसन्न करने एवं उन्हें पिंड में ही बद्ध करने की क्षमता होती है। अतः मधु युक्त पिंड देने से वह दीर्घ काल तक पितर-तरंगों से संचारित रहता है। दर्भ का शुद्धिकरण किया जाता है। प्रत्येक पिंड रखते हुए कर्ता कहता है अमुक गोत्रके वसु स्वरूप अथया रुद्र स्वरूप अथवा आदित्य स्वरूप के अपने अमुक नाम के परिजन के लिए मैं पिंड रखता हूं। उसके उपरांत पिंड पूजन किया जाता है।
(3-1).  पिंड स्वरूपी पितरों के लिए काजल, ऊन का धागा, पुष्प, तुलसी, भृंगराज, धूप, दीप द्वारा उपचार किए जाते हैं।
(3-2). पिंडरूपी पितरों को नैवेद्य अर्पित किया जाता है। 
(3-3).  पीनेके लिए तथा हाथ-मुंह धोनेके लिए जल अर्पित किया जाता है । मुखशुद्धि हेतु पान अर्पित किया जाता है।
(3-4). उसके पश्चात पितर-ब्राह्मणों को तिलोदक एवं देव-ब्राह्मणों को यवोदक अर्थात जौ युक्त जल देकर पिंड पर जल छोडा जाता है। जिन पितरों की मृत्यु अग्निमें जलने से अथवा कोख में जन्म से पहले ही हो गई है उनके लिए बनाए गए विशेष पिंडोंपर तिलोदक चढाया जाता है।
(3-5). उसके पश्चात परिवारके अन्य सदस्य पिंडों को नमस्कार करते हैं।
(4).  श्राद्धकर्ता द्वारा दर्भपर पिंड रखने तथा उसका पूजन करना :- श्राद्धविधिमें मंत्रो का उच्चारण करते समय पुरोहित में शक्ति के वलय की जागृति होती है। पुरोहित के मुख से वातावरण में शक्ति की तरंगों का प्रक्षेपण होता है। श्राद्ध विधि भाव पूर्ण करने वाले पूजक के अनाहत चक्र के स्थान पर भाव के वलय जागृत होते हैं। ईश्वर से प्रक्षेपित शक्ति का प्रवाह पिंडदान हेतु रखे दर्भ में आकृष्ट होता है। दर्भ एवं उसपर रखे जाने वाले पिंड में शक्ति के वलय जागृत होते हैं।  इस वलय से वातावरणमें शक्ति के प्रवाहों का प्रक्षेपण होता है। शक्ति का प्रवाह पूजक की ओर प्रक्षेपित होता है।
(5).  पिंड पूजन की सूक्ष्म गति :- पुरोहित द्वारा श्राद्धसे संबंधित मंत्र पठन के कारण भुव लोक से एक काला-सा प्रवाह पिंड की ओर आकृष्ट होता है। लिंग देह के रूप में पितर आकृष्ट होते है। आकृष्ट हुए पितरों के कारण दर्भ पर रखे पिंड के सर्व ओर काला तमोगुणी वलय उत्पन्न होता है। श्राद्ध कर्ता पिंड पूजन कर प्रार्थना करता है कि उसके परिवार पर पितरों की कृपा दृष्टि बनी रहे। पितरों को अन्न एवं शक्ति प्राप्त हो प्रार्थना करने से श्राद्ध कर्ता की ओर चैतन्य तथा शक्तिके प्रवाह आकृष्ट होते है। श्राद्ध कर्ता के स्थानप र चैतन्य तथा शक्ति के वलय जागृत होते हैं। श्राद्ध कर्ता के भाव पूर्ण पिंड पूजन से पूर्वज दोष की तीव्रता घटती है। पिंड पूजन करने से अतृप्त पितर भुव लोक से पिंड की ओर सहजता से आकृष्ट होते हैं तथा उनकी इच्छाएं पूर्ण होकर उन्हें गति मिलती है। इस प्रकार से पितरों के कष्ट न्यून होते हैं। यह श्राद्ध विधि में पिंड पूजन का महत्त्व स्पष्ट होता है।
  
ब्राह्मण संस्कार :- ब्राह्मण के तीन जन्म  होते हैं। (1). माता के गर्भ से, (2). यज्ञोपवीत से व (3) यज्ञ की दीक्षा लेने  से।यज्ञोपवीतके समय गायत्री माता व और आचार्य पिता होते हैं। वेद की शिक्षा देने से आचार्य  पिता कहलाता है। यज्ञोपवीत के बिना, वह किसी भी वैदिक कार्य का अधिकारी नहीं होता। जब तक वेदारम्भ न हो, वह शूद्र के समान है।     

जिस ब्राह्मण के 48 संस्कार विधि पूर्वक हुए हों, वही ब्रह्म लोक व ब्रह्मत्व को प्राप्त करता है। इनके बिना  वह शूद्र के समान है। 
चालीस ब्राह्मण के संस्कार :: गर्वाधन, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, अन्न प्राशन, चूडाकर्म, उपनयन, चार प्रकार के वेदव्रत, वेदस्नान, विवाह, पञ्च महायज्ञ(जिनसे पितरों, देवताओं, मनुष्यों, भूतऔर ब्रह्म की तृप्ति होती है), सप्तपाकयज्ञ-संस्था-अष्टकाद्वय, पार्वण, श्रावणी, आग्रहायणी, चैत्री, शूलगव, आश्र्वयुजी, सप्तहविर्यज्ञ-संस्था-अग्न्याधान, अग्निहोत्र, दर्श-पौर्णमास, चातुर्मास्य, निरूढ-पशुबंध, सौत्रामणि, सप्त्सोम-संस्था-अग्निष्टोम, अत्यग्निष्टोम, उक्थ्य, षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र और आप्तोर्याम। 

इनके साथ ब्राह्मण में 8 आत्म गुण भी होने चाहियें : 
अनसूया : दूसरों के गुणों में दोष बुद्धि न रखना, गुणी  के गुणों को न छुपाना, अपने गुणों को प्रकट न करना, दुसरे के दोषों को देखकर प्रसन्न न होना। 
दया : अपने-पराये, मित्र-शत्रु में अपने समान व्यवहार करना और दूसरों का  दुःख दूर करने की इच्छा रखना। 
क्षमा : मन, वचन या शरीर से दुःख पहुँचाने वाले पर क्रोध न करना व वैर न करना। 
अनायास : जिन शुभ कर्मों को करने से शरीर को कष्ट होता हो, उस कर्म को हठात् न करना। 
मंगल : नित्य अच्छे कर्मों को करना और बुरे कर्मों को न करना। 
अकार्पन्य : मेहनत, कष्ट व न्यायोपार्जित धन से, उदारता पूर्वक थोडा-बहुत नित्य दान करना।  
शौच : अभक्ष्य वस्तु का भक्षण न करना, निन्दित पुरुषों का संग न करना और सदाचार में स्थित रहना। 
अस्पृहा : ईश्वर की कृपा से थोड़ी-बहुत संपत्ति से भी संतुष्ट रहना और दूसरे के धन की, किंचित मात्र भी इच्छा न रखना। 
जिसकी गर्भ-शुद्धि हो, सब संस्कार विधिवत् संपन्न हुए हों और वर्णाश्रम धर्म का पालन करता हो, तो उसे अवश्य मुक्ति प्राप्त होती है।

16 संस्कार
1. गर्भाधान संस्कार ( Garbhaadhan Sanskar) - यह
ऐसा संस्कार है जिससे हमें योग्य, गुणवान और आदर्श
संतान प्राप्त होती है। शास्त्रों में मनचाही संतान
प्राप्त के लिए गर्भधारण संस्कार किया जाता है।
इसी संस्कार से वंश वृद्धि होती है।

2. पुंसवन संस्कार (Punsavana Sanskar) - गर्भस्थ शिशु
के बौद्धिक और मानसिक विकास के लिए यह
संस्कार किया जाता है। पुंसवन संस्कार के प्रमुख
लाभ ये है कि इससे स्वस्थ, सुंदर गुणवान संतान की
प्राप्ति होती है।

3. सीमन्तोन्नयन संस्कार ( Simanta Sanskar) - यह
संस्कार गर्भ के चौथे, छठवें और आठवें महीने में किया
जाता है। इस समय गर्भ में पल रहा बच्चा सीखने के
काबिल हो जाता है। उसमें अच्छे गुण, स्वभाव और
कर्म का ज्ञान आए, इसके लिए मां उसी प्रकार
आचार-विचार, रहन-सहन और व्यवहार करती है।

4. जातकर्म संस्कार (Jaat-Karm Sansakar) - बालक
का जन्म होते ही इस संस्कार को करने से शिशु के कई
प्रकार के दोष दूर होते हैं। इसके अंतर्गत शिशु को शहद
और घी चटाया जाता है साथ ही वैदिक मंत्रों का
उच्चारण किया जाता है ताकि बच्चा स्वस्थ और
दीर्घायु हो।

5. नामकरण संस्कार (Naamkaran Sanskar)- शिशु के
जन्म के बाद 11वें दिन नामकरण संस्कार किया
जाता है। ब्राह्मण द्वारा ज्योतिष शास्त्र के
अनुसार बच्चे का नाम तय किया जाता है।

6. निष्क्रमण संस्कार (Nishkraman Sanskar) -
निष्क्रमण का अर्थ है बाहर निकालना। जन्म के चौथे
महीने में यह संस्कार किया जाता है। हमारा शरीर
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश जिन्हें पंचभूत
कहा जाता है, से बना है। इसलिए पिता इन देवताओं
से बच्चे के कल्याण की प्रार्थना करते हैं। साथ ही
कामना करते हैं कि शिशु दीर्घायु रहे और स्वस्थ रहे।

7. अन्नप्राशन संस्कार ( Annaprashana) - यह संस्कार
बच्चे के दांत निकलने के समय अर्थात 6-7 महीने की
उम्र में किया जाता है। इस संस्कार के बाद बच्चे को
अन्न खिलाने की शुरुआत हो जाती है।

*क्या है 16 संस्कार, हिंदू धर्म में इनका क्या है महत्व?*

🚩 *शास्त्रों की बात, जानें धर्म के साथ सनातन हिन्दू धर्म एक शाश्वत और प्राचीन धर्म है। इसका मूल पूर्णत: वैज्ञानिक होने के कारण सदियां बीत जाने के बाद भी इसका महत्व कम नहीं हुआ है।*

🚩 *प्रारम्भिक काल में हिन्दू समाज में गुरुकुल शिक्षा प्रणाली के अनुसार शिक्षा दी जाती थी, जो वैज्ञानिक होने के कारण विकासोन्मुख थी। सोलह संस्कारों को हिन्दू धर्म की जड़ कहें तो गलत नहीं होगा। इन्हीं सोलह संस्कारों में इस धर्म की संस्कृति और परम्पराएं निहित हैं जो निम्र हैं-*

🚩 *(1). गर्भाधान संस्कार, (2). पुंसवन संस्कार. (3). सीमन्तोन्नयन संस्कार, (4). जातकर्म संस्कार, (5). नामकरण संस्कार, (6). निष्क्रमण संस्कार, (7). अन्नप्राशन संस्कार, (8). चूड़ाकर्म संस्कार, (9). विद्यारम्भ संस्कार, (10). कर्णवेध संस्कार, (11). यज्ञोपवीत संस्कार, (12). वेदारम्भ संस्कार, (13). केशान्त संस्कार, (14). समावर्तन संस्कार, (15). विवाह संस्कार, (16). अंत्येष्टि संस्कार।*

🚩 01 *गर्भाधान संस्कार : गर्भाधान संस्कार के माध्यम से हिन्दू धर्म सन्देश देता है कि स्त्री-पुरुष संबंध पशुवत न होकर केवल वंशवृद्धि के लिए होना चाहिए। मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ होने, मन प्रसन्न होने पर गर्भधारण करने से संतति स्वस्थ और बुद्धिमान होती है।*

🚩 02 *पुंसवन संस्कार : गर्भ धारण के तीन माह बाद गर्भ में जीव के संरक्षण और विकास के लिए यह आवश्यक है कि स्त्री अपने भोजन और जीवन शैली को नियम अनुसार करे। इस संस्कार का उद्देश्य स्वस्थ और उत्तम संतान की प्राप्ति है। यह तभी संभव है जब गर्भधारण विशेष तिथि और ग्रहों के आधार पर किया जाए।*

🚩 03 *सीमन्तोनयन संस्कार : सीमन्तोनयन संस्कार गर्भधारण करने के बाद छठे या आठवें मास में किया जाता है। इस मास में गर्भपात होने की सबसे अधिक संभावनाएं होती हैं या इन्हीं महीनों में प्री-मेच्योर डिलीवरी होने की सर्वाधिक सम्भावना होती है। गर्भवती स्त्री के स्वभाव में परिवर्तन लाने, स्त्री के उठने-बैठने, चलने, सोने आदि की विधि आती है। मैडीकल साइंस भी इन महीनों में स्त्री को विशेष सावधानी रखने की सलाह देता है। भ्रूण के विकास और स्वस्थ बालक के लिए यह आवश्यक है। गर्भस्थ शिशु और माता की रक्षा करना इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य है। स्त्री का मन प्रसन्न करने के लिए यह संस्कार किया जाता है।*

🚩 04 *जातकर्म संस्कार : यह बालक के जन्म के बाद किया जाता है। इसमें बालक को शहद और घी चटाया जाता है। इससे बालक की बुद्धि का विकास तीव्र होता है। इसके बाद से माता बालक को स्तनपान कराना शुरू करती है। इस संस्कार की वैज्ञानिकता है कि बालक के लिए माता का दूध ही श्रेष्ठ भोजन है।*

🚩 05 *नामकरण संस्कार : इस संस्कार का बहुत अधिक महत्व है। जन्म नक्षत्र को ध्यान में रखते हुए शुभ नक्षत्र में बालक को नाम दिया जाता है। नाम वर्ण की शुभता का प्रभाव बालक पर सम्पूर्ण जीवन रहता है। यह बालक के व्यक्तित्व का विकास करता है।*

🚩 06 *निष्क्रमण संस्कार : इस संस्कार में बालक को सूर्य-चंद्र की ज्योति के दर्शन कराए जाते हैं। जन्म के चौथे मास में यह संस्कार किया जाता है। इस दिन से बालक को बाहरी वातावरण के संपर्क में लाया जाता है। शिशु को आस-पास के वातावरण से अवगत कराया जाता है।*

🚩 07 *अन्नप्राशन संस्कार : इस संस्कार के बाद से बालक को माता के दूध के अतिरिक्त अन्य खाद्य पदार्थ देने शुरू किए जाते हैं। चिकित्सा विज्ञान भी यही कहता है कि एक समय सीमा के बाद बालक का पोषण केवल दूध से नहीं हो सकता। उसे अन्य पदार्थों की भी जरूरत होती है। इस संस्कार का उद्देश्य खाद्य पदार्थों से बालक का शारीरिक और मानसिक विकास करना है। यही इसकी वैज्ञानिकता है।*   

🚩 08 *चूड़ाकर्म संस्कार : इसे मुंडन संस्कार के नाम से भी जाना जाता है। इसके लिए शिशु के जन्म के बाद के पहले, तीसरे और पांचवें वर्ष का चयन किया जाता है। शारीरिक स्वच्छता और बौद्धिक विकास इस संस्कार का उद्देश्य है। माता के गर्भ में रहने के समय और जन्म के बाद दूषित कीटाणुओं से मुक्त करने के लिए यह संस्कार किया जाता है। स्वच्छता से शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक विकास अधिक तीव्र गति से होता है। यह विज्ञान भी मानता है।*
  
🚩 09 *विद्यारम्भ संस्कार : विद्यारम्भ का अभिप्राय: बालक को शिक्षा के प्रारम्भिक स्तर से परिचित कराना है। प्राचीन काल में जब गुरुकुल की परम्परा थी तो बालक को वेदाध्ययन के लिए भेजने से पहले घर में अक्षर बोध कराया जाता था। मां-बाप तथा गुरुजन पहले उसे मौखिक रूप से श्लोक, पौराणिक कथाओं आदि का अभ्यास करा दिया करते थे ताकि गुरुकुल में कठिनाई न हो। हमारा शास्त्र विद्यानुरागी है। विद्या अथवा ज्ञान ही मनुष्य की आत्मिक उन्नति का साधन है। शिक्षा विज्ञान की ओर प्रथम कदम है। यही यह संस्कार बताता है।*

🚩 10 *कर्णभेद संस्कार : इस संस्कार का आधार बिल्कुल वैज्ञानिक है। बालक की शारीरिक व्याधि से रक्षा ही इसका मूल उद्देश्य है। प्रकृति प्रदत्त इस शरीर के सारे अंग महत्वपूर्ण हैं। कान हमारे श्रवण द्वार हैं। कर्ण वेधन से व्याधियां दूर होती हैं तथा श्रवण शक्ति भी बढ़ती है।*

🚩 11 *यज्ञोपवीत संस्कार : बच्चे की धार्मिक और आध्यात्मिक उन्नति के लिए यह संस्कार किया जाता है। इसमें जनेऊ धारण कराया जाता है। इस संस्कार का सम्बन्ध लघु या दीर्घ शंका के बाद स्वच्छता से है। इसे कान में लपेटने से एक्यूप्रैशर ङ्क्षबदु पर दबाव पड़ता है, जिससे लघु या दीर्घ शंका से बिना किसी कष्ट के निदान हो जाता है।*

🚩 12 *विद्यारम्भ संस्कार : इस संस्कार के द्वारा यह यत्न किया गया है कि इस धर्म के हर व्यक्ति को अपने धर्म का वैज्ञानिक ज्ञान होना चाहिए। यह जीवन के चतुर्मुखी विकास के लिए बहुत उपयोगी हैं।*

🚩 13 *केशांत संस्कार : इस संस्कार का उद्देश्य बालक को शिक्षा क्षेत्र से निकाल कर सामाजिक क्षेत्र से जोडऩा है। गृहस्थाश्रम में प्रवेश का यह प्रथम चरण है। बालक का आत्मविश्वास बढ़ाने, समाज और कर्म क्षेत्र की परेशानियों से अवगत कराने का कार्य यह संस्कार करता है।*

🚩 14 *समावर्तन संस्कार : गुरुकुल से विदाई के पूर्व यह संस्कार किया जाता है। आज गुरुकुल परम्परा समाप्त हो गई है, इसलिए यह संस्कार अब नहीं किया जाता है। इस उपाधि से वह गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने का अधिकारी समझा जाता था।*

🚩 15 *विवाह संस्कार : विवाह संस्कार अपने बाद अपनी पीढ़ी का अंश इस दुनिया को दिए जाने का मार्ग है। परिपक्व आयु में विवाह संस्कार प्राचीन काल से मान्य रहा है। समाजिक बन्धनों में बांधने और अपने कर्मों से न भागने देने के लिए बच्चों को विवाह संस्कार करके एक अदृश्य डोर में बांध दिया जाता है।*

🚩 16 *अंत्येष्टि संस्कार : जब मनुष्य का शरीर इस संसार के कर्म करने योग्य नहीं रह जाता है, मन की उमंग भी समाप्त हो जाती है, तब इस शरीर का जीव उड़ जाता है। पंचतत्वों से बने इस नश्वर शरीर के दाह संस्कार का विधान है जिससे शरीर के वायरस और बैक्टीरिया समाप्त हो जाएं। क्योंकि जैसे ही इस शरीर का जीव निकलता है, शरीर पर वायरस और बैक्टीरिया का जबरदस्त हमला होता है। इस प्रकार यह भी एक वैज्ञानिक संस्कार है।*
🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात्।।

यज्ञ भारतीय संस्कृति का आदि प्रतीक है। हमारे धर्म में जितनी महानता यज्ञ को दी गई है उतनी और किसी को नहीं दी गई। हमारा कोई भी शुभ अशुभ धर्म कृत्य यज्ञ के बिना पूर्ण नहीं होता। जन्म से लेकर अन्त्येष्टि तक 16 संस्कार होते हैं इनमें अग्निहोत्र आवश्यक है। जब बालक का जन्म होता है तो उसकी रक्षार्थ सूतक निवृत्ति तक घरों में अखण्ड अग्नि स्थापित रखी जाती है। नामकरण, यज्ञोपवीत, विवाह आदि संस्कारों में भी हवन अवश्य होता है। अन्त में जब शरीर छूटता है तो उसे अग्नि को ही सौंपते हैं। अब लोग मृत्यु के समय चिता जला कर यों ही लाश को भस्म कर देते हैं पर शास्त्रों में देखा जाय, तो वह भी एक यज्ञ है। इसमें वेद मन्त्रों से विधि पूर्वक आहुतियां चढ़ाई जाती हैं और शरीर को यज्ञ भगवान के अर्पण किया जाता है।

प्रत्येक कथा, कीर्तन, व्रत, उपवास, पर्व, त्यौहार, उत्सव, उद्यापन में हवन को आवश्यक माना जाता है। अब लोग उसका महत्व एवं विधान भूल गये हैं और केवल चिन्ह पूजा करके काम चल लेते हैं। घरों में स्त्रियां किसी न किसी रूप में यज्ञ की चिन्ह पूजा करती रहती हैं। वे त्यौहारों या पर्वों पर ‘‘अग्नि को निमाने’’ या ‘‘अग्यारी’’ करने का कृत्य किसी न किसी रूप में करती रहती हैं। थोड़ी सी अग्नि को लेकर उस पर घी डाल कर प्रज्ज्वलित करना और उस पर पक्वान्न के छोटे छोटे ग्रास चढ़ाना और फिर से उस अग्नि की परिक्रमा कर देना’’ यह विधान हम घरों में प्रत्येक पर्व एवं त्यौहार पर होते देख सकते हैं। पितरों का श्राद्ध जिस दिन होगा, उस दिन ब्राह्मण भोजन से भी पूर्व इस प्रकार अग्नि को भोजन अवश्य कराया जायगा। क्योंकि यह स्थिर मान्यता है कि अग्नि के मुख में दी हुई आहुति देवताओं एवं पितरों को अवश्य पहुंचती है।

विशेष अवसरों पर तो हवन करना ही पड़ता है। नित्य की चूल्हा, चक्की, बुहारी आदि से होने वाली जीवहिंसा एवं पातकों के निवारणार्थ नित्य मन्त्र यज्ञ करने का विधान है। उन पांचों में बलिवैश्व भी है। बलिवैश्व अग्नि में आहुति देने से होता है। इस प्रकार शास्त्रों की आज्ञानुसार तो नित्य हवन करना भी हमारे लिए आवश्यक है। त्यौहारों में भी प्रत्येक त्यौहार पर अग्निहोत्र आवश्यक है। होली तो यज्ञ का ही त्यौहार है। आज कल लोग लकड़ी, उपले जला कर होली मनाते हैं। शास्त्रों में देखा जाय तो यह यज्ञ है। लोग यज्ञ की आवश्यकता और विधि को तो भूल गये पर केवल ईंधन जला कर उस प्राचीन परम्परा की किसी प्रकार पूर्ति कर लेते हैं। इसी प्रकार श्रावणी, दशहरा, दिवाली आदि त्यौहारों पर किसी न किसी रूप में हवन अवश्य होता है। नवरात्रियों में स्त्रियां देवी पूजा करती हैं तो अग्नि मुख में देवी के निमित्त घी, लौंग, जायफल आदि अवश्य चढ़ाती हैं। सत्यनारायण व्रत कथा, रामायण परायण, गीता पाठ, भागवत सप्ताह आदि कोई भी शुभ आयोजन क्यों न हो, हवन उसमें अवश्य रहेगा।

साधनाओं में भी हवन अनिवार्य है। जितने भी पाठ पुरश्चरण, जप, साधन किए जाते हैं, वे चाहें वेदोक्त हों चाहे तान्त्रिक हवन, उनमें किसी न किसी रूप में अवश्य करना पड़ेगा। गायत्री उपासना में भी हवन आवश्यक है। अनुष्ठान या पुरश्चरण में जप से दसवां भाग हवन करने का विधान है। परिस्थिति वश दसवां भाग आहुतियां न दी जा सकें तो शतांश (सौ वां भाग) आवश्यक है ही। गायत्री को माता और यज्ञ को पिता माना गया है। उन्हीं दोनों के संयोग से मनुष्य का आध्यात्मिक जन्म होता है जिसे ‘द्विजत्व’ कहते हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य को द्विज कहते हैं। द्विज का अर्थ है दूसरा जन्म। जैसे अपने शरीर को जन्म देने वाले माता पिता की सेवा-पूजा करना मनुष्य का नित्यकर्म है, उसी प्रकार गायत्री माता और यज्ञ पिता की पूजा भी प्रत्येक द्विज का आवश्यक धर्म कर्त्तव्य है।

धर्म ग्रन्थों में पग-पग पर यज्ञ की महिमा का गान है। वेद में यज्ञ का विषय प्रधान है। क्यों कि यज्ञ एक ऐसा विज्ञान मय विधान है जिससे मनुष्य का भौतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से कल्याण कारक उत्कर्ष होता है। भगवान यज्ञ से प्रसन्न होते हैं। कहा गया है:—

यो यज्ञे यज्ञ परयैरिञ्चते यज्ञ संज्ञितः।
तं यज्ञ पुरुषं विष्णुं नमामि प्रभुमीश्वरम्।।

जो यज्ञ द्वारा पूजे जाते हैं, यज्ञ मय हैं, यज्ञ रूप हैं, उन यज्ञ रूप विष्णु भगवान को नमस्कार है।

यज्ञ मनुष्य की अनेक कामनाओं को पूर्ण करने वाला तथा स्वर्ग एवं मुक्ति प्रदान करने वाला है। यज्ञ को छोड़ने वालों की शास्त्रों में बहुत निन्दा की गई है:—

कस्त्वा विमुञ्चति सत्वा विमुञ्चति कस्मैंत्व विमुञ्चति तस्मैं त्वं विमुञ्चति। पोषाय रक्षसा भार्गोऽसि।
—यजु. 2।23

सुख शान्ति चाहने वाला कोई व्यक्ति यज्ञ का परित्याग नहीं करता। जो यज्ञ को छोड़ता है, उसे यज्ञ रूप परमात्मा भी छोड़ देता है। सबकी उन्नति के लिए आहुतियां यज्ञ में छोड़ी जाती हैं जो नहीं छोड़ता वह राक्षस हो जाता है।

यज्ञेन पापैः बहुभिर्विमुक्तःप्राप्नोति लोकान् परमस्य विष्णोः।
—हारीत

यज्ञ से अनेक पापों से छुटकारा मिलता है। तथा परमात्मा के लोक की प्राप्ति होती है।

पुत्रार्थी लभते पुत्रान् धनार्थी लभते धनम्।
भार्यार्थी शोभनां भार्या कुमारी च शुभम् पतिम्।।
भ्रष्ट राज्यम्तथा राज्यं श्री कामः श्रियमाप्नुयात्।
यं यं प्रार्थयेत् कामः सर्वे भवति पुष्कलः।
निष्कामः कुरुते यज्ञ स परं ब्रह्म गच्छति।
मत्स्य पुराण 93।117

यज्ञ से पुत्रार्थी को पुत्र लाभ, धनार्थी को धन लाभ, विवाहार्थी को सुन्दर भार्या, कुमारी को सुन्दर पति, श्री कामना वाले को ऐश्वर्य प्राप्त होता है और निष्काम भाव से यज्ञानुष्ठान करने से परमात्मा की प्राप्ति होती है।

न तस्य ग्रह पीड़ा स्यान्नच बन्धु धनक्षयः।
ग्रह यज्ञ व्रतं गेहे लिखितं यत्र निष्ठति।
न तत्र पीड़ा पापानां न रोगो न च बन्धनम।
अशेषा यज्ञ फलदमशेपाघौघ नाशनम्।
—कोटि होम पद्धति

यज्ञ करने वाले को ग्रह पीड़ा, बन्धु नाश, धन क्षय, पाप, रोग, बन्धन आदि की पीड़ा नहीं सहनी पड़ती। यज्ञ का फल अनन्त है।

देवा सन्तोषिता यज्ञोर्लोकान् सम्वर्धयन्त्युत।
उभयोर्लोकयो देव भूतिर्यज्ञः प्रदृश्यते।
तस्माद्यज्ञाद्दिवं याति पूर्वजैः सहमोदते।
नास्ति यज्ञ समं दानं नास्ति यज्ञ समोविधिः।
सर्व धर्म समुद्देश्यो देवि यज्ञ समाहितः।
—महा भा.

यज्ञों से संतुष्ट होकर देवता संसार का कल्याण करते हैं। यज्ञ द्वारा लोक परलोक का सुख प्राप्त होता है। यज्ञ से स्वर्ण की प्राप्ति होती है। यज्ञ के समान कोई दान नहीं, यज्ञ के समान कोई विधि विधान नहीं, यज्ञ में ही सब धर्मों का उद्देश्य समाया हुआ है।

यज्ञेन हि देवादिवांगता यज्ञेनासुरा नपानुदन्तः यज्ञेन द्विषतो मित्रा भवन्ति, यज्ञे सर्व प्रतिष्ठितम् तस्माद्यज्ञं परमं वदन्ति।
—महानारायणोपनिषद्

यज्ञ से ही देवताओं ने स्वर्ग का अधिकार प्राप्त किया और असुरों को हराया। यज्ञ से ही शत्रु मित्र बन जाते हैं। यज्ञ में समस्त लाभ भरे हुए हैं। इसलिये विद्वज्जन यज्ञ को महान् कहते हैं।

असुराश्च सुराश्चैय पुण्यहेतोर्मख क्रियाम्।
प्रयतन्ते महात्मानस्तस्माद्यज्ञाः परायणम्।
यज्ञरेव महात्मानो वभृवुसधिकाः सुरा।
—महाभारत

असुर और सुर सभी पुण्य के मूल हेतु यज्ञ के लिए प्रयत्न करते हैं। सत्पुरुषों को सदा यज्ञ परायण होना चाहिए। यज्ञों से ही बहुत से सत्पुरुष देवता बने हैं।

यदिक्षितायुर्यदि वा परेतो यदि मृत्यो रन्तिकं नीति एव।
तमाहरामि निऋते रूपस्था दस्यार्थमेनं शत शारदाय।
—अथर्व 3।11।2

यदि रोगी अपनी जीवनी शक्ति को खो भी चुका हो, निराशाजनक स्थिति को पहुंच गया हो, यदि मरणकाल भी समीप आ पहुंचा हो, तो भी यज्ञ उसे मृत्यु के चंगुल से बचा लेता है और सौ वर्ष जीवित रहने के लिए पुनः बलवान कर देता है।

यज्ञै राप्यायिता देवा वृष्टयुत्सर्गेण वै प्रजाः।
आप्यायन्ते तु धर्मज्ञ यज्ञाः कल्याण हेतवः।।
—विष्णु पुराण

यज्ञ से देवताओं को बल मिलता है। यज्ञ द्वारा वर्षा होती है। वर्षा से अन्न और प्रजा-पालन होता है। हे धर्मज्ञ, यज्ञ ही कल्याण का हेतु है।

प्रयुक्तया यथ चेष्टया राजयक्ष्मा पुरोजितः।
वां वेद विहितामिष्टिमारोग्यार्थी प्रयोजयेत्।।
चरक चि. खण्ड 8।122

तपैदिक सरीखे रोगों को प्राचीन काल में यज्ञ के प्रयोग से नष्ट किया जाता था। रोग मुक्ति की इच्छा रखने वालों को चाहिए कि उस वेद विदित यज्ञ का आश्रय लें।

अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाऽहमहमोषधम्।
मन्त्रोऽहमहमेव ऽऽज्यमहमग्निंरहंहुतम्।।
गीता 9।16

मैं ही क्रतु हूं, मैं ही यज्ञ हूं, मैं ही स्वधा हूं, मैं ही औषधि हूं, और मन्त्र, घृत, अग्नि और हवन भी मैं ही हूं।

नायं लोकोऽस्त्व यज्ञस्यकुतोन्यः कुरु सत्तम।
गीता 4।31

हे अर्जुन! यज्ञ रहित मनुष्य को इस लोक में भी सुख नहीं मिल सकता, फिर परलोक का सुख तो होगा ही कैसे?

नास्त्य यज्ञस्य लोको वै ना यज्ञो विन्दते शुभम्।
अयज्ञो न च पूतात्मा नश्यन्तिश्छिन्न पूर्णवत्।।
—शंख

यज्ञ न करने वाला मनुष्य लौकिक और पारलौकिक सुखों से वंचित हो जाता है। यज्ञ न करने वाले की आत्मा पवित्र नहीं होती और वह पेड़ से टूटे हुए पत्ते की तरह नष्ट हो जाता है।

सहयज्ञाः प्रजाः सृष्टा पुरोवाच प्रजापतिः।
अनेन प्रसांविध्वमेष वोस्त्विष्टकामधुक्।।
देवान् भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्म्यथ।।
इष्टान्भोगान्हिवो देवा दास्यन्ते यज्ञ भाविता।
—गीता 3-10-11

ब्रह्माजी ने मनुष्यों के साथ ही यज्ञ को भी पैदा किया और उनसे कहा कि इस यज्ञ द्वारा तुम्हारी उन्नति होगी, यह यज्ञ तुम्हारी इच्छित कामनाओं आवश्यकताओं को पूर्ण करेगा। तुम लोग यज्ञ द्वारा देवताओं को पुष्ट करो, वे देवता तुम्हारी उन्नति करेंगे। इस प्रकार दोनों अपने कर्त्तव्य का पालन करते हुए परम कल्याण को प्राप्त होंगे। यज्ञ द्वारा पुष्ट किए हुए देवता अनायास ही तुम्हारी सुख-शान्ति की वस्तुएं प्रदान करेंगे।

असंख्यों शास्त्र वचनों में से कुछ प्रमाण ऊपर दिये गए हैं। इनसे यज्ञ की महत्ता का अनुमान सहज ही हो जाता है। पूर्व काल में भी आध्यात्मिक एवं भौतिक उद्देश्यों के निमित्त बड़े बड़े यज्ञ हुआ करते थे। देवता भी यज्ञ करते थे, असुर भी यज्ञ करते थे, ऋषियों द्वारा यज्ञ किये जाते थे, राजा लोग अश्वमेध आदि विशाल यज्ञों का आयोजन करते थे, साधारण गृहस्थ भी अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुसार समय-समय पर यज्ञ किया करते थे। असुर लोग यज्ञों को विध्वंस करने का सदैव इसलिए प्रयत्न किया करते थे कि उनके शत्रुओं का लाभ एवं उत्कर्ष न होने पावे। इसी प्रकार असुरों के यज्ञों का ध्वंस भी कराया गया है। रामायण में राक्षसों के एक ऐसे यज्ञ का वर्णन है जिसे हनुमान जी ने नष्ट किया था। यदि यज्ञ सफल हो जाता तो राक्षस अजेय हो जाते।

राजा दशरथ ने पुत्रेष्टि यज्ञ करके चार पुत्र पाये थे। राजा नृग यज्ञों के द्वारा स्वर्ग जाकर इन्द्रासन के अधिकारी हुए थे। राजा अश्वपति ने यज्ञ द्वारा सन्तान प्राप्त करने का सुयोग प्राप्त किया था। इन्द्र ने स्वयं भी यज्ञों के द्वारा ही पाया था। भगवान राम ने अपने यहां अश्वमेध कराया था। श्रीकृष्ण जी की प्रेरणा से पाण्डवों ने राजसूय यज्ञ कराया था जिसमें श्रीकृष्ण जी ने आगन्तुकों के स्वागत सत्कार का भार अपने ऊपर लिया था। पापों के प्रायश्चित स्वरूप अनिष्टों और प्रारब्ध जन्य दुर्भाग्यों की शान्ति के निमित्त, किसी अभाव की पूर्ति के लिए, कोई सुयोग या सौभाग्य प्राप्त करने के प्रयोजन से रोगनिवारणार्थ, देवताओं को प्रसन्न करने के हेतु, धन धान्य की अधिक उपज के लिए, अमृतमयी वर्षा के निमित्त, वायु मण्डल में से अस्वास्थ्यकर तत्वों का उन्मूलन करने के निमित्त हवन यज्ञ किए जाते थे। और उनका परिणाम भी वैसा ही होता था।

यज्ञ एक महत्वपूर्ण विज्ञान है। जिन वृक्षों की समिधाएं काम में ली जाती हैं, उनमें विशेष प्रकार के गुण होते हैं। किस प्रयोग के लिए किस प्रकार की हव्य वस्तुएं होमी जाती हैं। इसका भी विज्ञान है। उन वस्तुओं के आपस में मिलने से एक विशेष गुण संयुक्त सम्मिश्रण तैयार होता है जो जलने पर वायु मण्डल में एक विशिष्ट प्रभाव पैदा करता है। वेद मन्त्रों के उच्चारण की शक्ति से उस प्रभाव में और भी अधिक वृद्धि होती है। फलस्वरूप जो व्यक्ति उस यज्ञ में सम्मिलित होते हैं उन पर तथा निकटवर्ती वायु मण्डल पर उसका बड़ा प्रभाव पड़ता है। सूक्ष्म प्रकृति के अन्तराल में जो नाना प्रकार की दिव्य शक्तियां काम करती हैं उन्हें देवता कहते हैं। इन देवताओं को अनुकूल बनाना, उनको उपयोगी दशा में प्रयुक्त करना, उनसे घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित करना यही देवताओं को प्रसन्न करना है। यह प्रयोजन यज्ञ द्वारा आसानी से पूरा हो जाता है।

संसार में कभी किसी वस्तु का नाश नहीं होता, केवल रूपान्तर होता रहता है। जो वस्तु हवन में होमी जाती हैं वे तथा वेद मन्त्रों की शक्ति के साथ जो सद्भावनाएं यज्ञ द्वारा उत्पन्न की जाती हैं वे दोनों ही मिलकर आकाश में छा जाती हैं। उनका परिणाम समस्त संसार के लिए अनेक प्रकार से कल्याण कारक परिणाम उत्पन्न करने वाला होता है। इस प्रकार यज्ञ संसार की सेवा का विश्व में सुख शान्ति उत्पन्न करने का एक उत्तम माध्यम एवं पुण्य परमार्थ है। यज्ञ से याचक की आत्मा शुद्ध होती है, उसके पाप ताप नष्ट होते हैं, तथा शान्ति एवं सद्गति उपलब्ध होती है। सच्चे हृदय से यज्ञ करने वाले मनुष्यों का लोक और परलोक सुधरता है। यदि उनका पुण्य पर्याप्त हुआ तब तो उन्हें स्वर्ग या मुक्ति की प्राप्ति होती है अन्यथा यदि दूसरा जन्म भी लेना पड़ा तो सुखी, श्रीमान, साधन सम्पन्न उच्च परिवार में जन्म होता है ताकि आगे के लिए वह सुविधा के साथ सत्कर्म करता हुआ, लक्ष्य को सफलता पूर्वक प्राप्त कर सके।

यज्ञ का अर्थ है दान, एकता, उपासना। इन भावनाओं एवं मनोवृत्तियों को संसार में बढ़ाने के लिए यज्ञ का आयोजन स्थूल और सूक्ष्म दोनों ही दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। यज्ञ का वेदोक्त आयोजन, शक्तिशाली मन्त्रों का विधिवत् उच्चारण विधि पूर्वक बनाये हुए कुण्ड शास्त्रोक्त समिधाएं तथा सामग्रियां जब ठीक विधान पूर्वक हवन की जाती हैं तो उसका दिव्य प्रभाव विस्तृत आकाश मण्डल में फैल जाता है। उस प्रभाव के फलस्वरूप प्रजा के अन्तःकरणों में प्रेम, एकता, सहयोग, सद्भाव, उदारता, ईमानदारी, संयम, सदाचार, आस्तिकता आदि सद्भावों एवं सद्विचारों का स्वयमेव आविर्भाव होने लगता है। पत्तों से आच्छादित दिव्य अध्यात्म वातावरण के दिनों में सन्तानें पैदा होती हैं वे भी स्वस्थ, सद्गुणी एवं उच्च विचार धाराओं से परिपूर्ण होती हैं। पूर्व काल में इसी दृष्टि से पुत्रेष्टि यज्ञ किये जाते थे। जिनके सन्तानें नहीं होतीं वे ही पुत्रेष्टि यज्ञ कराते हों सो बात नहीं जिनको बराबर सन्तानें होती थीं वे भी सद्गुणी एवं प्रतिभावान् सन्तान प्राप्त करने के लिए पुत्रेष्टि यज्ञ कराते थे। गर्भाधान, सीमन्त, पुंसवन, जातकर्म, नामकरण आदि संस्कार बालक को जन्म लेते लेते अबोध अवस्था में ही हो जाते थे, इनमें से प्रत्येक में हवन होता था ताकि बालक के मन पर दिव्य प्रभाव पड़े और वह बड़ा होने पर पुरुष सिंह एवं महापुरुष बने। प्राचीन काल का इतिहास साक्षी है कि जिन दिनों इस देश में यज्ञ की प्रतिष्ठा थी, उन दिनों यहां महापुरुषों की, नररत्नों की कमी नहीं थी। आज यज्ञ का तिरस्कार करके अनेक दुर्गुणों, रोगों, कुसंस्कारों और बुरी आदतों से ग्रसित बालकों से ही हमारे घर भरे हुए हैं।

यज्ञ से अदृश्य आकाश में जो आध्यात्मिक विद्युत तरंगों फैलती हैं वे लोगों के मनों में से द्वेष, पाप, अनीति, वासना, स्वार्थपरता, कुटिलता आदि बुराइयों को हटाती हैं। फलस्वरूप उससे अनेकों समस्याएं हल होती हैं। अनेकों उलझनें, गुत्थियां, पेचीदगियां, चिन्ताएं, भय, आशंकाएं तथा बुरी संभावनाएं समूल नष्ट हो जाती हैं। राजा, धनी, सम्पन्न लोग, ऋषि, मुनि बड़े-बड़े यज्ञ कराते थे, जिससे दूर-दूर तक का वातावरण निर्मल होता था और देश व्यापी, समाज व्यापी, विश्व व्यापी बुराइयां तथा उलझनें सुलझती थीं। साधारण गृहस्थ छोटे-छोटे हवन कराते थे, जिससे उनके घर की, कुटुम्ब की, ग्राम की छोटी-छोटी समस्याएं हल होती थीं। व्यापक सुख, समृद्धि, वर्षा, आरोग्यता, सुख शान्ति के लिए बड़े-बड़े यज्ञों की आवश्यकता पड़ती है, पर छोटे-छोटे हवन भी अपनी छोटी सीमा और मर्यादा के भीतर अपने लाभों से प्रजा को लाभान्वित करते हैं। जितना खर्च हवन में होता है उससे हजारों गुने मूल्य की सुख समृद्धि की प्राप्ति एवं आपत्तियों से निवृत्ति मिलती है। इस तरह किसी भी प्रकार यज्ञ घाटे का सौदा नहीं रहता।

बड़े रूप में यज्ञ करने की जिनकी सामर्थ्य है उन्हें वैसे आयोजन करने चाहिए। अग्नि का मुख ईश्वर का मुख है। उसमें जो कुछ खिलाया जाता है वह सच्चे अर्थों में ब्रह्मभोज है। ब्रह्म अर्थात् परमात्मा, भोज अर्थात् भोजन, परमात्मा को भोजन कराना यज्ञ के मुख में आहुति छोड़ना ही है। भगवान हम सबको खिलाता है, हमारा भी कर्त्तव्य है कि अपने उपकारी के प्रति पूजा करने में कन्जूसी न करें। जिनकी आर्थिक स्थिति वैसी नहीं है वे कई व्यक्ति थोड़ा-थोड़ा सहयोग करके सामूहिक यज्ञों की व्यवस्था कर सकते हैं। जहां वैसा सुयोग न हो वहां यदा कदा छोटे छोटे हवन किए जा सकते हैं। अथवा जहां नियमित यज्ञ होते हैं वहां अपनी ओर से कुछ आहुतियों का हवन कराया जा सकता है। कोई अन्य व्यक्ति यज्ञ कर रहे हों तो उसमें समय, सहयोग एवं सहायता देकर उसे सफल बनाने का प्रयत्न करना भी यज्ञ में भागीदार होना ही है।

नित्य का अग्निहोत्र बहुत सरल है। उसमें कुछ इतना भारी खर्च नहीं होता कि मध्यम वृत्ति का मनुष्य उस भार को उठा न सके। जो लोग नित्य हवन नहीं कर सकते वे सप्ताह में एक बार रविवार को अथवा अमावस्या पूर्णमासी को अथवा महीने में एक बार पूर्णमासी को थोड़ा या बहुत हवन करने का प्रयत्न करें। विधि विधान भी इन साधारण हवनों का कोई कठिन नहीं है। ‘‘गायत्री यज्ञ विधान’’ पुस्तक में उसकी सरल विधियां बताई जा चुकी हैं। उनके आधार पर बिना पण्डित पुरोहित की सहायता के कोई भी द्विज आसानी से कर सकता है। जहां कुछ भी विधान न मालूम हो वहां केवल शुद्ध घृत की आहुतियां गायत्री मन्त्र के अन्त में ‘स्वाहा’ शब्द लगाते हुए दी जा सकती हैं। किसी न किसी रूप में यज्ञ परम्परा को जारी रखा जाय तो वह भारतीय संस्कृति की एक बड़ी भारी सेवा है और उस छोटा सा कर्मकाण्ड भी अपने घर के वायुमण्डल शुद्ध करने और घर के सब लोगों पर सतोगुणी प्रभाव डालने में बड़ा सहायक होता है। जिन घरों में हवन होते रहते हैं वहां पाप कर्मों का प्रवेश नहीं होता, प्रेत पिशाच, दुख दुर्भाग्य, अभाव दारिद्र एवं क्लेश कलह का शमन होता रहता है। अग्निहोत्र से देवता प्रसन्न होते हैं और वे सुख शान्ति की वर्षा करते रहते हैं।

यज्ञ किसी भी प्रकार घाटे का सौदा नहीं है। साधारण रीति से किये हुए हवन में जो धन व्यय होता है, एक प्रकार से देवताओं की बैंक में जमा हो जाता है और वह सन्तोषजनक ब्याज समेत लौटकर अपने को बड़ी महत्वपूर्ण आवश्यकता के समय पर वापिस मिलता है। विधि पूर्वक, शास्त्रीय पद्धति एवं विशिष्ट उपचारों एवं विधानों के साथ किए हुए हवन तो और भी महत्वपूर्ण हैं। ऐसे यज्ञ एक प्रकार के दिव्य अस्त्र हैं। दैवी सहायताएं प्राप्त करने के अचूक उपचार हैं। पूर्व काल में यज्ञ द्वारा मनोवांछित वर्षा होती है! यज्ञ शक्ति से सुसज्जित होकर योद्धा लोग अजेय बनते थे। यज्ञ द्वारा योगी लोग अपनी तपस्या पूर्ण करके आत्म साक्षात्कार करते थे। यज्ञ समस्त ऋद्धि सिद्धियों का पिता है। यज्ञ को वेदों ने ‘‘कामधुक’’ कहा है वह मनुष्यों के अभावों को पूरा करने वाला और बाधाओं को दूर करने वाला है।

गायत्री उपासकों के लिए यज्ञ आवश्यक है उन्हें यज्ञ परम्परा जारी रखनी चाहिए। अपने घर का, अपनी मनोभूमि का वातावरण यज्ञमय रहे, यज्ञ भगवान की पूजा होती रहे यह प्रयत्न करना प्रत्येक द्विज के लिये आवश्यक है।

साधारण होम भी बहुत उपयोगी होता है, उससे घर की वायु शुद्धि, रोग निवृत्ति, अनिष्टों से आत्म रक्षा होती है। फिर विशेष आयोजन के साथ विधि विधान पूर्वक किये गये यज्ञ तो असाधारण फल उत्पन्न करते हैं। यज्ञ एक विद्या है पांचों तत्वों का हाल में एक वैज्ञानिक सम्मिश्रण होता है जिससे एक प्रचण्ड दुर्धर्ष शक्ति का आविर्भाव होता है यज्ञ की इस प्रचण्ड शक्ति का ‘‘द्वि मृर्धा, द्वि नासिक, सप्त हस्त, द्वि मुख, सप्त जिह्वा, उत्तर मुख, कोटि द्वादश कर्त्या, द्वि पञ्ज शत्कला युतम्’’ आदि विशेषणोयुक्त कहा गया है। इस रहस्य पूर्ण संकेत में यह बताया गया है कि यज्ञाग्नि की मूर्धा भौतिक और आध्यात्मिक दोनों हैं। यह क्षेत्र सफल बनाये जा सकते हैं। स्थूल और सूक्ष्म प्रकृति यज्ञ की नासिका है उस पर अधिकार प्राप्त किया जा सकता है, सातों प्रकार की सम्पदाएं यज्ञाग्नि के हैं हाथ व मामर्ग और दक्षिण मार्ग ये दो मुख हैं। सातों लोक जिह्वाएं हैं, इन सब लोकों में जो कुछ भी विशेषताएं हैं वे यज्ञाग्नि के मुख में मौजूद हैं। उत्तर ध्रुव का चुम्बकत्व केन्द्र अग्नि मुख है। 52 कलाएं यज्ञ की ऐसी हैं जिनमें से कुछ को प्राप्त करके ही रावण इतना शक्तिशाली हो गया था। यदि यह सभी कलाएं उपलब्ध हो जायं तो मनुष्य साक्षात अग्नि रूप हो सकता है और विश्व के सभी पदार्थ उसके करतल गत हो सकते हैं। यज्ञ की महिमा अनन्त है। उसका थोड़ा आयोजन भी फलदायक होता है। गायत्री उपासकों के लिए तो यज्ञ पिता तुल्य पूजनीय है।

***समाप्त*

Comments

Popular posts from this blog

वर-कन्या कुण्डली मेलापक

रामायण की लगभग सभी कथाओं से हम परिचित ही हैं

भारतीय रसोई के चूल्हे की राख में ऐसा क्या था कि, वह पुराने जमाने का Hand Sanitizer थी ...?