गुरुकुल_में_क्या_पढ़ाया_जाता_था
गुरुकुल_में_क्या_पढ़ाया_जाता_था,
यह_जान_लेना_अति_आवश्यक_है।
1.अग्नि विद्या ( metallergy )
2 वायु विद्या ( flight )
3 जल विद्या ( navigation )
4 अंतरिक्ष विद्या ( space science )
5 पृथ्वी विद्या ( environment )
6 सूर्य विद्या ( solar study )
7 चन्द्र व लोक विद्या ( lunar study )
8 मेघ विद्या ( weather forecast )
9 पदार्थ विद्युत विद्या ( battery )
10 सौर ऊर्जा विद्या ( solar energy )
11 दिन रात्रि विद्या ( day - night studies )
12 सृष्टि विद्या ( space research )
13 खगोल विद्या ( astronomy)
14 भूगोल विद्या (geography )
15 काल विद्या ( time )
16 भूगर्भ विद्या (geology and mining )
17 रत्न व धातु विद्या ( gems and metals )
18 आकर्षण विद्या ( gravity )
19 प्रकाश विद्या ( solar energy )
20 तार विद्या ( communication )
21 विमान विद्या ( plane )
22 जलयान विद्या ( water vessels )
23 अग्नेय अस्त्र विद्या ( arms and amunition )
24 जीव जंतु विज्ञान विद्या ( zoology botany )
25 यज्ञ विद्या ( material Sc)
वैदिक_विज्ञान
Vedic Science
वाणिज्य ( commerce )
कृषि (Agriculture )
पशुपालन ( animal husbandry )
पक्षिपालन ( bird keeping )
पशु प्रशिक्षण ( animal training )
यान यन्त्रकार ( mechanics)
रथकार ( vehicle designing )
रतन्कार ( gems )
सुवर्णकार ( jewellery designing )
वस्त्रकार ( textile)
कुम्भकार ( pottery)
लोहकार ( metallergy )
तक्षक ( guarding )
रंगसाज ( dying )
आयुर्वेद ( Ayurveda )
रज्जुकर ( logistics )
वास्तुकार ( architect)
पाकविद्या ( cooking )
सारथ्य ( driving )
नदी प्रबन्धक ( water management )
सुचिकार ( data entry )
गोशाला प्रबन्धक ( animal husbandry )
उद्यान पाल ( horticulture )
वन पाल ( horticulture )
नापित ( paramedical )
इस_प्रकार_की_विद्या_गुरुकुल_में_दी_जाती_थीं।
इंग्लैंड में पहला स्कूल 1811 में खुला -
उस समय भारत में -732000 गुरुकुल थे।
खोजिए हमारे गुरुकुल कैसे बन्द हुए ? और मंथन जरूर करे वेद ज्ञान विज्ञान को चमत्कार छूमंतर व मनघड़ंत कहानियों में कैसे बदला या बदलवाया गया। वेदों के नाम पर वेद विरुद्ध हिंदी रूपांतरण करके मिलावट की ।
अपरा विधा- भेाैतिक विज्ञान को व अपरा विधा आध्यात्मिक विज्ञान को कहा गया है। इन दोनों में १६ कलाओं का ज्ञान होता है।
तैत्तिरीयोपनिषद , भ्रगुवाल्ली अनुवादक ,५, मंत्र १, में ऋषि भ्रगु ने बताया है कि-
विज्ञान॑ ब्रहोति व्यजानात्।विज्ञानाद्धयेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते।विज्ञानेन जातानि जीवन्ति। विज्ञान॑ प्रयन्त्यभिस॑विशन्तीति।
अर्थ- तप के अनातर उन्होंने ( ऋषि ने) जाना कि वास्तव मैं विज्ञान से ही समस्त प्राणी उत्पन्न होते हैं। उत्पत्ति के बाद विज्ञान से ही जीवन जीते हैं। अंत में प्रायान करते हुए विज्ञान में ही प्रविष्ठ हो जाते हैं।
तैत्तिरीयोपनिषद ब्रह्मानन्दवल्ली अनुवादक ८, मंत्र ९ में लिखा है कि-
विज्ञान॑ यज्ञ॑ तनुते। कर्माणि तनुतेऽपि च। विज्ञान॑ देवा: सर्वे। ब्रह्म ज्येष्ठमुपासते। विज्ञान॑ ब्रह्म चेद्वेद।
अर्थ- विज्ञान ही यज्ञों व कर्मों की वृद्धि करता है। सम्पूर्ण देवगण विज्ञान को ही श्रेष्ठ ब्रह्म के रूप में उपासना करते हैं। जो विज्ञान को ब्रह्म स्वरूप में जानते हैं, उसी प्रकार से चिंतन में रत्त रहते हैं, तो वे इसी शरीर से पापों से मुक्त होकर सम्पूर्ण कामनाओं की सिद्धि प्राप्त करते हैं। उस विज्ञान मय देव के अंदर ही वह आत्मा ब्रह्म रूप है। उस विज्ञान मय आत्मा से भिन्न उसके अन्तर्गत वह आत्मा ही ब्रह्म स्वरूप है।
( संसार के सभी जीव शिल्प विज्ञान के द्वारा ही जीवन यापन करते हैं।)
👉 वेद ज्ञान है शिल्प विज्ञान है
त्रिनो॑ अश्विना दि॒व्यानि॑ भेष॒जा त्रिः पार्थि॑वानि॒ त्रिरु॑ दत्तम॒द्भ्यः।
आ॒मान॑ श॒योर्ममि॑काय सू॒नवे त्रि॒धातु॒ शर्म॑ वहतं शुभस्पती॥
ऋग्वेद (1.34.6)
हे (शुभस्पती) कल्याणकारक मनुष्यों के कर्मों की पालना करने और (अश्विना) विद्या की ज्योति को बढ़ानेवाले शिल्पि लोगो ! आप दोनों (नः) हम लोगों के लिये (अद्भ्यः) जलों से (दिव्यानि) विद्यादि उत्तम गुण प्रकाश करनेवाले (भेषजा) रसमय सोमादि ओषधियों को (त्रिः) तीनताप निवारणार्थ (दत्तम्) दीजिये (उ) और (पर्थिवानि) पृथिवी के विकार युक्त ओषधी (त्रिः) तीन प्रकार से दीजिये और (ममकाय) मेरे (सूनवे) औरस अथवा विद्यापुत्र के लिये (शंयोः) सुख तथा (ओमानम्) विद्या में प्रवेश और क्रिया के बोध करानेवाले रक्षणीय व्यवहार को (त्रिः) तीन बार कीजिये और (त्रिधातु) लोहा ताँबा पीतल इन तीन धातुओं के सहित भूजल और अन्तरिक्ष में जानेवाले (शर्म) गृहस्वरूप यान को मेरे पुत्र के लिये (त्रिः) तीन बार (वहतम्) पहुंचाइये ॥
भावार्थ- मनुष्यों को चाहिये कि जो जल और पृथिवी में उत्पन्न हुई रोग नष्ट करनेवाली औषधी हैं उनका एक दिन में तीन बार भोजन किया करें और अनेक धातुओं से युक्त काष्ठमय घर के समान यान को बना उसमें उत्तम २ जव आदि औषधी स्थापन कर देश देशांतरों में आना जाना करें।
विश्वकर्मा कुल श्रेष्ठो धर्मज्ञो वेद पारगः।
सामुद्र गणितानां च ज्योतिः शास्त्रस्त्र चैबहि।।
लोह पाषाण काष्ठानां इष्टकानां च संकले।
सूत्र प्रास्त्र क्रिया प्राज्ञो वास्तुविद्यादि पारगः।।
सुधानां चित्रकानां च विद्या चोषिठि ममगः।
वेदकर्मा सादचारः गुणवान सत्य वाचकः।।
(शिल्प शास्त्र) अर्थववेद
भावार्थ – विश्वकर्मा वंश श्रेष्ठ हैं विश्वकर्मा वंशी धर्मज्ञ है, उन्हें वेदों का ज्ञान है। सामुद्र शास्त्र, गणित शास्त्र, ज्योतिष और भूगोल एवं खगोल शास्त्र में ये पारंगत है। एक शिल्पी लोह, पत्थर, काष्ठ, चान्दी, स्वर्ण आदि धातुओं से चित्र विचित्र वस्तुओं सुख साधनों की रचना करता है। वैदिक कर्मो में उन की आस्था है, सदाचार और सत्यभाषण उस की विशेषता है।
यजुर्वेद के अध्याय २९ के मंत्र 58 के ऋषि जमदाग्नि है इसमे बार्हस्पत्य शिल्पो वैश्वदेव लिखा है। वैश्वदेव में सभी देव समाहित है।
शुल्वं यज्ञस्य साधनं शिल्पं रूपस्य साधनम् ॥
(वास्तुसूत्रोपनिषत्/चतुर्थः प्रपाठकः - ४.९ ॥)
अर्थात - शुल्ब सूत्र यज्ञ का साधन है तथा शिल्प कौशल उसके रूप का साधन है।
👉👉 शिल्प और कुशलता में बहुत बड़ा अन्तर है ( एक शिल्प विद्या द्वारा किसी प्रारूप को बनाना और दूसरा कुशलता पूर्वक उसका उपयोग करना , ये दोनो अलग अलग है
👉👉👉 कुशलता
जैसे शिल्प द्वारा निर्मित ओजारो से नाई कुशलता से कार्य करता है , शिल्पी द्वारा निर्मित यातायन के साधन को एक ड्राईवर कुशलता पूर्वक चलता है आदि
सामान्यतः जिस कर्म के द्वारा विभिन्न पदार्थों को मिलाकर एक नवीन पदार्थ या स्वरूप तैयार किया जाता है उस कर्म को शिल्प कहते हैं । ( उणादि० पाद०३, सू०२८ ) किंतु विशेष रूप निम्नवत है
१- जो प्रतिरूप है उसको शिल्प कहते हैं "यद् वै प्रतिरुपं तच्छिल्पम" (शतपथ०- का०२/१/१५ )
२- अपने आप को शुद्ध करने वाले कर्म को शिल्प कहते हैं
(क)"आत्मा संस्कृतिर्वै शिल्पानि: " (गोपथ०-उ०/६/७)
(ख) "आत्मा संस्कृतिर्वी शिल्पानि: " (ऐतरेय०-६/२७)
३- देवताओं के चातुर्य को शिल्प कहकर सीखने का निर्देश है (यजुर्वेद ४ / ९, म० भा० )
४- शिल्प शब्द रूप तथा कर्म दोनों अर्थों में आया है -
(क)"कर्मनामसु च " (निघन्टु २ / १ )
(ख) शिल्पमिति रुप नाम सुपठितम्" (निरुक्त ३/७)
५ - शिल्प विद्या आजीविका का मुख्य साधन है। (मनुस्मृति १/६०, २/२४, व महाभारत १/६६/३३ )
६- शिल्प कर्म को यज्ञ कर्म कहा गया है।
( वाल्मि०रा०, १/१३/१६, व संस्कार विधि, स्वा० द० सरस्वती व स्कंद म०पु० नागर६/१३-१४ )
।।पांचाल_ब्राह्मण।।
शिल्पी ब्राह्मण नामान: पञ्चाला परि कीर्तिता:।
(शैवागम अध्याय-७)
अर्थात-पांच प्रकार के श्रेष्ठ शिल्पों के कर्ता होने से शिल्पी ब्राह्मणों का नाम पांचाल है।
पंचभि: शिल्पै:अलन्ति भूषयन्ति जगत् इति पञ्चाला:। (विश्वकर्म वंशीय ब्राह्मण व्यवस्था-भाग-३, पृष्ठ-७६-७७)
अर्थात- पांच प्रकार के शिल्पों से जगत को भूषित करने वाले शिल्पि ब्राह्मणों को पांचाल कहते हैं।
ब्रह्म विद्या ब्रह्म ज्ञान (ब्रह्मा को जानने वाला) जो की चारो वेदों में प्रमाणित है जो वैदिक गुरुकुलो में शिक्षा दी जाती थी ये (metallergy) जिसे अग्नि विद्या या लौह विज्ञान (धातु कर्म) कहते है , ये वेदों में सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मकर्म ब्रह्मज्ञान है पृथ्वी के गर्भ से लौह निकालना और उसका चयन करना की किस लोहे से , या किस लोहे के स्वरूप से, सुई से लेकर हवाई जहाज, युद्ध पोत जलयान, थलयान, इलेक्ट्रिक उपकरण , इलेक्ट्रॉनिक उपकरण , रक्षा करने के आधुनिक हथियार , कृषि के आधुनिक उपकरण , आधुनिक सीएनसी मशीन, सिविल इन्फ्रास्ट्रक्चर सब (metallergy) अग्नि विद्या ऊर्फ लोहा विज्ञान की देन है हमारे वैदिक ऋषि सब वैज्ञानिक कार्य करते थे वेदों में इन्हीं विश्वकर्मा शिल्पियों को ब्राह्मण की उपाधि मिली है जो वेद ज्ञान विज्ञान से ही संभव है चमत्कारों से नहीं वेद ज्ञान विज्ञान से राष्ट्र निर्माण होता है पाखण्ड से नहीं, इसी को विज्ञान कहा गया है बिना शिल्प विज्ञान के हम सृष्टि विज्ञान की कल्पना भी नहीं कर सकते इसलिए सभी विज्ञानिंक कार्य इन्ही सुख साधनों से संभव है इसलिए वैदिक शिल्पी विश्वकर्मा ऋषियों द्वारा भारत की सनातन संस्कृति विश्वगुरु कहलाई
भगवान (विश्वकर्मा शिल्पी ब्राह्मणों) ने अपने रचनात्मक कार्यों से इस ब्रह्मांड का प्रसार किया है। जो सभी वैदिक ग्रंथों में प्रमाणित है.
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June 28, 2023 9:14 am
Gurukul : गुरुकुल,वैदिक गुरुकुल,गुरुकुल शिक्षा,गुरुकुल के नियम,गुरुकुल की विशेषता
Published by blogalien72
Gurukul
प्राचीन गुरुकुल शिक्षा प्रणाली और पद्धती के बारे में जानिए, Gurukul
आज हम यहां पर भारत के सनातन प्राचीन Gurukul के बारे में बात करेंगे ! गुरुकुल का अर्थ क्या है, गुरुकुल में क्या होता था, गुरुकुल कितने प्रकार के होते थे, गुरुकुल शिक्षा के उद्देश्य क्या थे ! और गुरुकुल में एडमिशन कैसे होता था, गुरुकुल के नियम क्या थे, गुरुकुल की दिनचर्या कैसे होती थी, गुरुकुल की फीस क्या थी !
वैदिक गुरुकुल क्या होता है ! गुरुकुल की शिक्षा प्रणाली कैसी थी ! गुरुकुल की क्या विशेषता थी ! भारत के प्राचीन Gurukul कौन-कौन से थे ! आजादी से पहले भारत में कितने गुरुकुल थे, गुरुकुल में क्या पढ़ाया जाता था, गुरुकुल में शिक्षा का विभाजन कैसे होता था ! कैसे खत्म हो गए भारत से गुरुकुल ! सब बातों की जानकारी आज हम यहां पर जानेंगे
गुरुकुल का अर्थ क्या हैं (what is the meaning of gurukul)
गुरुकुल का अर्थ है, जहाँ गुरु और शिष्य एक स्थान या क्षेत्र में परिवार की तरह निवास करते हो ! प्राचीन काल में गुरु या आचार्य और शिक्षा ग्रहण करने वाले शिष्य को परिवार माना जाता था ! गुरुकुल में दाखिले के लिए छात्रों की आयु तक छ: साल से लेकर बारह वर्ष की होना अनिवार्य था !
शिक्षा के साथ साथ ब्रह्मचर्य का पालन करना, अनुशासन का पालन करना सिखाया जाता था। छात्रो को अपने पसंद के काम के काम को सिखाने का अवशर दिया जाता था ! शारीरिक स्वास्थ्य बेहतर बनाने के लिए खेल, योग, ध्यानयोग, कसरत पर विशेष ध्यान दिया जाता था !
गुरुकुल में क्या होता था (what used to happen in gurukul)
गुरुकुल दुनिया की पहली सनातन धर्म की एक प्राचीन शिक्षा पद्धति थी ! जहां पर जीवन उपार्जन के साथ-साथ अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा और वेद पुराणों की शिक्षा दी जाती थी ! गुरुकुल में पढ़ने वाले सभी विद्यार्थियों को बचपन में ही शिक्षा के लिए भेज दिया जाता था ! जहां पर उन्हें ब्रह्मचार्य का पालन करना व पढ़ाई पूरी होने पर एक जागरूक नागरिक के रूप में समाज में आदर्श स्थापित कर सके ! ऐसी शिक्षा दी जाती थी !
गुरुकुल कितने प्रकार के होते थे ?
(How many types of Gurukuls were there?)
प्राचीन भारत में तीन प्रकार के गुरूकुल होते थे I जो इस प्रकार से जाने जाते थे !
गुरुकुल- जहाँ शिष्य गुरु के साथ आश्रम में रहकर विद्ध्या अध्यन करते थे I
परिषद- जहाँ विशेष आचार्यो द्वारा शिक्षा दी जाती थी I
तपस्थली- जहाँ बड़े-बड़े ऋषि मुनि सभाओं तथा प्रवचनों से अपने शिष्यो को ज्ञान देते थे ! जैसे नैमिषारण्य
बाल झड़ने से कैसे रोके,बाल के लिए घरेलु उपाय,बाल कैसे बढ़ाये,बालोका तेल
गुरुकुल शिक्षा के उद्देश्य (Objectives of Gurukul Education)
गुरु-शिष्य के मध्य पिता-पुत्र के सम्बन्धों को स्थापित करना I
प्राचीन सनातन ज्ञान-विज्ञान का विकाश मानवता की भलाई के लिए करना I
गुरु या आचार्य द्वारा शिष्यो का शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास करना I
वैदिक तथा सनातन के बारे में बोध करना और सनातन संस्कृति को युगों तक जीवित रखना I
शिष्य के चरित्र का गुरुओ और आचार्य द्वारा विकास करना एवंम सनातन संस्कृति के प्रति आस्था उत्पन्न करना I
गुरुकुल में एडमिशन कैसे होता था (how to get admission in gurukul)
गुरुकुल में प्रवेश के लिए निर्धारित उम्र का पालन किया जाता था ! एवं जो शिष्य शिक्षा के उद्देश्य से शिक्षा ग्रहण करने के लिए आए, उसी को ही प्रवेश दिया जाता था ! शिष्य का मानसिक एवम् शारीरिक रूप से स्वस्थ होना आवश्यक होता था !
-: रोचक तथ्य :-
उल्लू के बारे में रोचक 50 तथ्य
कोयल के बारे में 25 रोचक तथ्य
गुरुकुल के नियम क्या थे (what were the rules of gurukul)
गुरु या आचार्य की आज्ञा का पालन करना I
ब्रह्मचर्य का पालन करना I
अनुशासन का पालन करना I
समय पर सोना व समय पर उठाना I
समय पर दोपहर व सायं का भोजन करना I
देनिक कार्यो को नित्य करना I
बिना बताये गुरुकुल से बहार ना जाना I
गुरुकुल की दिनचर्या (Gurukul routine)
ब्रह्म मुहूर्त में उठना I
योग, ध्यान व प्राणायाम करना I
गौ-दोहन करना I
स्नान व प्रभु की पूजा करना I
संस्कृत व धार्मिक पठन करना I
ज्योतिष, वैदिक गणित, चित्रकला, संगीत इत्यादि विभिन्न विषयों का अध्ययन करना I
कसरत – व्यायाम, घुड़सवारी, रोप-पोल मलखम, विभिन्न शारीरिक तालीम एवं क्रीडा करना I
गायन-वादन, नाट्य, वक्तृत्व आदी कला वकुशलताओं का प्रशिक्षण लेना I
संध्या भक्ति, प्रभु भक्ति कीर्तन करना I
संध्या विहार करना I
निर्धारित समय पर रात्रि शयन I
गुरुकुल की फीस क्या थी
(what was the fee of gurukul)
प्राचीन काल में गुरु या आचार्य शिक्षा ग्रहण करने वाले शिष्य को अपने परिवार का हिस्सा मानते थे ! इसलिए आज की तरह उस समय में शिक्षा के लिए कोई भी वार्षिक शुल्क नही लिया जाता था ! मगर गुरुकुल के प्रत्येक गुरु, आचार्य व शिष्यो के भोजन के लिए बरी-बारी से नगर में जाकर शिष्यो भीक्षा जरुर मांगकर लानी पड़ती थी !
वैदिक गुरुकुल क्या होता हैं ? (What is a Vedic Gurukul ?)
वैदिक गुरुकुल में सनातन धर्म के अनुसार वेदों की शिक्षा व पंचभूतो से बने शशिर (अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी, आकाश) की शिक्षा दी जाती थी ! जिनमे निम्न प्रमुख शिक्षा
१. वैदिक विज्ञान (Vedic Science)
वैदिक विज्ञान में चारों वेद, उपनिसद, मंत्रोचार, सनातन धर्म से ईश्वर की आराधना करना सिखाया जाता था ! मंत्रोचारण द्वारा देवीय सिद्धिया प्राप्त करना ! वैदिक मंत्रोचार द्वारा हवन, यज्ञ करवाना
२. अग्नि विद्या (Metallergy)
मंत्रोचारण द्वारा अग्नि उत्पन्न, अग्नि अस्त्र-शास्त्र का निर्माण व उपयोग व हमारे शशिर की बाहरी और आतंरिक अग्नि के बारे मे बताया जाता था !
३. वायु विद्या (Flight)
गुरुकुल में वायु दबाब के कारण बदलते मौषम पर नियंत्रण, वायु वेग से चलने वाले अस्त्र-शास्त्र व विमानों के बारे में जानकारी ! वायुमंडल में अन्य ग्रहों का प्रभाव व मानव शरीर में वायु से होने वाले विकारो से उत्पन्न बीमारियों के बारे में भी gurukul में पढाया जाता था !
४. जल विद्या (Navigation)
बरसात के पानी को भंडारण करने एवं उसके उपयोग के बारे में जानकारी ! जल से चिकित्सा, बरसात न होने पर वैदिक मंत्रोच्चारण से धरती पर जल की कमी को दूर करना ! हर जीव जंतु के लिए पानी की पर्याप्त व्यवस्था करना एवं दैनिक उपभोग में कितना पानी उपयोग करना है ! और जल पर चलने वाले यंत्रो का निर्माण व उसके उपयोग बारे में गुरुकुल में बताया जाता था !
५. पृथ्वी विद्या (Environment)
पृथ्वी पर पर्यावरण संतुलन को बनाए रखने में मदद करना ! पृथ्वी पर उत्पन्न खनिज पदार्थ जड़ी बूटियां के बारे में जानकारी gurukul में दी जाती थी ! एवं कृषि के लिए भूमि की भौगोलिक स्थिति व जल संसाधनों का भंडारण व उपयोग आदि
६. अंतरिक्ष विद्या (Space science)
अंतरिक्ष में होने वाली खगोलीय घटनाओं के बारे में जानकारी, सूर्य मंडल में स्थित तारों के बारे में जानकारी, व अंतरिक्ष में होने वाली खगोलीय घटनाओं का धरती पर प्रभाव के बारे में बताया जाता था ! ग्रह नक्षत्रों की चाल के द्वारा आने वाले समय की सटीक भविष्यवाणी करना सिखाया जाता था !
आयुर्वेद (Ayurveda)
अनेक प्रकार की जड़ी बूटियों से आयुर्वेदिक औषधि बनाने की विधि और उपचार के बारे में गुरुकुल में पढ़ाया जाता था ! और गुरुकुल के आचार्यों ने अपने शिष्य को आयुर्वेदिक औषधियों की ऐसी ऐसी विद्या सिखाई जिन से इलाज करना बहुत ही सहज व आसन हो जाता था !
-: सनातन चालीसा :-
श्री शनि चालीसा
गंगा मैया चालीसा
खाटू श्याम चालीसा
श्री सरस्वती चालीसा
गुरुकुल शिक्षा प्रणाली (Gurukul Education System)
गुरुकुल की शिक्षा प्रणाली प्रत्येक क्षेत्र के लोगों को आसानी से रोजगार में आत्मनिर्भर बनाने के लिए अनेक प्रकार की शिक्षा दी जाती थी ! आगे चलकर उनको उनके काम से पहचान मिलाने लगी ! जैसे स्वर्ण का कम करने वाले स्वर्णकार, रत्न का काम करने वाले जोहरी, वस्त्र का कम करने वाले दर्जी, लोह का कम करने वाले लोहार व अन्य !
जिनमें निम्न प्रकार की शिक्षाएं प्रमुख थी !
रत्नाकर (Gems)
प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले रत्न, उपरत्न व नवरत्नों की गुणवत्ता व उनके उपयोग, उनको तराशने, उनके विक्रय के बारे में बताया जाता था
स्वर्णकार (Jewellery designing)
स्वर्ण आभूषणों की उच्च गुणवत्ता के रूप में निर्माण व कलात्मक ढंग से उनकी डिजाइन और उनकी उपयोगिता के बारे में gurukul में सिखाया जाता था !
वस्त्रकार (Textile)
कृषि द्वारा उत्पन्न उच्च क्वालिटी की कपास से धागा तैयार करना, उस धागे से कपड़ा बनाना व कपड़े से कैसे वस्त्र बनाएं जाएं ! इस बारे में विधिवत पूर्ण ज्ञान करवाया जाता था !
कुम्भकार (Pottery)
मिट्टी के द्वारा घर में उपयोग आने वाले बर्तनों व खाद्यान्नों का भंडारण करने के लिए बड़े-बड़े बर्तनों को बनाने व उनके उपयोग के बारे में
लोहकार (Metallergy)
रंगसाज (Dying)
कपास से निर्मित वस्त्रो को रंगने, उनके छपाई करने के लिए विभिन्न प्रकार के प्राकृतिक रंग बनाने व उनके उपयोग के बारे में gurukul में सिखाया जाता था !
वास्तुकार (Architect)
वास्तुकार में भवन बनाने के लिए नक्शा बनाना, उसके वास्तु अनुसार मजबूत व प्राकृतिक रूप से अनुकूल निर्माण, उनकी साज सज्जा के लिए चित्रकारी व आक्रतांओ द्वारा हमले से बचाव के लिए मजबूत निर्माण के बारे में gurukul में पढाया जाता था !
पाकविद्या (Cooking)
हर तरह के सात्विक भोजन बनाने की विद्या गुरुकुल में सिखाई जाती थी ! जिससे जीवन में आत्म निर्भर रहकर हर परिस्थितियों में भोजन के लिए किसी पर निर्भर न रहना पड़े ! यह शिक्षा गुरुकुल में पढ़ने वाले प्रत्येक विद्यार्थी को सिखाई जाती थी !
-: क्या आपको पता हैं :-
वासुकी कौन था ??
शेषनाग कौन हैं
कालिया नाग कौन था ??
सती सुलोचना कौन थी ??
भूत-प्रेत कौन बनता हैं ??
भगवान गणेश को स्त्री क्यों बनना पड़ा ??
गुरुकुल की क्या विशेषता थी (What was the specialty of Gurukul)
गुरुकुल की मुख्य विशेषता यह थी की यह पर विद्या ग्रहण करने के बाद कोई भी बेरोजगार ना रहे ! रोजगार से सम्ब्धित निम्न प्रकार की शिक्षा दी जाती थी !
वाणिज्य (Commerce)
रोजगार व स्वंय के हिसाब किताब के लिए वित्तीय लेखा-जोखा के बारे में बताया जाता था ! जिससे जीवन में हिसाब किताब आसानी से रख सके ! और आसानी से रोजगा मिल सके !
कृषि (Agriculture)
जैविक तरीके से कृषि करना सिखाया जाता था ! जिससे आत्मनिर्भरता के साथ-साथ स्वयं रोजगार कर सके !
पशुपालन (Animal Husbandry)
कृषि एवं घरेलू उपयोग के लिए पशुपालन का ज्ञान gurukul में करवाया जाता था ! जिससे पशुओं की देखभाल करना, उनके बीमार होने पर उनका इलाज करना एवं आत्मनिर्भर बनना
पक्षिपालन (Bird Keeping)
अनेक प्रकार के पक्षियों को प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने के लिए पक्षी पालन सिखाया जाता था ! जिसमें कबूतर से एक स्थान से दूसरे स्थान तक संदेश पहुंचाना व अन्य
पशु प्रशिक्षण (Animal Training)
घरेलू का जंगली पशुओं के बारे में बताया जाता था ! जिसमें घरेलू पशुओं के व जंगली पशुओं से कैसे आत्म रक्षा कर सकें ! उस बारे में सिखाया जाता था !
यान यन्त्रकार (Mechanics)
दैनिक उपयोग के काम में आने वाली मशीनरी का उपयोग व उनको बनाना gurukul में सिखाया जाता था ! जिससे सरलता व आसानी से काम को कम समय में पूरा किया जा सके !
रथकार (vehicle designing)
प्राचीन समय में जानवरों से गाड़ी बनाकर उनका एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने के लिए उपयोग करना सिखाया जाता था ! जिनमें मुख्य रुप से ऊंट गाड़ी, बैल गाड़ी, घोड़ा गाड़ी व अन्य प्रकार के से जानवरों को रथ के रूप में प्रयोग किया जाना !
प्राचीन भारत के गुरुकुल (Gurukul of Ancient India)
प्राचीन समय में बड़े-बड़े ऋषि मुनि अपने आश्रम से ही गुरुकुल चलाते थे ! जिनमें राजा महाराजाओं व प्रजा के बच्चे शिक्षा ग्रहण करने के लिए इन ऋषि मुनियों के आश्रम में बने गुरुकुल में आते थे ! उस समय के ऋषि-मुनियों द्वारा चलाए जाने वाले प्रमुख्य गुरुकुलो के नाम :-
वाल्मीकि आश्रम
विश्वामित्र का आश्रम
ऋषि वशिष्ठ आश्रम
भारद्वाज मुनि आश्रम
कपिल मुनि आश्रम
महर्षि अत्रि आश्रम
गौतम ऋषि आश्रम
परशुराम आश्रम
वेदव्यास आश्रम
गुरु द्रोण आश्रम
कश्यप आश्रम
आजादी से पहले भारत में कितने गुरुकुल थे ?
(How many Gurukuls were there in India before independence?)
भारत में आजादी से पहले लगभग 37,500 के आसपास गुरुकुल थे ! देश आजाद होने के बाद तत्कालीन सरकारों ने पाश्चात्य संस्कृति की शिक्षा को बढ़ावा देने के कारण हमारे प्राचीन सनातन गुरुकुल gurukul बंद होते गए ! और आज स्थिति ऐसी हो गई है कि हमारे देश में वर्तमान समय में गुरुकुलो की संख्या सैकड़ों में रह गई है !
भारत में कहां-कहां पर गुरुकुल है ? (Where is Gurukul in India?)
राजस्थान के श्रीगंगानगर जिला मुख्यालय के पास मोहनपुरा रोड पर श्री धर्म संघ संस्कृत महाविद्यालय हैं ! जहाँ विद्यार्थियों को वेदों व कर्मकांड का ज्ञान भी दिया जा रहा है।
वेद वेदांग ऋषिकुल ब्रह्मचर्या आश्रम, राजस्थान के चुरू जिले की सरदारशहर तहसील में छात्र वेद-वेदांग, ज्योतिष, कर्मकांड की शिक्षा का विद्याभ्यास करते हैं !
श्रीमद् दयानंद कन्या गुरुकुल महाविद्यालय चोटीपुरा, अमरोहा, उत्तर प्रदेश (केवल कन्याओं के लिए)
गुरुकुल काँगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार शहर, उत्तराखण्ड
कन्या गुरुकुल महाविद्यालय, देहरादून (केवल कन्याओं के लिए)
कन्या गुरुकुल महाविद्यालय, हरिद्वार, उत्तराखण्ड ((केवल कन्याओं के लिए)
गुरुकुल में क्या पढ़ाया जाता था (what was taught in gurukul)
हमारे प्राचीन गुरुकुलो में क्या पढ़ाया जाता था ! इस बारे में जानना अति आवश्यक हैं ! क्योकि आज की जो शिक्षा प्रणाली हैं, वो गुरुकुल की शिक्षा के सामने सूर्य को दीपक दिखाने जैसी हैं ! आज की शिक्षा प्रणाली में केवल किताबी ज्ञान सिखाया जाता हैं ! मगर गुरुकुल में क्या सिखाया जाता था ! वह हम आपको नीचे बताएगें ! जिसको पढ़ने के बाद आपके होश उड़ जाएंगे !
१. सूर्य विद्या (Solar study)
२. चन्द्र व लोक विद्या (Lunar study)
३. मेघ विद्या (Weather forecast)
४. पदार्थ विद्युत विद्या (Battery)
५. सौर ऊर्जा विद्या (Solar Energy)
६. दिन रात्रि विद्या (Day-Night studies)
७. सृष्टि विद्या (Space Research)
८. खगोल विद्या (Astronomy)
९. भूगोल विद्या (Geography)
१०. काल विद्या (Time)
११. भूगर्भ विद्या (geology and mining )
१२. रत्न व धातु विद्या ( gems and metals )
१३. आकर्षण विद्या ( gravity )
१४. प्रकाश विद्या ( solar energy )
१५. तार विद्या ( communication )
१६. विमान विद्या ( plane )
१७. जलयान विद्या ( water vessels )
१८. अग्नेय अस्त्र विद्या ( arms and amunition Vidya)
१९. जीव जंतु विज्ञान विद्या ( zoology botany Vidya)
२०. यज्ञ विद्या (Yagya Vidya)
इस प्रकार की विद्यायें गुरुकुल में दी जाती थीं ! परन्तु समय के साथ-साथ गुरुकुल की शिक्षा लुप्त होते गई ! आज के समय में वैदिक विज्ञान और शिक्षा के लिए गुरुकुल की पुनः स्थापना करना बहुत महत्वपूर्ण हो गया है !
गुरुकुल में शिक्षा का विभाजन
(Division of Education in Gurukul)
गुरुओं व आचार्यो को पता था कि किस प्रकार से चीजों को कैसे निर्देशित किया जाए यानी शिष्य कैसे शिक्षा दी जाए। इसलिये छात्रों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया जाता है !
१. 24 वर्ष की उम्र तक शिक्षा पाने वाले शिष्य को वासु कहा जाता था !
२. 36 साल की उम्र तक शिक्षा पाने वाले शिष्यो को रुद्र कहा जाता था !
३. और 48 साल की उम्र तक शिक्षा प्राप्त करने वाले शिष्यो को आदित्य कहा जाता था !
भारत से गुरुकुल कैसे खत्म हुए
(How Gurukul ended from India)
देश आजाद होने के बाद तत्कालीन सरकारों ने पाश्चात्य संस्कृति की शिक्षा को बढ़ावा देने के कारण हमारे प्राचीन सनातन गुरुकुल बंद होते गए ! और आज स्थिति ऐसी हो गई है कि हमारे देश में वर्तमान समय में गुरुकुलो की संख्या सैकड़ों में रह गई है !
अगर हमें भारत को विश्वगुरु बनाना है, तो भारत में खत्म हुए गुरुकुल को वापस खड़ा करना होगा ! एवं सनातन धर्म के अनुसार आने वाली पीढ़ीयो को गुरुकुल की शिक्षा देकर भारत को विश्वगुरु बनाया जा सकता है !
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